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आक्रामक राजनीति का दौर

नीरजा चौधरी Published by: नीरजा चौधरी Updated Fri, 04 Jan 2019 07:29 PM IST
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राहुल और जेटली

पिछले कुछ दिनों से यानी जबसे नया साल शुरू हुआ है, हालिया विधानसभा चुनावों में कमजोर पड़ी भाजपा अपनी स्थिति सुधारने की कोशिश कर रही है। इसने कड़वी राजनीति को भी आगे बढ़ाया है, जिसे हम आगामी लोकसभा चुनाव में देखेंगे, जो अप्रैल-मई में होने वाले हैं। इसकी शुरुआत एएनआई को दिए प्रधानमंत्री के इंटरव्यू से होती है, जिसे हाल के महीनों में नरेंद्र मोदी ने कई इंटरव्यू दिए हैं। उस 95 मिनट के इंटरव्यू में जो सबसे चौंकाने वाली बात थी, वह यह कि प्रधानमंत्री, जो आम तौर पर आक्रामक रहते हैं और जिनसे विरोधियों की बखिया उधेड़ने और आगामी चुनाव को देखते हुए एजेंडा सेट करने की उम्मीद थी, उन्होंने अपना यथोचित पक्ष दिखाने की कोशिश करके एक अलग रणनीति अपनाई। वह रक्षात्मक दिखे, अपनी और अपनी पार्टी के खिलाफ लगे आरोपों और आलोचनाओं पर सफाई दे रहे थे।



यह दर्शाता है कि भाजपा नुकसान की भरपाई करने के क्रम में समाज के उन वर्गों को फिर से लुभाने की कोशिश कर रही है, जो उससे दूर जा सकते हैं। ये ऐसे मतदाता हैं, जो किसी एक पार्टी से नहीं बंधे हैं, भाजपा के मुख्य समर्थकों में इनकी 18-19 फीसदी की हिस्सेदारी है और जिन्होंने 1998 और 1999 में वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा का समर्थन किया था और 2014 में नरेंद्र मोदी को आसानी से सत्ता में पहुंचाया। उदाहरण के लिए, मोदी द्वारा भीड़ की हिंसा (लिंचिंग) की आलोचना उन लोगों को आश्वस्त करने के लिए थी, जिन्हें हिंसा और हत्या की पीड़ा झेलनी पड़ी है और जो सामुदायिक संघर्ष को अपने जीवन का हिस्सा नहीं बनाना चाहते। हालांकि उन्होंने हिंसा और हत्या के लंबे समय बाद उसकी आलोचना की है।

 

दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने एक खास बात कही कि उनकी सरकार ने जो भी किया है, वह सब मध्य वर्ग के लिए किया है। मध्य वर्ग मोदी का सबसे पक्का समर्थक रहा है, लेकिन बाद में एससी-एसटी अत्याचार अधिनियम, नोटबंदी और जीएसटी जैसे मुद्दों को लेकर मध्य वर्ग से असंतोष के संकेत मिले हैं।

 

उन्होंने मंदिर निर्माण को लेकर बढ़ाए जा रहे दबाव पर कटाक्ष करते हुए कहा कि सरकार अदालत के फैसले का इंतजार करेगी, क्योंकि किसी भी सरकार को संविधान के प्रति निष्ठा रखने की जरूरत होती है। और फिर उन्होंने संघ परिवार (जिसने मंदिर निर्माण में देरी को मुद्दा बनाया है) को भी आश्वस्त किया कि अदालत के फैसले के बाद वह मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश लाने पर विचार करेंगे। उनकी इन बातों का मतलब यह होगा कि किसी भी तरह से मंदिर बनेगा। यदि अदालत अयोध्या में मंदिर निर्माण की इच्छा जताती है, तो मामला वहीं पर खत्म हो जाएगा। लेकिन अगर उसने इसके खिलाफ फैसला दिया, तो फिर सरकार न्यायालय के दृष्टिकोण की परवाह किए बिना मंदिर निर्माण के लिए विधायी रास्ता अपनाने पर विचार करेगी। एक और दिलचस्प बात यह थी कि कांग्रेस मुक्त भारत बनाने के अपने पहले विचार को लेकर उनका स्वर कुछ अलग था। उन्होंने कहा कि भाजपा कांग्रेस पार्टी के बजाय कांग्रेस से जुड़ी एक खास संस्कृति को नष्ट करना चाहती है!


