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ट्रंप-मोदी के भरोसे अफगानिस्तान

Fri, 14 Jul 2017 12:03 PM IST
कुलदीप तलवार
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कुलदीप तलवार
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा से ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान के उन आतंकी संगठनों को सबक सिखाने के लिए तैयार थे, जो आईएसआई के इशारे पर अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना के खिलाफ आतंकी हमलों को अंजाम देते हैं। इससे पहले अमेरिकी रक्षा मंत्री जेम्स मेटिक ने भी खुले शब्दों में तालिबान के मजबूत होने की बात सीनेट की सेना सेवा समिति के सामने स्वीकार की थी। इस पर समिति के अध्यक्ष सीनेटर जॉन मैकन ने ट्रंप प्रशासन की आलोचना करते हुए कहा था कि ट्रंप को शासन में आए छह महीने हो चुके हैं, पर अभी तक वह अफगानिस्तान के लिए नीति नहीं ला पाए हैं। अफगानिस्तान में तालिबान की बढ़ती हुई ताकत का मुकाबला करने के लिए अमेरिकी फौज की तैनाती में बढ़ोतरी भी कर सकता है। इन उम्मीदों को उस वक्त पंख लग गए, जब मोदी अमेरिका पहुंचे और ट्रंप से मुलाकात के दौरान अफगानिस्तान में बढ़ती अस्थिरता पर गहरी चिंता व्यक्त की। दोनों नेताओं ने इस्लामी आतंकवाद को समूल नष्ट करने का संकल्प लिया। इससे साफ पता चलता है कि ट्रंप प्रशासन चाहता है कि पाकिस्तान इस क्षेत्र में और अफगानिस्तान के खिलाफ आतंकवाद को हर सूरत में बंद करें।
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देखा जाए, तो मोदी और ट्रंप की मुलाकात से जो उम्मीद लगाई जा रही थी, वह पूरी होती नजर नहीं आ रही है। बजाय इसके कि भारत के अमेरिका से रिश्ते उतने ही घनिष्ठ हैं, जितने ओबामा के जमाने में थे। यह भी सामने आया कि अमेरिका ने अफगानिस्तान में हिंसा रोकन के लिए पांच हजार अतिरिक्त अमेरिकी सैनिक भेजने का फैसला ले लिया है। दस हजार अमेरिकी फौजी वहां पहले से तैनात हैं, पर इससे कुछ हासिल होने वाला नहीं है। ओबामा के शासनकाल में अमेरिकी और नाटो फौज की संख्या तेरह हजार तक पहुंच गई थी, फिर भी तालिबान पर काबू नहीं पाया जा सका।

याद रहे कि ट्रंप ने ओबामा के दौर में कहा था कि अमेरिकी फौज को अफगानिस्तान से वापस बुला लिया जाए, क्योंकि हम उनके लिए स्कूल और सड़कें बना रहे हैं, जो हमसे नफरत करते हैं। इधर यह भी देखने में आ रहा है कि ट्रंप प्रशासन ने पाक में आतंकवादियों की पनाहगाहों पर ड्रोन हमले तेज कर दिए हैं। जहां तक सवाल पाक को अमेरिकी मदद बंद करने का है, तो अभी तक अमेरिका इस मामले में चुप है। अमेरिका की खुफिया एजेंसियों को पाक की खुफिया एजेंसी आईएसआई की मदद की जरूरत बराबर बनी रहती है। अगर आईएसआई से तालमेल नहीं रहता, तो अमेरिका की अफगानिस्तान में मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। आम तौर पर यह माना जाता है कि अमेरिका केवल अमेरिका का मित्र है।
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अफगानिस्तान को शिकायत है कि पाकिस्तान की पनाहगाहों में शरण लिए हुए आतंकवादी पाक के इशारे पर अफगानिस्तान में विध्वंसक कार्रवाई कर रहे हैं। दूसरी तरफ पाक को शिकायत है कि अफगान-तालिबान डूरंड सीमा पार करके पाकिस्तान में हिंसा फैला रहे हैं। पाकिस्तान अफगानिस्तान से इसलिए भी नाराज है कि वह भारत के बहुत निकट होता जा रहा है। पाकिस्तान चाहता है कि किसी तरह से भारत को अफगानिस्तान से निकाला जाए, फिर वहां एक ऐसी तालिबान की सरकार कायम हो, जो उसकी उंगलियों पर नाचे। युद्धग्रस्त अफगानिस्तान में अमेरिका और भारत का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। इसलिए उम्मीद करनी चाहिए कि अमेरिका अफगानिस्तान को अकेला नहीं छोड़ेगा। अब देखना यह है कि मोदी और ट्रंप के संयुक्त बयान पर कितना अमल होता है?
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