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अरबी माटी में हिंदी की बयार

उमेश चतुर्वेदी
Updated Mon, 11 Feb 2019 06:15 PM IST
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उमेश चतुर्वेदी

भारतीयता और स्थानीयता की बात करना पिछड़ेपन की निशानी माना जाने लगा है। दुर्भाग्यवश अपने उच्च प्रशासनिक और न्यायिक तंत्र में भी ऐसी सोच रखने वाले लोग हैं। ऐसे लोगों के लिए अबू धाबी का फैसला आंख खोलने वाला हो सकता है।


 

जब अपने ही देश में हिंदी और भारतीय भाषाएं अंग्रेजी के वर्चस्व के सामने जूझ रही हों, तब दूर-देश से हिंदी के समर्थन में खबर आती है, तो वह राहत ही महसूस कराती है। अरब देश संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से आई खबर निश्चित तौर पर भारतीय भाषाओं में सरकारी और न्यायिक कामकाज होने का सपना देखने वाले लोगों के लिए उत्साह की वजह बन सकती है।


यूएई के अबू धाबी के न्यायिक विभाग ने अपने यहां न्यायिक सुनवाई की भाषा के तौर पर हिंदी को भी मंजूरी दे दी है। इसके पहले वहां अरबी और अंग्रेजी में ही न्यायिक और प्रशासनिक कामकाज होता था। लेकिन भारतीयों की इस देश में बढ़ती संख्या के मद्देनजर वहां की सरकार ने हिंदी में भी न्यायिक सुनवाई और फैसला सुनाने की व्यवस्था को मंजूरी दे दी है। 


अब जरा अपने देश को देखिए। यहां भारतीय भाषा अभियान को इसके लिए लगातार संघर्ष करना पड़ रहा है। भारत के समाजवादियों और राष्ट्रवादियों में भले ही तमाम मुद्दों पर विरोध हो, लेकिन कुछ मुद्दों के साथ भाषा भी ऐसा मुद्दा है, जिस पर दोनों समान सोच रखते हैं। दोनों की ही मांग रही है कि भारतीय भाषाओं को प्रशासनिक और न्यायिक तंत्र में तरजीह दी जाए। लेकिन इस विचार के दुश्मन अंग्रेजी माध्यमों से पढ़े-लिखे वे लोग ही रहे हैं, जो प्रशासनिक और न्यायिक तंत्र के उच्च और प्रभावी पदों पर विराजमान हैं।


यह विरोधाभास नहीं तो और क्या है कि अंग्रेजी की एबीसीडी भी न जानने वाले शख्स को यह पता नहीं होता कि उसने अपने अधिकार और इंसाफ के लिए हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जो अपील दायर की है, उसमें उसकी बात रखी भी गई है या नहीं। ऐसे में जो न्याय हो रहा है, वह सचमुच में हो भी रहा है या नहीं, यह न तो वादी को सही तरीके से पता होता और न ही प्रतिवादी को। न्याय की भाषा में कहा जाता है कि न्याय को होता हुआ दिखना भी चाहिए।


लेकिन सांविधानिक प्रावधानों के चलते क्या ऐसा संभव हो पाता है?  अपने को सभ्य मानने वाली लोकतांत्रिक प्रणालियां कम से कम इस मोर्चे पर खुद को ईमानदार दिखाने की कोशिश जरूर करती हैं। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में जब कोई गैर अंग्रेजी भाषी व्यक्ति निरुद्ध किया जाता है या गिरफ्तार किया जाता है, तो उसे बाकायदा उसकी भाषा का अनुवादक मुहैया कराया जाता है। 



अब जरा भारत की स्थिति पर नजर डालते हैं। आजाद भारत में जब भी भारतीय लोगों को भारतीय भाषाओं में इंसाफ देने की मांग सामने आती है, संविधान के अनुच्छेद 348 का खंड (1) का उपखंड (क) आड़े आ जाता है। जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की कार्यवाही अंग्रेजी भाषा में किए जाने का प्रावधान है।
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हालांकि इसी अनुच्छेद के खंड (2) के तहत किसी राज्य का राज्यपाल उस राज्य के हाईकोर्ट में हिंदी भाषा या उस राज्य की राजभाषा का प्रयोग राष्ट्रपति की अनुमति से प्राधिकृत कर सकता है। इसी के तहत 1972 में देश के चार राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश के हाईकोर्ट को हिंदी में भी सुनवाई करने की स्वीकृति मिली।


भारत में जब भी कोई उच्च न्यायपालिका में भारतीय भाषाओं में अपनी बात रखने की कोशिश करता है, उस पर व्यंग्य किए जाते हैं या फिर उसे अपनी बात रखने से रोक दिया जाता है। अब तो ऐसा माहौल है कि भारतीयता और स्थानीयता की बात करना पिछड़ेपन की निशानी माना जाने लगा है। दुर्भाग्यवश अपने उच्च प्रशासनिक और न्यायिक तंत्र में भी ऐसी सोच रखने वाले लोग हैं।


ऐसे लोगों के लिए अबू धाबी के न्यायिक विभाग का फैसला आंख खोलने वाला हो सकता है।
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