छब्बीस साल के वनवास के बाद भाजपा ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में व्यापक जीत के साथ अपने गढ़ को पुनः हासिल कर लिया है। यह न केवल राजधानी में भाजपा की ऐतिहासिक वापसी है, बल्कि राज्य चुनावों में लगातार तीसरी जीत ने पार्टी की चुनावी मशीन की उस शानदार आभा को फिर से साबित किया है, जो पिछले साल के लोकसभा चुनाव में लड़खड़ाने के बाद कुछ हद तक अपनी चमक खो चुकी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खुद दिल्ली पर विजय प्राप्त करने के अभियान का नेतृत्व करने के साथ ही इस वर्ष के अंत में बिहार में होने वाली अगली बड़ी चुनावी चुनौती के लिए माहौल तैयार हो गया है, जहां भाजपा नीत एनडीए का मुकाबला राजद और कांग्रेस से होगा।
दिल्ली की कहानी सिर्फ भाजपा की सफलता की नहीं, बल्कि यह उस पार्टी के पतन की भी कहानी है, जिसने भ्रष्टाचार मुक्त वैकल्पिक राजनीति के वादे से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा था। एक समय पर लोकप्रियता के चरम पर रही ‘आप’ के ग्राफ में भारी गिरावट इससे स्पष्ट है कि अरविंद केजरीवाल से लेकर इसके लगभग सभी शीर्ष नेता हार चुके हैं। केवल मुख्यमंत्री आतिशी और उनके कैबिनेट सहयोगी गोपाल राय ही दो ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अपनी सीटें बचाकर प्रतिष्ठा बचाई है। आप की हार ने महज 13 साल पुरानी पार्टी के भविष्य को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या वह इस हार से उबरकर अगली बार लड़ने के लिए जिंदा रह पाएगी? दिल्ली में हार का उसके शासन वाले दूसरे राज्य पंजाब पर क्या असर होगा, जहां 2027 की शुरुआत में चुनाव होने हैं?
निस्संदेह आप अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। यह एक ऐसी पार्टी है, जो एक व्यक्ति (अरविंद केजरीवाल) के व्यक्तित्व और छवि के इर्द-गिर्द घूमती है, जो खुद अपनी सीट गंवा चुके हैं। हालांकि केजरीवाल जुझारू हैं, लेकिन वह अच्छी तरह से परिभाषित विचारधारा से जुड़े वफादार कार्यकर्ता बनाने में विफल रहे हैं। उन्हें अपनी पार्टी को एकजुट रखने के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है, क्योंकि महत्वाकांक्षी विधायक और नेता नई संभावनाओं की तलाश में होंगे। उनकी परेशानियां सिर्फ दिल्ली तक ही सीमित नहीं हैं। उन्हें पंजाब में भी अपनी पार्टी के लिए सचेत रहना पड़ सकता है। वहां पहले से ही असंतोष और बेचैनी के संकेत मिल रहे हैं, क्योंकि आप की राज्य इकाई दिल्ली की हार की भयावहता और पार्टी के भविष्य पर इसके असर को लेकर चिंतित है। आने वाले हफ्तों में पंजाब में राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिल सकती है।
केजरीवाल और उनकी पार्टी जहां अपने अस्तित्व की समस्याओं से जूझ रही है, वहीं ‘इंडिया’ गठबंधन को भी आत्मनिरीक्षण करना होगा, जो लोकसभा चुनावों के बाद से ही बिखर रहा है और इसके कुछ सदस्य पिछले छह महीनों में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद उस पर निशाना साध रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री और इंडिया गठबंधन के सदस्य उमर अब्दुल्ला ने एक व्यंग्यात्मक ट्वीट में आगे आने वाली चुनौतियों का सार संक्षेप में प्रस्तुत किया है। दिल्ली में भाजपा की जीत को लेकर उन्होंने एक्स पर पोस्ट किया, ‘और लड़ो आपस में।’ जाहिर है, विपक्षी दलों को संसद और चुनावी मैदान, दोनों में भाजपा का सामना करने के लिए नई रणनीति पर पुनः विचार करना होगा।
