शिखर सम्मेलनों की आलोचना बहुत आसान होती है। इनमें फोटो सेशन के सिवाय होता क्या है? हाल में आयोजित एशिया-पैसिफिक इकोनॉमिक को-ऑपरेशन (एपेक) की बैठक में भी वैश्विक नेताओं की चकाचौंध से भरी तस्वीरें देखने को मिलीं। इन बैठकों में ज्यादातर यही होता है कि निचले स्तर पर अधिकारी जिन समझौतों पर पहले ही काम कर रहे होते हैं, उनकी औपचारिक घोषणा की जाती है। मगर कभी-कभी इन बैठकों में कुछ ऐसा घटित होता है, जो वाकई महत्वपूर्ण होता है। कार्बन उत्सर्जन पर चीन और अमेरिका के बीच हुआ समझौता इसी का उदाहरण है।
इसकी वजह जानने के लिए सर्वप्रथम पूरी गहराई से यह समझना होगा कि जीवाश्म ईंधन से जुड़े हितों के समर्थक, हाल-फिलहाल जिनमें पूरी रिपब्लिकन पार्टी शामिल है, पृथ्वी को बचाने के लिए शुरू की गई किसी भी मुहिम के खिलाफ खड़े दिखते हैं। उनका पहला तर्क समस्या को नकारने से जुड़ा है। उनका कहना है कि जलवायु में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा। यह महज एक धोखा है, जिसे एक साजिश के तहत दुनिया भर के हजारों वैज्ञानिकों ने रचा है। सुनने में यह तर्क भले ही अजीब लगे, मगर इसके समर्थन में कई ताकतवर हस्तियां दिखती हैं।
हालांकि राजनीतिक तौर पर देखें, तो वैज्ञानिकों के खिलाफ मोर्चा खोलने का बहुत सीमित प्रभाव होता है। यह रणनीति टी पार्टी आंदोलन के समय भले कारगर साबित हुई हो, मगर ज्यादातर लोग, जिनमें कुछ रिपब्लिकन भी शामिल हैं, अगर इसे षड्यंत्र मानते हैं, तो यह ठीक ही है। गौरतलब है कि टी पार्टी एक अमेरिकी राजनीतिक आंदोलन है, जो रूढ़िवादी सोच रखता है, रिपब्लिकन पार्टी से जुड़ा है और सार्वजनिक खर्च में कटौती की मांग करता है। इसके बैनर तले 2009 से सरकार के खिलाफ कई तरह के धरने-प्रदर्शन हो चुके हैं।
उनका दूसरा तर्क आर्थिक मोर्चे पर दी जा रही धमकी से जुड़ा है। कहा जा रहा है कि कार्बन उत्सर्जन को सीमित करने का कोई भी प्रयास रोजगार निर्माण और विकास के लिए गंभीर क्षति साबित होगा। मगर यह तर्क भी दक्षिणपंथी पार्टी (रिपब्लिकन) की बाजार पर भरोसा रखने वाली मूल नीति के खिलाफ जाता है। रिपब्लिकन्स मानते हैं कि व्यापार को बढ़ाकर किसी भी चुनौती से निपटा जा सकता है। इतना ही नहीं, वे यह भी मानते हैं कि व्यापार से संबंधित नीतियों में खुद को परिस्थितियों के अनुरूप ढालने और नवप्रवर्तन करने की असीमित क्षमता होती है। सवाल उठता है कि क्या कार्बन उत्सर्जन पर कोई नीति अपना लेने भर से रिपब्लिकन पार्टी की बुनियादी विचारधारा ध्वस्त हो जाएगी। जाहिर है कि पहले तर्क की भांति यह दूसरा तर्क भी बेतुका है। रिपब्लिकन नेता भले ही कोयले पर लड़ाई बताकर इस समझौते को अमेरिकी मूल्यों का हनन बता रहे हों, मगर सच यह है कि कोयला उद्योग बहुत कम लोगों को रोजगार देता है। कोयले की असल लड़ाई तो खनन के ढंग और प्राकृतिक गैस के संदर्भ में दिखी थी, जिसका समाधान काफी पहले हो चुका है। रही बात पर्यावरण संरक्षण की, तो पूरा देश इसके समर्थन में है।
