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उसे मौका पूरा मिला

Tue, 12 Feb 2013 12:06 AM IST
जस्टिस एस एन ढींगरा
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देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था पर हमले की साजिश रचने वाले गुनहगार अफजल गुरु की फांसी के बाद भी देश में अलग-अलग तरह की प्रतिक्रिया सुनना अस्वाभाविक लगता है। बेशक लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात कहने का हक है, लेकिन अगर यह बात उठ रही है कि अफजल गुरु को अजमल कसाब की तर्ज पर अपनी बात रखने का हक नहीं मिला है, तो उसे सिलसिलेवार समझाना भी फर्ज बनता है।
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अफजल के मामले में हर कदम पर इस बात का ध्यान रखा गया कि उसका पूरा पक्ष सामने आए। सबसे पहली बात तो यह कि उसके मामले में खुली सुनवाई हुई। इसमें हर दिन की रिपोर्ट ली गई। यही नहीं अफजल को स्वयं जिरह करने का अवसर दिया गया। पूरी प्रक्रिया को देखेंगे, तो कहीं से ऐसा नहीं लगता कि कार्रवाई एकतरफा चल रही थी और कोर्ट उसे पहले ही सजा सुनाने के लिए आमदा था। न्यायालय ने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि अफजल पर चाहे देशद्रोह का जितना संगीन मामला क्यों न हो, उसे अपनी बात कहने का पूरा हक है।

मगर, उसकी फांसी के बाद कई विचित्र स्थितियां देखने को मिल रही हैं। जब यह मामला विचाराधीन था, तब कोई वकील या कोई संबद्ध व्यक्ति या कोई संस्था सामने नहीं आई कि वह अफजल के लिए अपील करना चाहती है। अफजल को अदालत ने एक वकील दिया था। मामला पूरी तरह खुला हुआ था, अगर किसी को यह लग रहा था कि अफजल के बचाव पक्ष में ढंग से दलील नहीं दी जा रही है, तो उन्हें योग्य वकीलों को सामने लाने से किसने रोका था? सच्चाई यह है कि पूरे मामले में हर तरह की बहस हुई।
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हर बात पर गहराई से सोचा-विचारा गया। यहां तक कहा गया कि अगर वकील की फीस में किसी तरह की मदद चाहते हों, तो उस पर भी विचार किया जा सकता है। लेकिन उस समय सब देशभक्त बन रहे थे! कोई आगे नहीं आया। कहीं से आवाज नहीं उठी। अब एकाएक कहा जा रहा है कि जैसे अफजल के मामले में उदारता नहीं दिखाई। यह एक तरह का निंदा रस है, जिसका आनंद लिया जाता है।

अफजल गुरु को फांसी न्यायोचित है। वह देश के सर्वोच्च प्रतीक को ध्वस्त करने की साजिश में शामिल था। इस पूरे घटनाक्रम में वह गहरी साजिश का एक खास पक्ष था। इसलिए उसके मामले को इस तरह नहीं देखा जा सकता कि वह घटनास्थल पर मौजूद था या नहीं, या सीधी हत्या में उसका हाथ था या नहीं।

बेशक सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद अफजल को फांसी देने में देर नहीं होनी चाहिए थी। लेकिन यह निर्णय राजनीतिक और सरकार के स्तर पर होते हैं, अदालत सिर्फ फैसला सुनाती है। अब सरकार इस पर किस तरह अमल करती है, इसके पीछे अपने कारण होते हैं। आप उसे किसी भी तरह देख सकते हैं। हां, इतना कहने में गुरेज नहीं है कि इतने संगीन मामलों में भी राजनीति अपने फायदे-नुकसान टटोलती है।

वैसे इस देश में हर चीज में देरी होती है। कई चीजें बदली जानी थी, पर हम क्या वाकई बदल पाए हैं? कई चीजें वर्षों से अटकी रहती हैं। निश्चय ही आम आदमी सोच सकता है कि अफजल जैसे किसी मामले में सरकार को तेजी से कदम उठाना चाहिए। लेकिन उसे समझना होगा कि सरकार आम आदमी से तो बनती जरूर है, पर वह आम आदमी नहीं होती। उसके काम करने का एक नजरिया होता है। एक नीति होती है।
 
यूपीए सरकार ने अफजल को फांसी पर लटकाने में आठ साल लगाए। किसी को भी लग सकता है कि इतनी देर नहीं होनी चाहिए। जब इतनी देर होती है, तो कई पहलुओं को लेकर संदेह होने लगता है। अफजल के मामले में यही हुआ। इतनी लंबी अवधि तक मामला टलता रहा। और फिर एकाएक उसकी फांसी की बात सुनी गई। इसलिए कुछ पक्ष संदेह जता रहे हैं। पर वास्तव में इसका यह अर्थ नहीं कि अदालत ने जनभावनाओं के आधार पर फैसला सुनाया।

साफ कहा जा सकता है कि हम बहुत ही नरम राज्य है। और यहां कदम-कदम पर राजनीति हावी है। न्यायालय को बहुत पेचीदा स्थिति में अपना काम करना पड़ता है। राजनीति बड़े अपराधों में भी क्षेत्रवाद, जाति या धर्म के आधार पर मुजरिम की अपनी तरह से व्याख्या करती है। उसके संबंध में राय इस तरह नहीं बनाती कि उससे देश को कितना और कहां नुकसान हो रहा है। बल्कि यह देखा जाता है कि अमूक राजनीतिक हितों के प्रतिकूल है या अनुकूल।

ऐसी स्थितियां कई बार देखने में आई हैं कि किसी संबद्ध फैसले में किसी एक क्षेत्र, धर्म या वर्ग विशेष के नेताओं ने अपनी एक राय बना ली। उन्होंने मामले को इस तरह नहीं देखा कि आखिर तर्कसंगत क्या है। जब तक हमारी दृष्टि इस तरह की होगी, न्यायोचित फैसला लेने में अड़चन आएगी।
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