जम्मू-कश्मीर में जब-जब चुनाव का समय आया, तब-तब पाकिस्तान ने इसे विफल करने का प्रयास कर विश्व विरादरी को दिखाने की कोशिश की कि यहां की जनता प्रजातंत्र में विश्वास नहीं करती। जबकि इस साल पहले लोकसभा चुनाव में, फिर अभी विधानसभा चुनाव के दो चरणों में भारी मतदान कर जनता ने दिखा दिया है कि वह अलगाववादियों की चालों को सफल नहीं होने देगी। पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के चुनाव में व्यवधान डालने की शुरुआत सितंबर, 2013 से ही कर दी थी। पर सेना ने धैर्य का परिचय देते हुए तोपखाना और हवाई ताकत का इस्तेमाल किए बगैर केरान सेक्टर में घुसपैठ की पाक कोशिशों को विफल किया।
कुख्यात पाक एजेंसी आईएसआई अब पूर्वोत्तर भारत में भी जाल फैलाने की कोशिश कर रही है। विगत अक्तूबर में पश्चिम बंगाल के बर्दवान बम धमाकों में बांग्लादेश के आतंकी गुट हरकत उल मुजाहिदीन की संलिप्तता पाई गई। बर्दवान में आतंकी समूह बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की हत्या करने और अवामी लीग की सरकार को सत्ता से हटाने की तैयारी कर रहा था। इस तरह पाकिस्तान दुनिया को यह दिखाने की कोशिश कर रहा था कि भारत बांग्लादेश में आतंकी हरकतों को बढ़ावा दे रहा है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जम्मू-कश्मीर में केंद्रीय सुरक्षा बलों को सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून यानी अफ्सपा के तहत अधिकार प्राप्त हैं, ताकि वे बिना समय गंवाए आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई कर सकें। जबकि बर्दवान में पूरे 25 दिन बाद, वह भी गृह मंत्रालय के दबाव के बाद केंद्रीय जांच संस्थाएं कुछ कर पाईं।
दुनिया जानती है कि पाकिस्तान का उद्देश्य जम्मू-कश्मीर पर कब्जा करना है। इन हालात में यदि अफ्सपा के तहत सेना जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए तत्पर न रहती, तो बर्दवान या मुंबई जैसी घटना अक्सर देखने को मिलती। अफ्सपा के तहत केंद्र सरकार राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर किसी राज्य या क्षेत्र को अशांत घोषित कर वहां केंद्रीय सुरक्षा बलों को तैनात करती है। इसकी धारा चार के अनुसार, सुरक्षा बल का अधिकारी संदेह होने पर किसी भी स्थान की तलाशी ले सकता है और खतरा होने पर उस स्थान को बर्बाद करने के आदेश दे सकता है। इसकी धारा छह के अनुसार संदेह होने पर वह किसी को गिरफ्तार कर सकता है। अफ्सपा का अर्थ यह नहीं कि हमारी सेना जो चाहे, वह करे। भारतीय सेना का मानवाधिकार संरक्षण में ऊंचा स्थान है। जम्मू-कश्मीर के पंडितों को अलगाववादियों ने डरा-धमकाकर भगा दिया। पर सूबे के किसी मुस्लिम नागरिक को शायद ही अपना घर छोड़ना पड़ा। पाक सेना अपने ही राज्य बलूचिस्तान में तोपों एवं हवाई शक्ति का प्रयोग करती है। जबकि हमारी सेना ने इस साल आई बाढ़ में जम्मू-कश्मीर के लोगों की हरसंभव सहायता की।
अनुच्छेद 370 का विरोध करने वालों को सोचना चाहिए कि इस प्रकार के प्रावधान सिक्किम, हिमाचल प्रदेश तथा पूर्वोत्तर के राज्यों में भी हैं, जिसका उद्देश्य पहाड़ी राज्यों की संस्कृति तथा पर्यावरण को बचाना है। इन हालात में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने के बारे में सोचने से पहले वहां के नागरिकों को सुरक्षा की भावना के बारे में आश्वस्त करना होगा। इसलिए यह कश्मीरी जनता के हित में है कि वह अफ्सपा को रहने दे और अनुच्छेद 370 को भी तब तक न छेड़ा जाए, जब तक वहां की जनता न चाहे।