इक्कीसवीं सदी में भारत का किसान बंधनों में नहीं, खुलकर खेती करेगा। जहां मन होगा, वहां अपनी उपज बेचेगा, बिचौलिए का मोहताज नहीं रहेगा और अपनी उपज व आय भी बढ़ाएगा। नए कानूनों ने किसानों को अनेक बंधनों से मुक्ति दिलाई है। इन सुधारों से किसानों को अपनी उपज बेचने के ज्यादा विकल्प और अवसर मिलेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने जो कृषि कानून बनाए हैं, वह किसानों के हित में हैं। लेकिन विपक्षी पार्टियां झूठ बोलकर किसानों को इस विषय पर भ्रमित करने की कोशिश कर रही हैं।
संसद में पारित इन तीनों कानूनों का विरोध पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विभिन्न किसान संगठनों द्वारा शुरू किया गया, जो जारी है। इन कानूनों को लेकर किसान संगठनों के मन में कुछ प्रश्न हैं, जैसे कि एमएसपी, मंडियों के खत्म होने का भय। वहीं, खेती के उद्योगपतियों के हाथों में चले जाने और कृषि में उनकी दखल को लेकर भी आशंका है। विपक्ष के विरोध को देखते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, ‘हम किसानों की आय को 2022 तक दोगुना करेंगे। यह उसी दिशा में एक कदम है, जिससे कि खुले बाजार में वस्तु का मूल्य बाजार आधारित नियंत्रित होगा। और जो नकदी फसलें हैं, उनसे बाजार में ज्यादा फायदा होगा। किसानों के लिए मंडी के अतिरिक्त एक और विकल्प है कि वे अपनी फसल कहीं भी बेच सकेंगे। और पहले की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था जारी रहेगी।
1991 के आर्थिक सुधारों के बाद कयास लगाए जा रहे थे कि इससे सेवा क्षेत्र में भारी नुकसान होगा, लेकिन आज हम देखते हैं कि सेवा क्षेत्र में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है। देश की तकरीबन 20 फीसदी जनसंख्या सेवा क्षेत्र पर निर्भर है, लेकिन वह जीडीपी का 60 फीसदी निर्धारित करती है, वहीं कृषि में 50 फीसदी से अधिक लोग जुड़े हैं, पर जीडीपी में इनका योगदान सिर्फ 16 फीसदी है। जिस प्रकार सेवा क्षेत्र में 1991 में सुधार हुए, वैसे ही 2020 में कृषि क्षेत्र में सुधार एक क्रांतिकारी कदम है। हमें तो इस बात की बेहद खुशी है कि ब्रज के आलू किसानों के लिए भी तरक्की के रास्ते खुलेंगे। अब तक ब्रज के अधिकांश आलू किसान बिचौलियों पर निर्भर थे। इसलिए उनका लाभ बिचौलियों में बंट जाता था। अब बिचौलियों की भूमिका खत्म होने से उन्हें सही दाम मिलेगा और आय बढ़ेगी।
कुछ राज्यों में जब फलों और सब्जियों को कृषि उत्पाद बाजार समिति (एपीएमसी) कानून से बाहर लाया गया, तो बड़ी संख्या में किसानों को उसका फायदा मिला था। अब अनाज उत्पादक किसानों को भी उसी तरह की आजादी मिलेगी। किसान मजबूत होंगे, तभी आत्मनिर्भर भारत की नींव भी मजबूत होगी। वर्तमान में एपीएमसी की ओर से विभिन्न वस्तुओं पर एक से दस फीसदी तक बाजार शुल्क लगता है, लेकिन अब राज्य के बाजारों के बाहर व्यापार पर कोई राज्य या केंद्रीय कर नहीं लगाया जाएगा। किसी एपीएमसी टैक्स या लेवी आदि का भुगतान नहीं होगा। खरीदार और विक्रेता, दोनों को लाभ मिलेगा। निजी कंपनियों और व्यापारियों की ओर से एपीएमसी टैक्स का भुगतान होगा, किसानों की ओर से नहीं।
किसान अनुबंध खेती के लिए प्राइवेट प्लेयर्स या एजेंसियों के साथ भी साझेदारी कर सकते हैं। अनुबंध खेती निजी एजेंसियों को उत्पाद खरीदने की अनुमति देगी-अनुबंध केवल उत्पाद के लिए होगा। निजी एजेंसियों को किसानों की भूमि के साथ अनुबंध करने की अनुमति नहीं होगी और न ही किसान की जमीन पर कोई निर्माण होगा। अभी किसान सरकार की ओर से निर्धारित दरों पर निर्भर हैं। लेकिन नए कानून में किसान बड़े व्यापारियों और निर्यातकों से जुड़ पाएंगे, जो खेती को लाभदायक बनाएंगे। नए कानून के तहत लागू एक समान केंद्रीय कानून सभी हितधारकों के लिए समानता का अवसर उपलब्ध कराएगा।
नए कानून कृषि क्षेत्र में अधिक निवेश को प्रोत्साहित करेंगे, क्योंकि इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। निजी निवेश खेती के बुनियादी ढांचे को और मजबूत करेगा और रोजगार के अवसर पैदा करेगा। एपीएमसी प्रणाली के तहत सिर्फ लाइसेंस प्राप्त व्यापारी, जिसे आढ़ती यानी बिचौलिया कहा जाता है, को अनाज मंडियों में व्यापार करने की अनुमति थी, लेकिन नया विधेयक किसी को भी पैन नंबर के साथ व्यापार करने की अनुमति देता है।
(लेखक सांसद और भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)