आधुनिक जीवनशैली के लिए शहरीकरण जरूरी है। लेकिन, अराजक तरीके से बढ़ते शहरों के झुग्गी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं को पहुंचाना सरकारों के लिए चुनौती बनता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, आज हर तीन भारतीयों में से एक व्यक्ति शहरों या कस्बों में रहने लगा है। 2050 तक भारत की आधी आबादी महानगरों में रहने लगेगी। ऐसे में सबको बराबर सुविधाएं तो नहीं दी जा सकती हैं, लेकिन सभी की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करना सरकार की जिम्मेदारी भी है और समग्र सामाजिक विकास की जरूरत भी।
रोजगार की तलाश में गांवों या कस्बों से पलायन करने वाले लोग ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक धन कमाते हैं। इस हिसाब से वे राष्ट्रीय आय में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इधर, सभी का बैंक एकाउंट, बढ़ता टैक्स का दायरा और रोजगार के क्षेत्र में कुशलता की मांग के कारण स्लम्स एरिया के लोग भी अब सामाजिक तौर पर ज्यादा मुखर हुए हैं। वहीं, वैश्विक स्तर पर सतत विकास लक्ष्य को हासिल करने के लिए भी शहरी गरीबों के हालत में सुधार बहुत जरूरी है। इसीलिए, विगत दशकों में शहरी विकास के ढांचे में धीरे-धीरे विकसित होती झुग्गी बस्तियों के अस्तित्व को वैध किए जाने और वहां बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने की मांग बढ़ने लगी है।