कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति आपके चेहरे पर मुक्का मारने की धमकी देता है। और फिर एक हफ्ते बाद मुक्के से वह आपकी नाक तोड़ देता है। आपके लिए सबसे हानिकारक क्या है-मुक्का या धमकी? जवाब यह हो सकता है कि शारीरिक हिंसा शरीर को नुकसान पहुंचाती है, लेकिन धमकी नहीं। पर वैज्ञानिक रूप से देखें, तो यह इतना आसान नहीं है। शब्दों का आपके तंत्रिका तंत्र पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। बिना शारीरिक संपर्क के भी कुछ धमकियां आपको बीमार बना सकती हैं, आपका दिमाग खराब कर सकती हैं, आपके तंत्रिका तंत्र की कोशिकाओं को खत्म कर सकती हैं और आपके जीवन की अवधि घटा सकती हैं।
आपके शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली में प्रोइफ्लैमेटरी साइटोकिन्स नामक कुछ प्रोटीन होते हैं, जो आपके घायल होने पर सूजन पैदा करते हैं। हालांकि कुछ परिस्थितियों में ये साइटोकिन्स स्वयं शारीरिक बीमारी का कारण बन सकते हैं। वे परिस्थितियां क्या हैं? उन परिस्थितियों में से एक है पुराना तनाव। आपके शरीर में आनुवांशिक पदार्थों की छोटी थैली भी होती है, जो गुणसूत्रों के सिरों पर रहती है। उन्हें टेलोमेरेस कहा जाता है। जब भी आपकी कोशिका विभाजित होती है, उसके टेलोमेरेस कुछ छोटे हो जाते हैं और जब वे बिल्कुल छोटे हो जाते हैं, तो आपकी मृत्यु हो जाती है। यह सामान्य रूप से उम्र बढ़ने की प्रक्रिया है। लेकिन जरा सोचिए कि और ऐसी कौन-सी परिस्थिति है, जो आपके टेलोमेरेस को संकुचित करता है। वह है-पुराना तनाव। यदि शब्द तनाव पैदा कर सकते हैं और लंबे समय तक तनाव से शारीरिक नुकसान होता है, तो ऐसा लगता है कि शब्द (कम से कम कुछ खास किस्म के शब्द) भी हिंसा का एक रूप है। लेकिन किस तरह के शब्द हिंसक होते हैं?
पिछले कुछ वर्षों में यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि सामाजिक न्याय और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के पेशेवर रक्षकों के बीच कॉलेज कैंपसों में संघर्ष बढ़ गया है। छात्र नेताओं द्वारा उन आमंत्रित वक्ताओं के खिलाफ सख्त और कभी-कभी हिंसक विरोध जताने की प्रवृत्ति बढ़ गई है, जिनके विचारों को वे न केवल आक्रामक, बल्कि नुकसानदेह समझते हैं। ऐसे में, वे वक्ताओं के साथ बहस करने की जहमत उठाने के बजाय उन्हें खामोश करना ज्यादा जरूरी समझते हैं। यह आक्रामक चेतावनी इसी सिद्धांत पर आधारित है कि कुछ विषयों पर चर्चा से पुराने जख्म उभर सकते है।
इसी को देखते हुए अनेक शिक्षक अब छात्रों के साथ लाड़-प्यार दर्शाने लगे हैं। बौद्धिक प्रगति के लिए जरूरी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर इसका बुरा प्रभाव पड़ने लगा है। पिछले दिनों प्यू सर्वे ने एक आंकड़ा जारी किया है, जिससे पता चलता है कि 2015 से रिपब्लिकन सोच के लोग मानने लगे हैं कि कॉलेज एवं विश्वविद्यालय राष्ट्र पर नकारात्मक असर डाल रहे हैं। आक्रामकता शरीर और मस्तिष्क के लिए बुरी नहीं है। तंत्रिका तंत्र समय-समय पर तनाव का सामना करने में सक्षम होता है, जैसे बाघ को देखकर भागने, या कभी चोट खाने या विश्वविद्यालय के व्याख्यान में अजीब तरह के विचार सुनने के लिए।
