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उदारीकरण का नतीजा है श्रम कानूनों में बदलाव

माया जॉन
Updated Sun, 17 May 2020 05:35 AM IST
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मजदूर - फोटो : amar ujala

देश में लंबे लॉकडाउन के कारण उत्पन्न आर्थिक मंदी और मजदूरों की कमी पर गर्माती चर्चा की पृष्ठभूमि में, राज्य सरकारें उद्यमों को प्रोत्साहित करने के लिए विशिष्ट प्रावधानों की घोषणा कर रही हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकारों ने व्यापक प्रावधानों की घोषणा की है, जिनके तहत उद्यमों को क्रमशः अगले तीन वर्षों और 1,000 दिन के लिए लगभग सभी श्रम कानूनों के पालन से पूरी तरह छूट दी गई है। 



इनमें काम का समय आठ घंटे से 12 घंटे करने, ओवरटाइम को बढ़ाकर प्रति हफ्ता 72 घंटे करने, मालिकों को अपनी सहूलियत के हिसाब से काम का समय बदलने और बिना श्रम न्यायालय गए झगड़ों का निपटान करने की छूट मुख्य हैं। राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा एवं अन्य राज्यों ने भी शिफ्ट का समय 12 घंटे कर दिया है।


ये कदम पिछले तीन दशक से भारतीय अर्थव्यवस्था में हो रहे निरंतर उदारीकरण के ही परिणाम हैं। 1990 के दशक की शुरुआत से लगातार सत्ताधारी गुटों में आम राय बन रही है कि श्रम कानून मुक्त बाजार के विकास में अवरोधक का काम कर रहे हैं। ऐसा बताया जाता है कि ये कानून मालिकों को उत्पादन व्यवस्था में बाजार की जरूरतों के अनुसार रोजगार संबंधों में अस्थायीकरण और अनौपचारिकरण की कार्य स्थितियों को लागू करने में आड़े आते हैं। 


पर सच्चाई यह है कि मजदूर वर्ग का एक बड़ा हिस्सा श्रम कानूनों की परिधि से बाहर रहा है। यह कानून अस्थायी कार्यों और छोटे उद्योग धंधों के बनिस्बत निरंतर व स्थायी कार्यों और बड़े प्रतिष्ठानों में ही लागू होते रहे हैं। यह श्रम बाजार में लचीलेपन की कमी के दावे को गलत साबित करता है।


उदारीकरण के बाद के दौर में मालिकों की पैरवियों ने श्रम कानून को पहले से ही निष्प्रभावी बनाने का काम किया है। यह विभिन्न केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर उठाए गए कदमों, जैसे फैक्टरी निरीक्षण के प्रावधानों को कमजोर बनाने, मालिकों द्वारा श्रम कानूनों के पालन के स्व-प्रमाण को स्वीकृति देने, और कार्यस्थल के सुरक्षा मानकों, काम के घंटों, न्यूनतम वेतन, मुआवजा, औद्योगिक विवाद आदि से संबंधित श्रम कानूनों में कई वैधानिक प्रावधानों को बदलने से साफ दिखाई देता है।


पूंजी और राजसत्ता बड़े प्रतिष्ठानों के हितों को बढ़ाने के लिए लॉकडाउन की आपात परिस्थितियों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे उन्हें संगठित मजदूरों की प्रतिक्रिया और विरोध का सामना न करना पड़े। श्रम के घंटों और कर्मचारियों की समय-सीमा में बदलाव के साथ-साथ श्रम विवादों और वृहद पूंजी-श्रम संबंधों को नियमित करने में सरकार अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट रही है। इन कदमों का प्रतिकूल प्रभाव न सिर्फ मजदूरों, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था और व्यापक समाज पर पड़ेगा। 


काम के घंटे बढ़ाने से जहां मजदूरों का शोषण होगा, वहीं दो मजदूरों से तीन का काम कराया जाने से न सिर्फ बेरोजगारी बढ़ेगी, बल्कि कामगार आबादी की क्रय शक्ति में भी गिरावट आएगी। श्रम कानून में यह बदलाव राजसत्ता के कार्य संबंधों के नियमन की अपनी भूमिका से पीछे हटने की प्रक्रिया की चरम अवस्था है, जिससे बहुसंख्यक श्रमिकों के लिए शुरुआती उपनिवेशिक दौर जैसी अनिश्चित, निर्मम और भयावह परिस्थितियों की वापसी होगी। 
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मौजूदा सरकारों द्वारा औद्योगिक संबंधों के नियमन से अपने हाथ खींचने के कारण कार्यस्थल निजी अधिकार-क्षेत्र में परिवर्तित हो जाएंगे, जहां मालिकों को मनमाने ढंग से वेतन तय करने, ओवरटाइम काम लेने, छुट्टी देने, मुआवजा निर्धारित करने आदि की खुली छूट होगी। असंगठित क्षेत्र में बेहद ही कम वेतन पर मजदूर-वर्ग के बहुसंख्यक पुरुष और महिलाएं कमरतोड़ मेहनत करते हैं। इस क्षेत्र में राज्य की सार्वजनिक शक्ति की गैर-मौजूदगी मालिकों की निरंकुश सत्ता का कारण बनी हुई है। 


जाहिर है कि जब कार्य-अनुबंध के संबंध में मालिकों की बढ़ी हुई निजी ताकत और निरंकुश सत्ता औपचारिक क्षेत्र में भी प्रतिमान के रूप में स्थापित हो जाएगी, तब राज्य की भूमिका केवल मजदूरों के प्रतिरोधों को दंड-विधानों से रोकने तक सीमित रह जाएगी। संगठित क्षेत्र से निकाले गए श्रमिक असंगठित क्षेत्र में काम ढूंढने को मजबूर होंगे।


स्पष्ट है कि श्रम कानूनों में हालिया छेड़छाड़ मालिक और मजदूर के बीच कार्य-अनुबंध को एक निजी और वैयक्तिक मामले के तौर पर संस्थागत करने का काम करेगी। उभरती हुई यह परिघटना 20वीं शताब्दी के श्रम कानूनों का दौर खत्म होने का द्योतक है। निजी पूंजी को प्रोत्साहन देने की यह प्रक्रिया समाज के एक बड़े हिस्से में अनिश्चितता का वातावरण बनाएगी, और पहले से ही अति-शोषित ‘असंगठित’ मजदूरों की असुरक्षित स्थिति में भारी बढ़ोतरी करेगी। 


मजदूरों के जीवन, जीविका और स्वतंत्रता के सतत घटते अधिकारों के कारण हमारे सामने एक यक्ष-प्रश्न उठता है कि लॉकडाउन के बाद अर्थव्यवस्था का पटरी पर आना कितना स्थायी होगा। ऐसी स्थिति में इस आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता कि आने वाले समय में औद्योगिक टकराव की स्थिति में गुणात्मक इजाफा होगा। (-दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और भारतीय श्रम कानून के इतिहास की विशेषज्ञ।)

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