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खेती को चाहिए दीर्घकालीन नीति, बता रहे हैं अशोक बंग

अशोक बंग
Updated Fri, 16 Oct 2020 04:35 AM IST
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किसान - फोटो : PTI

कोरोना के संकट ने पूरे विश्व को एक प्रचंड सुनामी की तरह घेर रखा है। दुनिया को इस दर्दनाक सच्चाई का एहसास हो गया है कि कोई भी इस जानलेवा बीमारी से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। सजीव और निर्जीव की सीमारेखा पर मौजूद इस क्षुद्र वायरस ने सबके मुंह पर पट्टियां बांध दी हैं। इस संकट काल में दो महत्वपूर्ण बातें दुनिया की समझ में आईं। पहला यह कि भीड़-भाड़ वाली बड़ी बस्तियों के बजाय प्रकृति के निकट खुले वातावरण में रहना ज्यादा सुरक्षित है और सार्थक भी। दूसरी बात यह कि खाद्यान्न के बिना किसी का भी जीना असंभव है। किसी भी परिस्थिति में जमीन-आसमान एक करके भी खाद्यान्न की आपूर्ति और इंतजाम अबाधित रखना पड़ता है। लॉकडाउन के दौरान अन्य तमाम गतिविधियां ठप रहीं, लेकिन खाद्यान्न आपूर्ति और इंतजाम से जुड़े कामों को रोका नहीं गया। 



अर्थव्यवस्था के अन्य घटकों के बारे में चाहे जितना भी बखान कर लिया जाए, लेकिन कोरोना संकट के दौर में देश की अर्थव्यवस्था को डूबने से कृषि क्षेत्र ने ही बचाया। ऐसे में भारत समेत दुनिया के डेढ़ सौ से ज्यादा राष्ट्र आज जब वैश्विक अन्न दिवस मना रहे हैं, तो कृषि और खाद्यान्न क्षेत्र के संकटों पर विचार करना प्रासंगिक जान पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्थापित खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) अपने 75 वर्ष पूरे कर रहा है और हाल ही में इस वैश्विक संगठन को इसकी महती भूमिका के लिए नोबेल का शांति पुरस्कार भी देने की घोषणा हुई है। दुनिया में भूखे और आधा पेट खाने वाले लोगों की संख्या 2015 में 78 करोड़ थी, जो आज बढ़कर 82 करोड़ हो गई है। यह विडंबना ही है कि एक तरफ इतनी बड़ी आबादी भूखी है, दूसरी तरफ लगभग इतने ही लोग मोटापे का शिकार हैं।


देश की 138 करोड़ की विशाल आबादी को खाद्यान्न उपलब्ध कराना बहुत चुनौतीपूर्ण है। और खाद्यान्न सुरक्षा सेना के सैनिक यानी किसान यह जिम्मेदारी अपने कंधे पर उठाते हैं। इसलिए खाद्यान्न के साथ कृषि क्षेत्र के संकट और जरूरत को समझना जरूरी है। वर्ष 1950 में हमारे देश में साढ़े पांच करोड़ टन अनाज का उत्पादन होता था, जो अब करीब तीस करोड़ टन तक पहुंच गया है। लेकिन जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान जो 1950 में 52 फीसदी था, वह घटकर अब मात्र 16 फीसदी रह गया है। देश की आर्थिक विकास दर अब तक पांच से दस फीसदी तक रही है, लेकिन कृषि क्षेत्र की विकास दर उसकी तुलना में हमेशा एक चौथाई के बराबर रही है। असल में सरकारी प्रावधानों में कृषि क्षेत्र को बहुत कम हिस्सा दिया जाता है। पहली पंचवर्षीय योजना में कृषि क्षेत्र को इसमें 14.7 फीसदी हिस्सा मिला, जो अब घटते-घटते तीन से पांच फीसदी के आसपास पहुंच गया है। यानी करीब तीन से पांच गुना गिरावट। कृषि क्षेत्र सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार और आजीविका प्रदान करता है। फिर भी स्थिति ऐसी हो गई है कि 50 फीसदी से ज्यादा किसान खेती के जानलेवा फंदे से छूटने की कामना करते हैं। 1995 से अब तक यानी पिछले 25 साल में तीन लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। 


