अतीत में उठाए गए कदमों को गिनाने के बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को प्रेस कांफ्रेंस की अपनी शृंखला में ग्यारह विशिष्ट उपाय किए हैं; इसके अलावा उन्होंने कोविड-19 के लिए जारी 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज के हिस्से के रूप में किसानों की मदद करने के लिए बृहस्पतिवार को भी दो उपायों की घोषणा की थी। लेकिन इसमें संकट में फंसे किसानों के हाथों में सीधे नकद हस्तांतरण प्रदान करने के लिए कोई विशेष उपाय नहीं था। हालांकि इनमें से अधिकांश उपाय पहले से ही बजट प्रस्तावों में शामिल हैं।
सीतारमण ने कृषि विपणन को आसान बनाने और आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत स्टॉक सीमा हटाने के लिए तीन उपायों की भी घोषणा की, यह एक ऐसा कदम है, जो प्रसंस्करण उद्योग और थोक व्यापार में मदद करेगा। असाधारण समय को छोड़कर, जब आपदा आती है या जब खराब होने वाली फसलों की कीमतें सौ फीसदी और अनाज की कीमतें पचास फीसदी अधिक हो जाएं, व्यापारी अब जमाखोरी नहीं कर सकेंगे। किसानों को अपनी उपज बाजार में उपलब्ध कराने के लिए कई विकल्प प्रदान करने वाला एक केंद्रीय कानून और अनुबंध खेती की सुविधा प्रदान करने के लिए कानून शीघ्र ही लाया जाएगा।
फसल कटाई के बाद कोल्ड स्टोरेज शृंखला जैसे बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए एक लाख करोड़ रुपये का फंड उपलब्ध कराया गया है। इसी तरह समुद्री और अंतर्देशीय (घरेलू) मत्स्यपालन के लिए 20,000 करोड़ रुपये के आवंटन की घोषणा की गई है। इसके अलावा डेयरी इन्फ्रास्ट्रक्चर और अन्य जारी योजनाओं के लिए 15,000 करोड़ रुपये तथा पशुओं के खुरपका तथा मुंहपका बीमारी की रोकथाम के लिए 13,343 करोड़ रुपये की घोषणा की गई है। सभी पशुओ का सौ फीसदी टीकाकरण किया जाएगा, जिसे मई, 2019 में कैबिनेट से मंजूरी मिल चुकी है।
औषधीय पौधों, मधु मक्खीपालन, सूक्ष्म खाद्य उद्यमों में पोषण आहार, स्वास्थ्य और कल्याण आदि के लिए भी योजनाओं की घोषणा की गई है। बेशक ये महत्वपूर्ण उपाय हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक हैं, तथा किसानों, मछुआरों और दुग्ध उत्पादक किसानों की मदद करेंगे, पर ये ऐसे कदम हैं, जो दीर्घकालीन कृषि गतिविधियों में सुधार के लिए सतत प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
मौजूदा संकट के दौर में जब लॉकडाउन के कारण आर्थिक गतिविधियां गंभीर रूप से ठप हैं, केवल कृषि ही जीवन-रेखा बनी हुई है। सही मायने में कृषि ने भारतीय अर्थव्यवस्था के मुख्य आधार के रूप में अपनी छवि मजबूत की है। पर रेस्तरां और ढाबों के लगभग 50 दिनों से बंद होने के कारण शहरी मांग घट गई है, जिसका कृषि को भारी खामियाजा उठाना पड़ा है, लेकिन फिर भी इसने आपूर्ति जारी रखी है।
खबरें हैं कि नियमित रूप से आपूर्ति बाधित होने के कारण किसानों को सड़कों पर दूध बहाना पड़ा, मुर्गियों को जिंदा जलाना पड़ा, फूलों के खेत फिर से जोतने पड़े, पशुओं के आगे सब्जियां फेंकनी पड़ीं और सभी फसलों की कीमत बाजार में लगभग न्यूनतम स्तर पर चली गई, क्योंकि आपूर्ति शृंखला नियमित रूप से बाधित हुई। अनुमानों के मुताबिक, सब्जी उत्पादकों को 25,000 करोड़ रुपये, दुग्ध उत्पादकों को 10,000 करोड़ रुपये तथा फूल उत्पादकों, नर्सरी वालों, फल उत्पादकों व मछुआरों को भारी नुकसान के अलावे पॉल्ट्री उद्योग को 15,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।
