इस समय चीन के आर्थिक परिदृश्य पर दो चिंताएं उभर रही हैं। एक, चीन की विकास दर में गिरावट, और दूसरा, वहां की कामकाजी आबादी घटने से श्रमबल में कमी की प्रवृत्ति। यह कोई छोटी बात नहीं कि पिछले कुछ वर्षों में दहाई से ऊपर पहुंची हुई चीन की विकास दर में गिरावट आई है और अब यह सालाना सात फीसदी पर पहुंच गई है।
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, विश्व का सबसे बड़ा निर्यातक देश और विकासशील मुल्कों में सबसे बड़ा उपभोक्ता देश चीन अपनी अर्थव्यवस्था के बिगड़ते प्रतिमानों से चिंतित है। चीन की राजकोषीय और बैंकिग स्थिति उसके जीडीपी विकास में आने वाली बड़ी गिरावट का संकेत दे रही है। अध्ययन बता रहे हैं कि चीन अब उत्पादन में दस डॉलर की बढ़ोतरी के लिए चालीस डॉलर खर्च कर रहा है। चीन में किया गया अत्यधिक निवेश वहां के उद्योग व्यवसाय पर असर डाल रहा है। फिच की रेटिंग के अनुसार, चीन का वर्तमान कर्ज बढ़कर देश की कुल जीडीपी के 200 फीसदी तक जा पहुंचा है।
चीन की दूसरी बड़ी आर्थिक चिंता नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या विभाग की ताजा रिपोर्टों में दिखाई दे रही है। यह चिंता ‘एक दंपति-एक संतान’ नीति के कारण श्रमबल घटने के चौंकाने वाले परिदृश्य के रूप में है। सस्ते श्रमबल के आर्थिक मॉडल पर टिकी चीन की अर्थव्यवस्था में घटते हुए श्रमबल से उत्पादन और विकास दर घटने का सिलसिला शुरू हो गया है। नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स ने कहा है कि पिछले वर्ष पहली बार 15 से 59 वर्ष की कार्यशील आबादी में 35 लाख श्रमिकों की कमी आई है। वहां युवा आबादी कम हो रही है, तो बुजुर्गों की बढ़ रही है। अभी चीन की कार्यशील आबादी 94.4 करोड़ है, जो 2020 में घटकर 92.9 करोड़ रह जाएगी।
अब तक चीन अपनी भारी कामकाजी आबादी के कारण दुनिया का कारखाना बना हुआ है, लेकिन भविष्य में चीन के उद्योगों में श्रमबल की भारी कमी होने से उसकी औद्योगिक स्थिति में चिंताजनक बदलाव आएगा। 1980 में ‘एक दंपति-एक संतान’ नीति लागू करने से वहां की जन्म दर में जोरदार कमी आने लगी है। अपनी आबादी स्थिर रखने के लिए उसे कम से कम 2.2 की प्रजनन दर की जरूरत है, जबकि अभी यह दर 1.66 है। यह भारत की मौजूदा प्रजनन दर 2.6 फीसदी की तुलना में बहुत कम है। 1990 से चीन के स्कूलों में बच्चों की संख्या में भी लगातार कमी आई है। यद्यपि कुछ शहरों में एक बच्चे वाले परिवारों को एक और बच्चे की अनुमति देने वाले पायलट प्रोजेक्ट शुरू हुए हैं, लेकिन आशंका है कि ऐसे कार्यक्रम अधिक सार्थक नहीं होंगे।
वस्तुतः चीन की इन आर्थिक चिंताओं के बीच भारत की उम्मीदें बढ़ती दिखाई दे रही हैं। चीन की कामकाजी आबादी में गिरावट के परिप्रेक्ष्य में भारत की बढ़ी हुई आबादी मानव संसाधन के लिहाज से वरदान सिद्ध हो सकती है। भारत की आबादी में पचास प्रतिशत से ज्यादा संख्या उन लोगों की है, जिनकी उम्र पच्चीस साल से कम है। यदि हम चाहते हैं कि अपने श्रमबल से आर्थिक व औद्योगिक विकास की नई इबारत लिखें, तो हमें कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे। हमें शैक्षणिक संस्थानों में इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट जैसे प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों में पढ़ाई करने वाले युवाओं को रोजगार बाजार की नई जरूरतों के मुताबिक सुसज्जित करना होगा। हमें शैक्षणिक दृष्टि से पीछे रहने वाले युवाओं को रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रमों से शिक्षित करना होगा। हमें सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में ढांचागत और भौतिक सुविधाएं विकसित करनी होंगी। चूंकि चीन भारत से औसतन 30 प्रतिशत कम लागत पर वस्तुओं का उत्पादन कर रहा है, अतएव चीन से व्यापार में मुकाबला करने के लिए हमें कम लागत पर गुणवत्तापूर्ण उत्पादन करने वाले देश के रूप में पहचान बनानी होगी। चीन की तरह भारत को भी गुड गवर्नेंस की स्थिति बनानी होगी। प्रतिस्पर्धा में सतत सुधार तथा वित्तीय मानदंडों के प्रति जवाबदेही पर ध्यान दिया जाना समीचीन होगा।
उल्लेखनीय है कि भारत के पास कुशल पेशेवरों की फौज है। आईटी, सॉफ्टवेयर, बीपीओ, फार्मास्युटिकल्स, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक, केमिकल्स एवं धातु क्षेत्र में दुनिया की जानी-मानी कंपनियां हैं, आर्थिक व वित्तीय क्षेत्र की शानदार संस्थाएं हैं। दवा निर्माण, रसायन निर्माण और बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में भारत के आगे बढ़ने की संभावनाएं हैं। लेकिन आर्थिक सुधार, बुनियादी ढांचा, आंतरिक व्यापार, शिक्षित-प्रशिक्षित श्रम शक्ति, वैज्ञानिक अनुसंधान, जवाबदेह प्रशासन, भ्रष्टाचार कम करने के प्रयास आदि की कसौटी पर चीन की तुलना में हम बहुत पीछे हैं।
चीन में 1980 से आर्थिक सुधार तेज गति से आगे बढ़े हैं, जबकि भारत में आर्थिक सुधार 1991 से धीमी गति से शुरू हुए। चीन में आर्थिक सुधारों के तहत अर्थव्यवस्था को देसी-विदेशी निवेशकों के लिए ज्यादा खुला बनाया गया, कृषि और सिंचाई क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहित किया गया, प्रतिस्पर्धा में सतत सुधार पर ध्यान दिया गया, वित्तीय मानदंडों के प्रति जवाबदेही बरती गई और आधारभूत ढांचे के तहत सड़कों, पुलों, फ्लाइओवर, हवाई अड्डों आदि का जाल बिछाया गया। हमें इन सभी बुनियादी कमजोरियों को दूर करना होगा। चीन के बदलते हुए श्रमबल परिदृश्य के मद्देनजर नई पीढ़ी को जरूरतों के मुताबिक तैयार करने के लिए सरकार द्वारा ऐसा नया रोडमैप बनाया जाना चाहिए, जिससे भारत दुनिया की नई आर्थिक शक्ति के तौर पर सामने आए।