चुनावी फैसले को प्रभावित करने वाले कई कारक होते हैं। अब जबकि हम चुनाव के बाद के आंकड़ों का इंतजार कर रहे हैं, ताकि यह विश्लेषण किया जा सके कि भाजपा ने किस तरह से कभी अजेय रही आप को करारी शिकस्त दी, तो तीन बातें बिल्कुल स्पष्ट हैं। पहला, पिछले कुछ वर्षों में केजरीवाल की छवि को काफी नुकसान पहुंचा है, क्योंकि उनके सरकारी बंगले को लेकर ‘शीश महल’ विवाद और आबकारी नीति घोटाले के कारण उन्हें और उनके कई वरिष्ठ नेताओं को जेल जाना पड़ा। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से उभरने के बाद जब वह खुद भ्रष्टाचार के घोटालों में उलझ गए, तो उनके लिए अपनी छवि को बनाए रखना असंभव हो गया। उन्होंने अपनी सीट खो दी, यह इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने अपनी सरकार पर लगे आरोपों की व्यक्तिगत रूप से कितनी कीमत चुकाई है।
दूसरा, दिल्ली जैसे बड़े पैमाने पर शहरीकृत शहर-राज्य में शासन मायने रखता है। दिल्ली में स्वास्थ्य और शिक्षा के बुनियादी ढांचे में स्पष्ट सुधार के साथ मुफ्त बिजली और पानी जैसी सुविधाएं देने वाला आप का बहुचर्चित शासन मॉडल 2020 के चुनाव जीतने के बाद बिखरने लगा। इसके दूसरे कार्यकाल में केंद्र और उपराज्यपाल के साथ लगातार तकरार, नागरिक सुविधाओं में गिरावट, प्लास्टिक कचरे और अन्य कूड़े के बढ़ते पहाड़, अनियंत्रित प्रदूषण और राजधानी को पेयजल आपूर्ति करने वाली यमुना के जहरीले पानी को साफ करने का अधूरा वादा देखा गया। नतीजतन दिल्ली जर्जर दिखने लगी और सरकार, जिसने नियमित सार्वजनिक परामर्श के माध्यम से शासन को लोगों के हाथों में सौंपने का वादा किया था, राजनीति के हावी हो जाने के कारण प्रशासन पर अपनी पकड़ खोती नजर आई। लोगों में आप के प्रति गुस्सा नहीं, बल्कि निराशा और मोहभंग की भावना थी।
भाजपा ने चतुराई से इसका फायदा उठाया और मोदी की गारंटी का लालच देकर खुद को एक ऐसी पार्टी के रूप में स्थापित करके इस शून्य को भरने की कोशिश की, जो अपने वादे पूरे करती है। तीसरा, चुनाव परिणामों से पता चलता है कि दिल्ली में वर्ग विभाजन बढ़ रहा है। यह चिंतित करने वाली प्रवृत्ति है। शहरी इलाकों में भगवा रंग के फैलाव से स्पष्ट है कि मध्यम वर्ग, जिसने कभी आप को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी, वह पूरी तरह से भाजपा के साथ एकजुट हो गया है। आप का वोट शेयर काफी अधिक है, जो भाजपा से कुछ ही प्रतिशत कम है। यह दर्शाता है कि गरीबों के बीच अब भी इसकी अपील बरकरार है। जीत के लिए ये संख्याएं पर्याप्त नहीं थीं, लेकिन यह विभाजन कुछ ऐसा है, जिसे आने वाली सरकार को सामाजिक संघर्षों को रोकने के लिए संबोधित करना होगा, जो अपराध दर और अन्य प्रकार के तनाव को बढ़ा सकता है।
भाजपा के लिए दिल्ली में जीत का इससे बेहतर क्षण नहीं हो सकता था। पार्टी का मनोबल फिर बढ़ रहा है, क्योंकि वह देश भर में अपना राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने की दिशा में बढ़ रही है। लोकसभा के नतीजों की याद तेजी से फीकी पड़ती जा रही है और पार्टी को उम्मीद है कि इसे जल्द ही भुला दिया जाएगा।