और फिर उसके अगले ही दिन संसद में भाजपा का एक अलग ही अवतार दिखा। राफेल सौदे पर मोदी के खिलाफ कांग्रेस अध्यक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली, जो नपे-तुले जवाब देने के लिए जाने जाते हैं, ने बोफोर्स, नेशनल हेराल्ड, अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले को लेकर राहुल गांधी को निशाने पर लिया और उन्हें कई बार झूठा कहा।


सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने जिस राफेल मुद्दे को लगभग दफन कर दिया था, उसे राहुल गांधी ने फिर से जिंदा कर दिया। जब तक सरकार अगस्ता वेस्टलैंड सौदे को लेकर गांधी-नेहरू परिवार पर निशाना साधती रहेगी, कांग्रेस द्वारा राफेल मुद्दे को छोड़ने की संभावना नहीं है। हालांकि हाल के विधानसभा चुनावों में इस मुद्दे से कोई असर नहीं पड़ा।


राफेल सौदे में कथित भ्रष्टाचार का मुद्दा एक ऐसा मुद्दा था, जिसे कांग्रेस ने बिना अपने सहयोगियों के समर्थन के अकेले दम पर उठाया था। लेकिन संसद में बहस के दौरान अचानक पाया गया कि उसका समर्थन न केवल उनके सहयोगी कर रहे थे, बल्कि गैर गठबंधन वाली पार्टी बीजद और भाजपा की सहयोगी शिवसेना भी कर रही थी। यह कांग्रेस की एक महत्वपूर्ण जीत थी। कांग्रेस के लिए दूसरी अच्छी बात यह थी कि संसद में जिस तरह से राहुल गांधी ने बोला (संभवतः उनका अब तक का सबसे अच्छा भाषण), वह बिल्कुल स्पष्ट था। इसके अलावा वह कांग्रेस के संसदीय दल पर नियंत्रण बनाए हुए दिख रहे थे, जो हालिया जीत के बाद पार्टी में एक बड़ा बदलाव है।
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और फिर जब कांग्रेस अध्यक्ष के शब्द शोर में डूब गए (भाजपा सांसदों ने भी राहुल गांधी के सुधरे हुए प्रदर्शन को निजी बातचीत में स्वीकार किया), राहुल गांधी के अनुयायियों ने लोकसभा में कागज के विमान उड़ाना शुरू कर दिया, जो इस मुद्दे की गंभीरता और संसद की गरिमा के लिए ठीक नहीं था। कांग्रेस को ऐसे आत्मघाती कदमों से बचना होगा, खासकर जब चीजें उसके लिए अच्छी हो रही हैं।

 

राहुल गांधी ने भाजपा से कई चीजें सीखी हैं-मंदिरों में भ्रमण, सोशल मीडिया का प्रभावी इस्तेमाल, बूथ स्तरीय संगठन और अपने विरोधियों पर आक्रामक हमला। लेकिन उन्होंने बार-बार भाजपा और अपनी पार्टी के बीच अंतर बताने की कोशिश की है। जैसे वह कहते हैं कि भाजपा के विपरीत कांग्रेस समाज को बांटना नहीं चाहती है, विरोधियों से नफरत नहीं करती है और संस्थानों को बर्बाद नहीं करती है। ऐसा करने के लिए कांग्रेस को जैसे को तैसा वाली नीति खत्म करनी होगी। हाल में जब एक वरिष्ठ भाजपा नेता से निजी बातचीत में पूछा गया कि 2019 में मुद्दा क्या रहेगा-मंदिर या विकास? तो उन्होंने कहा कि इन दोनों में से कोई नहीं, बस गाली-गलौज। उन्होंने कहा कि इससे और कुछ नहीं, 2019 की लड़ाई को मोदी बनाम बाकी सब का मुद्दा बनाने में मदद मिलेगी। यदि पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम से कोई संकेत मिलता है, तो वह यह कि भाजपा राहुल गांधी और कांग्रेस के खिलाफ ज्यादा आक्रामक होगी, लेकिन नरेंद्र मोदी को इससे ऊपर रखा जाएगा, क्योंकि नेता के रूप में वह तार्किक और संतुलित रह सकते हैं, जैसा कि एएनआई को इंटरव्यू देते वक्त थे। 

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