तालिबान ने हाल ही में स्टेडियम में एक शख्स को सार्वजनिक रूप से फांसी दी थी। इसका कोई कारण नहीं बताया गया। बाद में इतना जरूर कहा गया कि सरकार ने अपने सर्वोच्च नेता हिब्तुल्ला अखुंदजादा से मंजूरी लेने के बाद ही फांसी दी थी। पिछले तीन साल में सार्वजनिक फांसी की यह चौथी घटना थी। इससे अफगान नागरिकों का तालिबान से विश्वास उठ गया है। उनका मानना है कि तालिबान अपने दुश्मनों का इसी तरह से सफाया कर रहा है।
तालिबान ने महिला पत्रकारों को लेकर नया फरमान जारी किया है कि वे बड़े पैमाने पर मीडिया प्लेटफॉर्म पर तब तक न जाएं, जब तक उन्होंने शरीयत के हिसाब से पूरी पोशाक न पहनी हो। उनकी सिर्फ आंखें ही दिखाई दें और बाकी चेहरे का हिस्सा ढका हुआ होना चाहिए। ऐसा नहीं करने पर उन्हें सजा दी जाएगी। गौरतलब है कि अफगान महिलाएं पहले से ही नौकरी करने को लेकर बड़े पैमाने पर पाबंदी झेल रही हैं। महिलाओं की शिक्षा पर तो पाबंदी है ही, उन्हें ब्यूटी पार्लर में भी काम करने की भी इजाजत नहीं है। तालिबान ने बिना पारिवारिक मर्द के महिलाओं की हवाई यात्रा पर भी पाबंदी लगा रखी है। हालांकि तालिबान सरकार ने अपनी जरूरत के मद्देनजर महिलाओं को मेडिकल में दाखिला लेने की इजाजत दे दी है।
तालिबान सरकार पत्रकारों को भी स्वतंत्रता से काम करने नहीं दे रही। ऐसे 168 मामले सामने आए हैं, जिनमें पत्रकारों को पीटा गया अथवा गिरफ्तार किया गया है। पत्रकार संगठनों की आलोचना और मांग के बाद तालिबान सरकार ने भरोसा दिलाया है कि जिन पत्रकारों को जेल में डाला गया है, उन्हें जल्दी रिहा कर दिया जाएगा।
हाल ही में कांधार में एक आतंकवादी हमले में कई लोग मारे गए और कई जख्मी भी हुए। उस घटना की जिम्मेदारी आईएस ने ली। अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट के आतंकवादी कम से कम दो से ढाई हजार की संख्या में हैं। गौरतलब है कि अफगान तालिबान और आईएस एक-दूसरे के कट्टर विरोधी हैं। इसके अलावा, हजारों की संख्या में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के लड़ाके अफगानिस्तान में छिपे हुए हैं, जो समय-समय पर पाकिस्तान में घुसकर आतंकी घटनाओं को अंजाम देते हैं।
हाल ही में टीटीपी ने पाकिस्तान में एक सैनिक चौकी पर हमला किया, जिसमें कई सैन्य अफसर व सैनिक मारे गए। इसके दो दिन बाद ही जवाबी कार्रवाई करते हुए पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में टीटीपी के गुप्त ठिकानों पर जवाबी हमले किए, जिसमें कई बेकसूर महिलाओं व बच्चों की मौत हो गई। इसके बाद से दोनों देशों में तनाव बढ़ गया है। अमेरिका ने दोनों देशों को संयम बरतने की सलाह दी है।
जहां तक भारत की बात है, तो हाल ही में भारत का एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल काबुल में तालिबान के नेताओं से मिला था और बैठक में दोनों देशों के रिश्तों और आर्थिक संबंधों पर बातचीत हुई थी। तय हुआ था कि दोनों देश ईरान के सहयोग से चारबहार बंदरगाह के जरिये व्यापार करेंगे। इस बंदरगाह को पाकिस्तान की ग्वादर बंदरगाह के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि भारत ने अफगानिस्तान को अभी तक मान्यता नहीं दी है।
वहां अल्पसंख्यक हिंदू व सिख गिनती के ही रह गए हैं, जो वहां से निकलने की फिराक में हैं। सीएए के अनुसार, वहां 20 लाख से ज्यादा हिंदू और सिख थे, जिनमें से अधिकतर भारत आ चुके हैं और उन्हें नागरिकता दी जा रही है। बहुत से खिलाड़ी, संगीतज्ञ व रंगमंच कलाकार तालिबान के अत्याचारों से तंग आकर देश से पलायन कर गए हैं।
तालिबान पर किसी भी सूरत में भरोसा नहीं किया जा सकता। वे अपने वादों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं, जिससे अफगान नागरिकों का जीना मुश्किल हो गया है। इसलिए जरूरी है कि अब अंतरराष्ट्रीय बिरादरी मानवीय आधार पर इसमें दखल दे और हालात को सुधारने के लिए ठोस कदम उठाए।