तीसरा तर्क यह दिया जा रहा है कि ग्लोबल वार्मिंग की चुनौती से निपटने के लिए अमेरिका कुछ नहीं कर सकता, क्योंकि दूसरे देश, खासकर चीन लगातार ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करता रहेगा। दरअसल यही वह बुनियादी तर्क है, जो काटो इंस्टीट्यूट और दूसरे रूढ़िवादी विचारक देते रहे हैं। और यह चिंता वाजिब भी है। पर्यावरण से जुड़ी कोई भी नीति बनाने से पहले यह अवश्य सुनिश्चित होना चाहिए कि कार्बन उत्सर्जन को रोकने से इन्कार करने वाले देशों को लेकर क्या रुख अपनाया जाएगा।
मगर 'कार्बन टैरिफ' की शक्ल में इस सवाल का समुचित जवाब पहले ही मौजूद है। यह उन देशों से लिया जाए, जो उत्सर्जन रोकने की मुहिम का हिस्सा बनने से इन्कार करें। इससे व्यापार संबंधी किसी भी मौजूदा कानून में बदलाव लाने की भी जरूरत नहीं रहेगी। गौरतलब है कि अभी तक पर्यावरण संरक्षण से जुड़े किसी भी कार्यक्रम में चीन के शामिल होने के बारे में अटकलें ही लगती रही हैं। मगर इस बार जानकारी का स्रोत पूरी तरह प्रामाणिक है। चीन ने कार्बन उत्सर्जन को सीमित करने की अपनी मंशा खुले तौर पर जाहिर कर दी है। हालांकि उसकी भाषा उतनी स्पष्ट नहीं है, और उत्सर्जन का जो लक्ष्य निर्धारित किया गया है, वह भी पर्यावरण विशेषज्ञों की मांग से कहीं ज्यादा ऊंचा है। साफ है कि अगर समझौते का शब्दशः पालन होगा, तो भी पृथ्वी के तापमान में नुकसानदायक बढ़ोतरी होना तय है।
मगर जिन हालात में यह समझौता हुआ है, उस पर ध्यान देना भी जरूरी है। ऐसे मुद्दों पर बातचीत के लिए अमेरिका की विश्वसनीयता भी कटघरे में खड़ी होती रही है। कांग्रेस में पर्यावरण संरक्षण की मुहिम के विरोधियों के प्रभाव को देखते हुए निकट भविष्य में, और आने वाले कई वर्षों तक कार्यकारी आदेशों पर ही भरोसा किया जा सकता है। अमेरिका के अगले राष्ट्रपति के तौर पर किसी पर्यावरण विरोधी नेता के चुने जाने की संभावना भी व्यक्त की जा रही है। वह बराक ओबामा के सारे फैसलों को पलट दे, तो हैरत नहीं होनी चाहिए।
इसके अलावा चीन के नेतृत्व को अपने नागरिकों की उस सोच से भी निपटना होगा, जिन्हें इस बात से नफरत है कि इस नई महाशक्ति की नीतियों में पश्चिम का कोई दखल हो। जाहिर है कि दोनों देशों के बीच का ताजा समझौता आने वाले समय में किसी नीतिगत पहल का आश्वासन नहीं देता। मगर एक घोषणा के तौर पर इसका महत्व जरूर है। जलवायु परिवर्तन से जुड़े किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते में चीन की हिस्सेदारी को लेकर अब तक अटकलबाजी ही होती थी। जबकि आज चीन के लोग भी इसके इच्छुक दिख रहे हैं। कुछ हद तक इस समझौते ने पर्यावरण संरक्षण मुहिम के विरोध में खड़े लोगों को जिस तरह धक्का पहुंचाया है, उससे इस हफ्ते हमारे ग्रह को कुछ उम्मीदें बंधी हैं।