लालू यादव और उनके परिजनों के खिलाफ मुकदमा (और संभवतः उसके पीछे की योजना) ने बिहार के सत्तारूढ़ गठबंधन के विरोधाभास को ही तीखा किया है। वास्तव में इस प्रकरण ने दोनों पक्षों को दबाव की रणनीति और खतरनाक राजनीति में फंसा दिया है। इसका अंतिम परिणाम चाहे जो हो, नुकसान नीतीश कुमार, लालू यादव और महागठबंधन, तीनों को हो रहा है।
लालू परिवार द्वारा कथित बेनामी संपत्ति रखने के मामले में सीबीआई जांच को देखते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर तेजस्वी यादव से इस्तीफा लेने का नैतिक दबाव बढ़ता जा रहा है। वह हमेशा अपनी ईमानदार छवि के प्रति सजग रहे हैं। वह इस ताजा चुनौती से कैसे निपटते हैं, उसका असर बिहार से बाहर की राजनीति पर भी पड़ेगा। 2015 में नीतीश-लालू के महागठबंधन से हारने के बाद से ही भाजपा की नजरें बिहार पर लगी हुई हैं। विपक्षी दलों से बिहार को छीन लेने पर मोदी को 2019 का चुनाव जीतने के लिए अंकगणितीय और मनोवैज्ञानिक बढ़त मिलेगी। भाजपा नीतीश पर लगातार दबाव बनाकर कह रही है कि अगर तेजस्वी का इस्तीफा लेने पर राजद ने समर्थन वापस ले लिया, तो वह उनकी सरकार को बाहर से समर्थन देगी। विपक्ष के लिए भी कई मायनों में बिहार का महत्व है। यह 2019 के मद्देनजर विपक्ष की राजनीति को फिर से नया जीवन दे सकता है। नीतीश को मोदी के खिलाफ 2019 में विपक्ष के संभावित चेहरे के रूप में देखा जाता रहा है, हालांकि विपक्षी दलों ने नेतृत्व के इस सवाल पर अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं।
सार्वजनिक तौर पर नीतीश ने खुद को प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बाहर बताया है और कहा कि उनकी पार्टी इतनी छोटी है कि वह दावेदार नहीं बन सकते। पर इसका कोई मतलब नहीं है। 1989 में राजीव गांधी की जगह प्रधानमंत्री बनने वाले वी पी सिंह बार-बार कहते थे कि वह प्रधानमंत्री पद के योग्य नहीं हैं! नीतीश जानते हैं कि पूरे विपक्ष को उन्हें प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर स्वीकार करना होगा। उनकी पार्टी कांग्रेस की तरह बड़ी और अखिल भारतीय जनाधार वाली नहीं है, जिसके बल पर वह शीर्ष पद के लिए दावा करें। बिहार के मुख्यमंत्री अन्य विपक्षी नेताओं की तुलना में खुद को अलग तरीके से पेश कर रहे हैं और इसलिए पहेली बने हुए हैं। वह विरोध करने की खातिर मोदी का विरोध नहीं करते, इसलिए एक 'रचनात्मक' नेता के रूप में उभर रहे हैं। उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक या नोटबंदी का विरोध नहीं किया, क्योंकि वह भांप गए थे कि इन फैसलों को जनता का समर्थन प्राप्त है। उन्होंने मोदी की काट के लिए वैकल्पिक उपाय की जरूरत पर जोर दिया। मद्यनिषेध के उनके फैसले को बिहार की महिलाओं का समर्थन मिला।
