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हारने के बाद का चिंतन

Mon, 16 Dec 2013 07:38 PM IST
शरद उपाध्याय
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वे इन दिनों आत्मविश्लेषण कर रहे हैं। यह एक आम तथ्य है। हार के बाद लोग अक्सर ऐसा करते पाए जाते हैं। जीतने का विश्वास था, पर हार गए, इसलिए सोचना जरूरी भी है। मन है कि मानने को तैयार ही नहीं होता। आखिर कैसे कोई सड़क पर झाड़ू लगाते-लगाते उनकी सत्ता पर झाड़ू फेर सकता है? उन्हें तो लग रहा था कि राहुल बाबा बोलेंगे और लोग उनकी झोली मतों से भर देंगे। उन्हें तो गीता की इस टिप्पणी पर कभी विश्वास नहीं था कि सब कुछ क्षणिक है। उन्हें लगता था कि यह कथन उनके लिए नहीं, बल्कि विपक्षी दलों के लिए है। उनकी सत्ता तो स्थायी है, पर परिणाम प्रतिकूल आए।
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अब जब वह सत्ता से बाहर हो ही गए हैं, तो कुछ करना तो है। इसलिए आजकल चिंतन प्रारंभ कर दिया है। हालांकि उन्होंने कभी किसी की परवाह नहीं की। लोग महंगाई, भ्रष्टाचार कहते-कहते थक जाते थे, पर उनका ध्यान उनकी तरफ नहीं जाता था।

वे कहते कि जनता झूठ बोलती है। इन पांच वर्षों में उन्होंने कितना सब किया, कितनी योजनाएं बनाई। बिना काम के रोजगार बांटे। पेंशन बांटीं। भोजन तक बांटने जा रहे थे। यहां तक इंतजाम किया था कि मतदाता बस निकम्मा बैठा रहे और वोट के समय उनके पक्ष में बटन दबा आए।
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लेकिन हारते ही मन में दर्द उठा। आगे क्या होगा? कैसे चलेगा? लोग ‘झाड़ू’ लेकर सफाई पर उतर आए, तो वे कहां जाएंगे। उधर ‘मोदी फैक्टर’ का वायरस उनके पीछे पड़ा है। समूचे राज्य में सभी स्तरों पर यह चिंतन चल रही है। आखिर क्या बिगाड़ा था उन्होंने जनता का! इस भौतिकवादी युग में उन्होंने कौन-सा सोना-चांदी मांगा था। मांगा था, सिर्फ साधारण-सा समर्थन; वह भी जनता नहीं दे पाई। और फिर सिर्फ छोटी-छोटी बातें मसलन, महंगाई, आलू-प्याज-पेट्रोल के भाव, गैस की परेशानी आदि को दिल से लगा लिया। बिजली के बिल को ही मुद्दा बना दिया। पर अब भीषण चिंतन प्रारंभ हो गया है। सब लोग सोचने लगे हैं।

हालांकि सभी इस बात पर एकमत हैं कि जनता से भूल हो गई है। जनता राह भटक गई है। पर उन्हें यह विश्वास है कि सेमी फाइनल में हार के बाद भी फाइनल वे ही जीतेंगे। आखिर सुबह का भूला शाम को घर लौटता ही है। बस यही विश्वास है। अब और क्या करें? इसलिए चिंतन ही प्रारंभ कर दिया है, सो अब यही सब चल रहा है।
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