विगत जून तक भीषण सूखे का संकट झेलने वाले बुंदेलखंड के अधिकांश गांव इन दिनों अतिवृष्टि से त्रस्त हैं, जबकि कुछ गांवों को बाढ़ का प्रकोप भी सहना पड़ा है। सूखे के बाद इतनी जल्दी बाढ़ के संकट को बिगड़ते पर्यावरण, खासकर वनों के विनाश, अनियंत्रित खनन, नदियों से रेत खनन तथा परंपरागत जलस्रोतों के ह्रास से जोड़कर देखा जा सकता है।
अधिक पठारी क्षेत्रों वाले बुंदेलखंड का भूगोल ऐसा है कि वर्षा का पानी पठारों से नीचे की ओर तेजी से बहता है। इस स्थिति को समझते हुए वनों की रक्षा और तालाबों व अन्य जलस्रोतों के निर्माण पर पहले बहुत ध्यान दिया गया, पर हाल के दशकों में इसकी उपेक्षा हुई। बेशक पिछले कुछ वर्षों में वृक्षारोपण व तालाब खोदने की चर्चा अधिक होने लगी है, पर जमीनी स्तर पर कथनी और करनी में बहुत फर्क है। सरकारी कागजों में तो सघन वृक्षारोपण दर्ज हैं, पर इसके परिणाम धरती पर नजर नहीं आ रहे।
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में कम समय में अधिक वर्षा होने और फिर बहुत समय तक वर्षा न होने की आशंका तो वैसे भी बढ़ गई है। तिस पर यदि स्थानीय पर्यावरण विनाश भी बड़े पैमाने पर होता रहे, तो इससे आपदाओं के आने या आपदाओं में अधिक क्षति होने की आशंका बढ़ जाती है।
कुछ ऐसी ही स्थिति इन दिनों बुंदेलखंड में सामने आ रही है। जलवायु बदलाव के दौर में तो सभी क्षेत्र हैं, पर कुछ यहां की भौगोलिक व पारिस्थितिक स्थितियों व कुछ तेजी से बिगड़ते यहां के पर्यावरण के कारण जलवायु बदलाव के दुष्परिणाम यहां अधिक नजर आ रहे हैं। बुंदेलखंड में अनेक वर्षों से किसानों की समस्याएं बढ़ाने वाला प्रतिकूल मौसम नजर आ रहा है। फरवरी, 2015 से इसका अधिक विकट दौर आरंभ हुआ, जब लहलहाती फसलें अतिवृष्टि और ओलों से बर्बाद हुईं। उसके बाद सूखा पड़ गया, जिसमें पहले खरीफ, फिर रबी की फसल मारी गई। अब अगस्त में अतिवृष्टि व बाढ़ से खरीफ की फसल फिर क्षतिग्रस्त हुई है। इस तरह दो वर्षों में चार फसलें लगातार बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई या बोई नहीं जा सकी। महोबा जिले के किरारी गांव में अतिवृष्टि से तिल की फसल सौ प्रतिशत, जबकि उड़द और मूंग की फसल 80 प्रतिशत नष्ट हो गई। इस गांव में खरीफ की यही तीन मुख्य फसलें हैं। दुखद यह है कि इतनी अधिक क्षति होने पर भी किसानों को बीमा राशि नहीं मिलती। बांदा जिले में केन नदी के किनारे के अनेक गांव बाढ़ से क्षतिग्रस्त हुए। खेती तबाह हुई, सो अलग। अब आगे बरसात व सर्दी के मौसम में इन लोगों के लिए कठिनाइयां बहुत बढ़ जाएंगी। अनेक गांवों के संपर्क मार्ग टूटने से अस्पताल तक पहुंचना कठिन है, तो अस्पतालों में भी भीड़ है। क्या संकट की इस घड़ी में बुंदेलखंड के लोगों को समय पर उचित इलाज मिलेगा? यदि इस बार खरीफ की संतोषजनक फसल खलिहान में पहुंच जाती, तो किसानों का संकट जरूर कम हो सकता था। पर अब यह उम्मीद धूमिल हो गई है। अतः सरकार और सामाजिक संगठनों को राहत व सहायता के अपने प्रयासों को और व्यापक करना चाहिए।
इसके साथ ऐसे दीर्घकालीन प्रयास जरूरी हैं, जिनसे सूखे और बाढ़ के इस दुश्चक्र से मुक्त होने की टिकाऊ व्यवस्था हो सके। वनों और पर्यावरण की रक्षा करने, किसानों व कमजोर वर्ग को राहत देने तथा बेहतर आपदा प्रबंधन के लिए न सिर्फ बजट बढ़ाना चाहिए, बल्कि इसका उचित उपयोग भी सुनिश्चित करना चाहिए।