सभी बाधाओं के बावजूद किसानों ने लगभग 10.6 करोड़ टन गेहूं की कटाई की है, खरीफ फसलों की पहले ही ज्यादा बुआई की है, और आने वाले हफ्तों में वे धान रोपाई के लिए भी तैयार हो रहे हैं। कृषि क्षेत्र पहले से ही संकट में है, उम्मीद की जा रही थी कि तत्काल राहत पैकेज आंशिक रूप से उन्हें हुए नुकसान की भरपाई करेगा, और बुवाई के लिए प्रोत्साहन प्रदान करेगा। यहां सरकार के लिए संकट में किसानों के साथ खड़े होने और ज्यादा आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज प्रदान करने का अवसर था। किसानों को तत्काल राहत पैकेज की जरूरत है, और उनके हाथों में अधिक नकदी प्रदान करने से अधिक मांग पैदा करने में भी मदद मिलेगी।
इससे पहले भी, जब वित्त मंत्री ने किसानों और समाज के अन्य सीमांत वर्गों के लिए 1.70 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की थी, किसानों के लिए एकमात्र प्रतिबद्धता पीएम-किसान योजना के तहत 2,000 रुपये की एक किस्त देना था, जो उनका बकाया ही था। प्रधानमंत्री किसान योजना के तहत किसानों को तीन किस्तों में प्रति वर्ष 6,000 रुपये का प्रत्यक्ष हस्तांतरण मिलता है।
अप्रैल-जून तिमाही की पहली किस्त बकाया थी। दूसरे शब्दों में, किसान अब तक किसी भी प्रत्यक्ष समर्थन से वंचित हैं। मेरा प्रस्ताव है कि पीएम-किसान आवंटन में देरी किए बिना बटाईदार किसानों सहित प्रति किसान 10,000 रुपये का प्रत्यक्ष आय हस्तांतरण प्रदान करना चाहिए। इसके अलावा, किसानों को गेहूं की कटाई और खरीद के समय जो कठिनाइयां झेलनी पड़ीं, उन्हें देखते हुए उन्हें गेहूं खरीद के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर 100 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस दिया जाना चाहिए। यह देखते हुए, कि कई लाख प्रवासी श्रमिक अपने गांवों में लौट आए हैं, कृषि को और मजबूत करने की जरूरत है, ताकि अतिरिक्त कार्यबल को खेती में समायोजित किया जा सके।
यह महामारी प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत अभियान को साकार करने का अवसर प्रदान करती है। कृषि को पुनर्जीवित करना और खेती को आर्थिक रूप से व्यावहारिक बनाना इस अभियान का आधार है। मनरेगा के लिए 40,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त आवंटन एक स्वागत योग्य कदम है। यह दूसरे देशों से सबक लेने का भी वक्त है। अमेरिका ने किसानों से सीधे सब्जियां, फल और दूध खरीदने तथा उपभोक्ताओं को आपूर्ति करने के लिए तीन अरब डॉलर की मदद दी है। भारत में खराब होने वाली फसलों के लिए इसी तरह की रणनीति पर काम किया जा सकता है। यह वक्त सरकार द्वारा ऐसे कदम उठाने का है, जिससे किसान लाभान्वित हों। आखिरकार, किसानों ने यह प्रदर्शित किया है कि इस कठिन समय में वे अर्थव्यवस्था की वास्तविक रीढ़ हैं। (लेखक कृषि नीति विशेषज्ञ हैं।)