जिस युवक पर कभी 'बदतमीज' होने का आरोप लगा था, आज वही शख्स पूरे देश की पसंद बनकर उभरा है। ऑस्ट्रेलिया के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री टोनी एबट अपने छात्र जीवन को शायद ही भूल पाएंगे, जब उन पर एक लड़की ने 'बदतमीजी' करने का आरोप लगाया था।
उस वक्त सिडनी यूनिवर्सिटी में छात्र संघ के चुनाव हो रहे थे और एबट दक्षिणपंथी पार्टी के उम्मीदवार थे। उन पर जिस लड़की ने आरोप लगाया था, वह वामपंथी राजनीति करती थी। मामला अदालत में पहुंचा और मीडिया ने विशेष रुचि दिखानी शुरू की। चुनाव के नतीजे भले ही एबट के खिलाफ गए, लेकिन अदालत ने उन पर लगे आरोप को 'राजनीतिक साजिश' माना और उन्हें रिहा कर दिया।
तब एबट की हार की जो वजहें गिनाई गई थीं, उनमें उनका आक्रामक स्वभाव भी था। आज एबट कई धूप-छांव में तपकर प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे हैं, लेकिन जिस आक्रामकता की बात तब कही जा रही थी, अब वही उनकी 'राजनीतिक शक्ति' बन गई है।
एबट अपने जीवन को 'उतार-चढ़ाव' से भरा मानते हैं। इसकी वजह भी है। असल में अंग्रेज पिता और ऑस्ट्रेलियाई मां का यह लाडला जब महज तीन साल का था, तो पिता रिचर्ड हेनरी को सपरिवार ब्रिटेन छोड़कर ऑस्ट्रेलिया आना पड़ा। पढ़ाई-लिखाई के दौरान बॉक्सिंग से प्यार तो हो गया, पर उसमें करियर बनाने की छूट नहीं मिली।
राजनीति तथा दर्शन में मास्टर डिग्री हासिल करने के बाद एबट बिजनेस मैनेजर, राजनीतिक सलाहकार, धर्माचार्य और न जाने क्या-क्या बने, लेकिन अंत में रंग जमा राजनीति में। हालांकि बीच में द ऑस्ट्रेलियन और द बुलेटिन अखबारों के लिए पत्रकारिता भी की और कई फीचर लेख लिखे।
आज लिबरल-नेशनल गठबंधन के बूते एबट भले ही सत्ता के शिखर तक पहुंचे चुके हैं, पर चुनौतियां भी कई हैं। वह जिस कार्बन टैक्स को खत्म कर 'डायरेक्ट ऐक्शन' प्लान लाने और किसानों को सब्सिडी तथा उद्योगपतियों पर कार्बन उत्सर्जन कम करने का दबाव बनाने की बात कह रहे हैं, उसके विरोधी फेडरल पार्लियामेंट (स्थानीय संसद) में भी कई हैं।
इतना ही नहीं, नॉर्वे से आने वाले शरणार्थियों को रोकने के लिए कठोर कानून बनाने की वकालत कर उन्होंने कई संगठनों की नाराजगी मोल ले ली है। लेकिन इन सबसे बावजूद एबट 'ऐक्शन' को तैयार हैं। शासन संभालने के बाद इसीलिए उन्होंने कहा भी है, 'हमें इन्हीं मुद्दों पर तो जनादेश मिला है।'
- हेमेन्द्र मिश्र