किसी के अरुचिकर विचारों को सुनना शिक्षाप्रद हो सकता है। अपने करियर के प्रारंभ में मैं ईयुजेनिक्स मूवमेंट से संबंधित एक कोर्स पढ़ाती थी, जो मनुष्यों के चयनात्मक प्रजनन की वकालत करता था। अपने समय में ईयुजेनिक्स नस्लवाद को उचित ठहराने का एक वैज्ञानिक साधन बन गया। अपने छात्रों को वैज्ञानिक इतिहास के इस विकृत हिस्से को समझाने के लिए मैंने उन्हें इसे अच्छे और बुरे पक्षों पर बहस करने के लिए कहा। लेकिन छात्रों ने इससे इन्कार कर दिया। कोई छात्र यह दलील देने के लिए तैयार नहीं हुआ कि अमुक नस्ल आनुवंशिक रूप से दूसरे से बेहतर था। तब मैंने अपने विभाग के अफ्रीकी-अमेरिकी फैकल्टी सदस्य को ईयुजेनिक्स के पक्ष में दलील देने के लिए कहा और मैंने स्वयं उसके विरोध में तर्क दिया। बीच बहस में हमने पक्ष बदल लिया। हम छात्रों के लिए विश्वविद्यालयीय शिक्षा के साथ नागरिक समाज के मौलिक सिद्धांत का प्रतिरूप पेश कर रहे थे-जब आपको किसी ऐसी स्थिति में शामिल होने के लिए मजबूर किया जाता है, जिससे आप पूरी तरह से असहमत होते हैं, तो दूसरे के नजरिये को जानने के साथ-साथ आप अपने बारे में भी कुछ सीखते हैं। यह स्थिति सुखद तो नहीं होती, लेकिन यह अच्छा तनाव होता है, जो तात्कालिक और शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाने वाला होता है। और आप सीखने का दीर्घकालिक लाभ उठाते हैं।
इसके विपरीत अगर आप लंबे समय तक तनाव में उबलते रहते हैं, तो यह आपके तंत्रिका तंत्र के लिए नुकसानदेह है। यदि आप अपनी सुरक्षा की चिंता में लंबे समय तक एक कठोर माहौल में समय बिताते हैं, तो इस तरह का तनाव आपको बीमार बनाता है। यह उस राजनीतिक माहौल के लिए भी सच है, जिसमें विभिन्न समूहों के लोग एक-दूसरे के खिलाफ घृणित शब्दों का प्रयोग करते हैं और बड़े पैमाने पर स्कूलों में या सोशल मीडिया में एक-दूसरे को धमकाते हैं। निरंतर, आकस्मिक क्रूरता की संस्कृति शरीर के लिए जहरीला है और हम सब इसके पीड़ित हैं।
इसलिए वैज्ञानिक रूप से बात करना और उकसाने वाले और नफरत फैलाने वाले लोगों को बोलने की अनुमति नहीं देना उचित है। ऐसे लोग बुरे और नफरत के अभियान का हिस्सा होते हैं। उनसे बहस करने से कोई फायदा नहीं होने वाला। आकस्मिक क्रूरता की संस्कृति को मंजूरी देना और अपने सख्त विरोधी विचारों को सुनना, इन दोनों में अंतर होता है। आकस्मिक क्रूरता की संस्कृति समाज और हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, जबकि विरोधी विचार लोकतंत्र के लिए जीवनदायी होता है। हर तरह से हमें विवादास्पद और आक्रामक विषयों पर खुली बातचीत और बहस करनी चाहिए। लेकिन हमें धमकी और यातनापूर्ण भाषणों को रोकना चाहिए।
-नार्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की प्रोफेसर