लालू और उनके परिवार के खिलाफ मामला इन्हीं पृष्ठभूमि के बरक्स आया है, जिसने महागठबंधन के दो प्रमुख घटकों के बीच विभाजन तेज कर दिया है। आखिर नीतीश कुमार के पास क्या विकल्प है? अभी तक तो तेजस्वी ने इस्तीफा देने से इन्कार ही दिया है। लालू ने अपने बेटे के इस्तीफे के खिलाफ अपना रुख कड़ा कर लिया है। शुरू में नीतीश कुमार ने तेजस्वी को अपनी इच्छा से इस्तीफा देने का मौका दिया। उन्होंने तेजस्वी को पद छोड़ने के लिए नहीं कहा था, बल्कि उन पर लगे आरोपों के खिलाफ सिर्फ साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए कहा था, ताकि जनमत को संतुष्ट किया जा सके। बाद में उन्होंने अन्य नेताओं का ब्योरा देते हुए तेजस्वी पर इस्तीफे का दबाव बढ़ाया। लेकिन अब नीतीश कुमार ने भी अपना रुख कड़ा कर लिया है।
नीतीश कुमार की छवि भ्रष्टाचार को बिल्कुल बर्दाश्त न करने की है और वह जानते हैं कि अगर उन्होंने अपनी सरकार बचाने के लिए तेजस्वी से इस्तीफा नहीं लिया, तो अपनी प्रतिष्ठा खो देंगे। उन्हें उम्मीद है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अंततः लालू यादव को मना लेंगी, क्योंकि महागठबंधन टूटने से किसी को फायदा नहीं होगा। लालू का परिवार कई मामलों का सामना कर रहा है, यह लालू के लिए अच्छा नहीं है। उनकी स्थिति और भी खराब हो जाएगी, जब उनकी पार्टी बिहार में सत्ता से बाहर हो जाएगी। राजद और कांग्रेस के एक गुट का विचार है कि अगर वे जदूय के 15 विधायकों को शुरू में राष्ट्रपति चुनाव में मीरा कुमार को वोट देने और फिर उन्हें अपनी पार्टी से अलग करने में कामयाब हो जाते हैं, तो नीतीश के समर्थन के बगैर बहुमत के लिए उन्हें पर्याप्त संख्याबल हासिल हो जाएगा। हालांकि यह अभी सपने जैसा लगता है।
तेजस्वी के लिए सबसे अच्छा विकल्प है कि वह स्वयं इस्तीफा दे दें। इससे वह एक उच्च नैतिक आधार हासिल कर सकते हैं। यदि वह महागठबंधन के व्यापक हित के लिए इस्तीफा देते हैं, तो युवाओं के बीच उनका आकर्षण बढ़ सकता है। भले ही पिछली बार यादवों ने राजद का समर्थन किया था, पर कई लोग ऐसे हैं, जो राजद को पारिवारिक पार्टी के तौर पर देखते हैं। तेजस्वी के पास अभी समय है, वह मात्र 28 साल के हैं और अपनी अलग छवि बना सकते हैं।
महागठबंधन में टूट से न तो कांग्रेस को कोई फायदा होगा और न ही नीतीश को। अभी नीतीश मुख्यमंत्री हैं, स्वायत्त होकर काम कर रहे हैं। पर अमित शाह और मोदी के नेतृत्व वाले भाजपा की मदद से सरकार चलाने पर उन्हें स्वतंत्रतापूर्वक काम करने का मौका नहीं मिलेगा, क्योंकि यह अटल-आडवाणी वाली भाजपा नहीं है, जहां उन्होंने उन दोनों वरिष्ठ नेताओं के साथ अच्छे रिश्ते का आनंद उठाया। प्रधानमंत्री पद तो छोड़िए, 2020 में जब उनका मौजूदा कार्यकाल खत्म होगा, तो भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए भी नामित नहीं करेगी। भाजपा फिर वहां अपने किसी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाएगी, जैसा कि उसने महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ किया। आने वाला वक्त नीतीश कुमार और लालू यादव, दोनों से बिहार की नई चुनौतियों के संदर्भ में उच्च कोटि के नेतृत्व की मांग करेगा, कि वह अपने निर्णय लेने की क्षमता पर क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ को हावी होने देते हैं या नहीं।