विश्व अन्न दिवस पर यह समझना आवश्यक है कि अन्नदाता किन-किन चुनौतियों से जूझकर देश की आबादी का पेट भरते हैं। कृषि पर प्राकृतिक आपदा (आसमानी जुल्म) की मार पहले भी पड़ती थी, लेकिन वैश्विक जलवायु परिवर्तन के संकट के कारण यह कई गुना बढ़ गया है और हर साल बढ़ता ही जा रहा है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेटिओरॉलॉजी का निष्कर्ष है कि आजादी से लेकर वर्ष 2015 तक के 65 वर्षों में भारत में तीव्र सूखा 16 साल रहा और अति वर्षा के नौ साल रहे। यानी 23 फीसदी साल में सूखा और 14 फीसदी वर्षों में अति वर्षा, ये दोनों मिलाकर 37 फीसदी वर्ष कृषि क्षेत्र के लिए प्रतिकूल मौसम रहे।


यानी हर तीन में से एक साल तीव्र आसमानी जुल्म से कृषक समाज तबाह हो जाता है। लेकिन आसमानी जुल्म से भी भयावह है सरकारी नीतियों, नौकरशाही और बाजार का संयुक्त जुल्म यानी सुल्तानी जुल्म। बाकी समाज और उपभोक्ताओं को सस्ता खिलाने के लिए कृषि क्षेत्र निगेटिव सब्सिडी पर कृषि उपज देता चला आ रहा है। इसके अलावा ‘गाड़ी भर लूटकर मुट्ठी भर सहूलियतें’ देने वाली सरकारी नीतियां (कुछ अपवादों को छोड़कर) भी कम जिम्मेदार नहीं। आज भी कृषि उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करते समय कृषि खर्चों के कुछ असली मद सरकार चालाकी से नजरंदाज कर देती है। अनेक अध्ययनों का कहना है कि सरकार द्वारा घोषित एमएसपी की तुलना में वास्तविक उत्पादन खर्च डेढ़ गुना ज्यादा है। आज किसान अपना अस्तित्व और खेती बचाने के लिए जूझ रहे हैं। अगर उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य मिले, तो सरकारों को कर्जमाफी का दिखावा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। पिछले पांच साल में व्यावसायिक बैंकों ने लगभग सात लाख करोड़ रुपये के रुके हुए कर्ज (एनपीए) माफ किए, जिनमें से व्यवसाय क्षेत्र को 28 फीसदी, उद्योग क्षेत्र को 65 फीसदी और कृषि क्षेत्र को मात्र सात फीसदी कर्जमाफी मिली।


विश्व अन्न दिवस का सूत्र है-सबको सतत पर्याप्त पोषक आहार मिले, जिससे सबका स्वास्थ्य बने। यूनिसेफ की 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, बाल कुपोषण की सूची में भारत काफी ऊंचे पायदान पर है। भारत में 54 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देश भी इस मामले में हमसे बेहतर स्थिति में हैं। प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इस देश के लिए, जहां कृषि की समृद्ध परंपरा रही है, कृषि-विज्ञान के उच्चतम शिखरों पर पहुंचना कठिन नहीं है। इसके लिए सरकार को अपनी नीतियों में कृषि क्षेत्र के लिए कहीं ज्यादा अनुकूल बदलाव करने होंगे और तात्कालिक कदम उठाने के बजाय दीर्घकालीन नीति तैयार करनी होगी। इसके अलावा खेती की पद्धतियों और तकनीकों में भी बदलाव करना होगा। भारत में अन्न को 'ब्रह्म' कहा गया है। विश्व अन्न दिवस पर अन्न-ब्रह्म का उत्पादन करने वाले अन्नदाताओं के प्रति संवेदनशील और क्रियाशील होने का संकल्प लेना जरूरी है।


 
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