गोवा में पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सव हुआ, जिसमें दो फिल्मों, सेक्सी दुर्गा और न्यूड को न दिखाए जाने पर काफी विवाद हुआ। न्यूड फिल्म के नाम पर जिस तरह आपत्ति की गई, वह थोड़ा अजीब लगता है। सवाल उठता है कि खजुराहो और अजंता-एलोरा के अनमोल शिल्पकर्म पर भारत सरकार क्या गर्वित नहीं है। सेक्सी दुर्गा देवी दुर्गा की कहानी नहीं है। यहां मैं बता दूं कि हमारी बांग्ला संस्कृति में देवी दुर्गा को मां माना जाता है, और मुसलमान होते हुए भी बांग्लादेश में दुर्गापूजा से जुड़ी मेरी अनेक यादें हैं। अब भी ढाका समेत बांग्लादेश के दूसरे शहरों में दुर्गापूजा बहुत धूमधाम से मनाई जाती है। दुर्गा किसी का भी नाम हो सकता है। लड़कियों का दुर्गा नाम रखना तो आम है। अजीब यह भी है कि सेक्सी दुर्गा को सेंसर बोर्ड से तो हरी झंडी मिल गई, लेकिन सरकार ने इसे हरी झंडी नहीं दी। निर्देशक ने फिल्म का नाम बदलकर एस दुर्गा रख दिया। इसके बावजूद बात नहीं बनी।
सत्यजित राय की चर्चित फिल्म पथेर पांचाली फिल्म का मूल चरित्र ही दुर्गा नाम की किशोरी थी। किशोरी दुर्गा ने पड़ोस से एक माला चुराई थी। लेकिन क्या तब किसी ने इस फिल्म का विरोध किया था कि दुर्गा नाम की लड़की चोरी कैसे कर सकती है? यह देवी दुर्गा का अपमान है! मैंने तो ऐसा कभी नहीं सुना। फिर आज इस भारत को क्या हो गया है? इसमें कोई शक नहीं कि किसी फिल्म के किसी पात्र का नाम अगर मोहम्मद होता, तो मुस्लिम कट्टरवादी उस पर हायतौबा जरूर मचाते। जबकि दुनिया में अनेक मुस्लिम पुरुषों के नाम मोहम्मद हैं। इस नाम के सभी पुरुष ईमानदार और सच्चरित्र हों, ऐसा भी नहीं है। मोहम्मद नाम पैगंबर का है। लेकिन मनुष्य तो पैगंबर नहीं है। पैगंबर का नाम होने के कारण क्या मोहम्मद किसी फिल्म का चरित्र नहीं हो सकता? ऐसे ही दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, राधा, कृष्ण आदि के नाम पर किसी फिल्मी चरित्र का नाम क्या इसलिए नहीं हो सकता, क्योंकि ये ईश्वर के नाम हैं? मुस्लिम कट्टरवाद तो सच्चाई है। लेकिन भारत तो इस किस्म की कट्टरता से हमेशा मुक्त रहा है।
जो लोग कला और कलाकार की स्वतंत्रता में विश्वास नहीं करते, वे फिल्मकार का कैमरा छीन लेने में, चित्रकार का कैनवास नष्ट कर देने में, लेखक की कलम तोड़ देने में ज्यादा विश्वास करते हैं। वे लोग नहीं चाहते कि कोई उन्हीं की तरह बात करे और उनकी कमियों के बारे में बताए। वे चाहते हैं कि सारी कलाकृतियां, सारा लेखन, फिल्म आदि सत्ता पक्ष की प्रशंसा में, उनके समर्थन में हो। वे चाहते हैं कि कलाकार की कला सबको खुश रखे। लेकिन सबको खुश रख पाना किसी भी कलाकार के लिए संभव नहीं है। कला का लक्ष्य यह न तो है और न ही होना चाहिए। मुस्लिम कट्टरपंथी नाराज होंगे, इस आधार पर बांग्लादेश ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का काम किया है। भारत जैसे देश को, जिसका इतना लंबा लोकतांत्रिक इतिहास है, इस मामले में बांग्लादेश या पाकिस्तान का अनुसरण नहीं करना चाहिए। सरकार का काम है देश में शांति बनाए रखना तथा अशांति फैलाने की मंशा रखने वाले लोगों और संगठनों के खिलाफ कदम उठाना। सरकारें इसी वायदे के साथ तो सत्ता में आती हैं कि वे लोगों को सुरक्षा प्रदान करेंगी और उनकी लोकतांत्रिक आजादी को अक्षुण्ण तथा कायम रखेंगी।
