दरअसल वर्ष 2014 में रूस द्वारा क्रीमिया को मिला लेने पर अमेरिका ने मास्को पर प्रतिबंध लगाए थे। और अगर अब रूस यूक्रेन पर हमला करता है, तब उस पर अमेरिका के अलावा यूरोपीय संघ के नए प्रतिबंधों का भी खतरा है, हालांकि इस मामले में वे एकतरफा प्रतिबंध लगाने के बजाय कूटनीतिक पहल के जरिये मसले का हल निकालना चाहेंगे। सोवियत गणराज्य के पतन के बाद अमेरिका ने रूस पर अपनी मनमानी थोपने की कोशिश की, क्योंकि रूस कमजोर था और ज्यादातर यूरोपीय देश अमेरिका के पाले में खड़े थे। लेकिन आज रूस न सिर्फ अपनी कमजोरियों से उबर गया है, बल्कि नए शक्ति केंद्र के रूप में उभर चुका है और चीन की मदद से, जो नए वैश्विक समीकरण में अमेरिका का घोषित शत्रु है, उस महाशक्ति देश को चुनौती दे रहा है।
बड़े देशों के इस आपसी द्वंद्व में भारत मुश्किल स्थिति में फंस गया है, क्योंकि अमेरिका की ओर उसके झुकाव ने रूस को नाराज कर दिया है, जो अमेरिका को कमजोर करने के लिए चीन के साथ खड़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि जरूरी समय में पुराने दोस्त रूस पर भरोसा कर भारत ने सही फैसला किया है। देश हित में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका से पांच अरब डॉलर का मिसाइल सौदा करने के बजाय पुतिन की हालिया भारत यात्रा के दौरान उनसे लगभग एक दर्जन समझौते किए। इसका नतीजा भी देखने को मिला, जब भारत के तालिबान-विरोध के मुद्दे पर रूस हमारे साथ खड़ा रहा, जबकि बाइडन प्रशासन ने पाकिस्तान का पक्ष लिया और तालिबान के साथ दोहा बैठक में भारत को अलग-थलग कर दिया।
हालांकि रूस की अंदरूनी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। चूंकि रूसी नागरिक बेहतर जीवन स्तर, बढ़ी हुई आय और सुखद भविष्य की मांग कर रहे हैं, ऐसे में, पुतिन और वहां का समृद्ध वर्ग पसोपेश में है, क्योंकि आम जनता की उम्मीदें पूरी न हुईं, तो पुतिन का सत्ता में बने रहना मुश्किल हो सकता है। अपनी सत्ता के विरुद्ध भीतरी और बाहरी, वास्तविक और काल्पनिक खतरों से पुतिन इतने सशंकित हैं कि उन्होंने नागरिकों की आजादी पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। पिछले दो दशक में रूस में सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि जो युवा पीढ़ी पुतिन के सत्ता काल में बड़ी हुई है, उसे खुले विमर्श का अर्थ मालूम नहीं है, और न ही वह जानती है कि लोकतंत्र का मतलब क्या है।
कोविड-19 महामारी ने भी रूसी अर्थव्यवस्था को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया है। हालांकि महामारी के दौरान रूस का प्रदर्शन कुछ विकसित देशों की तुलना में अच्छा ही रहा है। इसके बावजूद व्यापक संक्रमण और कम टीकाकरण के कारण वहां गंभीर संकट पैदा हुआ है, जो समाज में पुतिन-विरोधी जनमत पैदा कर सकता है। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए पुतिन को असाधारण काम करना होगा। तब तो और भी, जब विश्व बैंक ने रेखांकित किया है कि वर्ष 2020 में रूस की विकास दर में तीन फीसदी कमी आई है, जबकि उस साल वैश्विक स्तर पर विकास दर में औसतन 3.8 फीसदी की और विकसित अर्थव्यवस्थाओं में 5.4 प्रतिशत की गिरावट आई।
विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक, 2021 में रूस की विकास दर बढ़कर 4.3 फीसदी हो सकती है, लेकिन अगले दो साल में यह दर घटकर क्रमशः 2.8 फीसदी और 1.8 प्रतिशत रह सकती है। विश्व बैंक का आकलन है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में निरंतर सुधार, कच्चे तेल की तुलनात्मक रूप से ऊंची कीमत और कोविड-19 के मोर्चे पर सुधार से रूस में घरेलू मांग में वृद्धि होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष 2024 में होने वाले चुनाव में पुतिन अगर आत्मविश्वास के साथ अपनी दावेदारी पेश करते हैं, तभी बात बनेगी, अन्यथा आने वाले वर्षों में वहां बदलाव होते रहेंगे। अगर पुतिन के पक्ष में स्थिति बनी रही, तो उनकी उम्र और विपक्षी नेता नवलनी के जेल में होने के कारण वर्ष 2036 तक वह सत्ता में बने रह सकते हैं।
रूस तेल और गैस का निर्यातक होने के कारण यूरोप और एशिया में एक प्रभावशाली ताकत है। हालांकि वर्ष 2014 में कच्चे तेल की कीमत में आई भारी गिरावट के बाद पुतिन ने सिर्फ ऊर्जा निर्यात के बजाय आर्थिक मोर्चे पर रूस के विस्तार और विविधीकरण पर जोर दिया है। सोवियत गणराज्य के ध्वंसावशेष से निकलकर रूस फिर से एक बड़ी ताकत बनने की संभावना जता चुका है। पुतिन ने वादा किया है कि अगर जनता ने उनका साथ दिया, तो वह रूस को एक बार फिर महान देश में तब्दील कर देंगे। क्रीमिया पर कब्जा करने और अपने पड़ोसी देशों के खिलाफ युद्ध छेड़ने से पुतिन की छवि ही खराब हुई है।
पुतिन की नीतियों के कारण पड़ोसी देश जहां रूस से डरते हैं, वहीं वैश्विक परिदृश्य में पुतिन की झूठी और अविश्वसनीय छवि बनी है। फिलहाल मास्को बाइडन प्रशासन की उस धारणा को झूठ साबित करने में लगा है कि 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में रूस ने हस्तक्षेप कर डोनाल्ड ट्रंप को जिताया था। यह तथ्य है कि बाइडन के नेतृत्व में चीन से लड़ रहे अमेरिका ने रूस से अपना रिश्ता सुधारने की कोई कोशिश नहीं की है। ऐसी स्थिति में, भारत के लिए थोड़ी मुश्किल जरूर है, लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वह अपने हित को देखते हुए फैसले ले रहा है।