आपके अलावा मेरा यह काम और कोई नहीं कर सकता-औपचारिक कुशल क्षेम के बाद उन्होंने कहा।
मेरा सौभाग्य कि मैं आपके काम आऊं। काम बताएं।
साहित्यिक टच की कुछ गालियां चाहिए मुझे।
प्रथम कोटि के दिमाग को तृतीय कोटि के कामों में लगाना मुमकिन नहीं। नेता भले सार्वजनिक जीवन में खुद को अराजक घोषित कर दें, बंदा अपने चिंतन-लेखन में अराजक नहीं हो सकता-साहस बटोर बोल ही दिया।
आप सबसे करीबी इंटलेक्चुअल फ्रेंड हो, पोएटिक मदद भी चाहिए–‘शोभित कर नवनीत लिए’ वाली मुद्रा नजर आई। याद दिलाया उनको कि अमेठी में ताल ठोंकने वाले कवि ने दसेक साल पहले पोएटिक लाएसेंस लेकर जो कहा, उसका खामियाजा राजनीति में भुगत रहा है। गालियों से फजीहत की आशंका है। बेहतर है, ‘नानी याद दिलाने’ की घुड़की तक सीमित रहें। आपके पूर्वजों ने विरोधियों को ऐसे ही ललकारा था।
वांछित फल न मिलने पर असंतुष्ट भाव से नमस्ते कर अंतर्ध्यान हो गए वह।
चारित्रिक पतन के साथ भाषा में भी पर्याप्त गिरावट आई है माननीयों में। शालीनता और परिहास से चुटकी लेने वाले भूले-बिसरे गीत हैं। नित नवीन उपहास और कटाक्ष। बादल मंडरा रहे हैं चुनाव के। आरोपों-प्रत्यारोपों की मूसलाधार बारिश। गाली-गलौज की फुहार। कभी एक समाजवादी नेता द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री को गूंगी गुड़िया से अलंकृत करने पर शालीनता का उल्लंघन हुआ था। कालांतर में उसी दल के सांसद को ‘चिरकुट’ कहे जाने पर भाषा ‘असंसदीय’ हो गई थी। एक ताजा बने मुख्यमंत्री के लिए येडा, राक्षस सरीखे विशेषण भाषाई उत्कर्ष साबित हो रहे है। ‘लघु’ बोले, तो ‘मिनी’ स्तर पर उतर आए हैं कुत्ते कमीने का कॉपीराइट अभिनेताओं के पास। राजनीति में शब्द ततैये की तरह उपयोग करते हैं नेता। पत्थर की तरह सन्नाए जाते हैं शब्द। परस्पर व्यक्तिगत लांछन लगाने की वृत्ति संकेत दे रही है कि आने वाले चुनाव प्रचार में उपेक्षित और निरीह कीड़े-मकोड़ों को भी पर्याप्त भाव दिया जाएगा।
फिलहाल राजनीति जहरीली जमीन है, जहर बोए जा रहे हैं, किम आश्चर्यम कि चांडाल, शूद्रकल्प भ्रष्टाचार्य, भ्रष्टशिरोमणि, दुर्विनीत सरीखे अलंकरण छितर जाएं। आफ्टर ऑल उन्हें चुनाव संपन्न होने तक एक दूसरे को कोसना है, जिसके लिए मजबूत फेफड़े चाहिए। सीना किसी भी साइज का चलेगा।