धर्मांधता, यथास्थितिवाद और कूपमंडुकता किसी भी समाज के लिए अच्छी चीज नहीं है। यह जानकर भी सरकारें जाने-अनजाने इन प्रवृत्तियों को प्रश्रय देती हैं। वे जान-बूझकर समाज को अंधे कुएं में डाल देती हैं। क्या सच में ही वे दंगा और हिंसा से डरती हैं? या खुद उनके अंदर ही धर्मांधता, यथास्थितिवाद और कूपमंडुकता के तत्व होते हैं? बांग्लादेश में मैंने दशकों तक इस प्रवृत्ति को पनपते हुए देखा है। पाकिस्तान की स्थिति तो और भी भयावह है। समाज जिस स्थिति में है, उसे उसी हालत में रहने देना किसी प्रगतिशील नेता का स्वप्न नहीं हो सकता। समतावादी समाज का निर्माण न करने का मतलब है समाज के लिए कुछ भी न करना। विषमता को खत्म करना जितना जरूरी है, अभिव्यक्ति का अधिकार बरकरार रखना भी उतना ही आवश्यक है। सरकार का काम शासन या शोषण करना नहीं, सेवा करना है।
चौबीस साल पहले मुझे बांग्लादेश से सरकार ने इस कारण निकाल दिया था कि मेरे वहां रहने से कट्टरवादी तांडव मचाएंगे। मुझे देश से बाहर निकालकर बांग्लादेश सरकार ने ‘समस्या का समाधान’ निकाल लिया था। लेकिन क्या बांग्लादेश से बाहर निकल आने के बाद वहां की समस्याओं का समाधान हो गया? मूल समस्या तो वहां जस की तस है। वह समस्या है-बांग्लादेश में नारी विरोधी, गणतंत्र विरोधी, प्रगति विरोधी, भिन्नमत विरोधी और मुक्त चिंतन विरोधी एक कट्टर समूह का उदय। उस कट्टर समूह के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय बांग्लादेश की सरकारों ने उसके साथ हाथ मिला लिया। भारत में भी मुझे धमकी देने वालों, मुझ पर हमला करने वालों की कमी नहीं है। यहां की राज्य सरकारों ने भी मुझे अपने यहां से निकाला। इसके बावजूद मैं भारतीय संस्कृति और भारत के लोकतंत्र का सम्मान करती हूं। इसने मुझे शरण दी है।
मैं खुद अपने जीवन के जरिये वाक स्वाधीनता का मूल्य समझती हूं। मैं अपने जीवन के जरिये यह समझ पाई हूं कि एक बार अगर कोई सरकार लेखक-कलाकार की स्वतंत्रता में बाधक बनती है, तो हमेशा के लिए उसे यही काम करना पड़ता है, क्योंकि कट्टर कूपमंडूक तब दुस्साहस पाकर उनके सिर पर चढ़कर नाचने लगते हैं। इसी कारण विवश सरकारों को तब एक के बाद एक किताब, नाटक, फिल्म, कलाकृति आदि को प्रतिबंधित करना पड़ता है। अगर किसी ने विरोध नहीं किया, अगर किसी तरफ से आवाज नहीं उठी, तो और भी किताबें, और भी फिल्में, और भी कलाकृतियों पर प्रतिबंध की मार पड़ेगी। प्रतिबंध संक्रामक होता है। वैसे ही, जैसे कट्टरता संक्रामक होती है।