मध्यमवर्गीय होना देश में सर्वाधिक हानिकारक है। स्थिति सदैव त्रिशंकु की सी बनी रहती है। समझ नहीं आता कि जिंदगी के चार दिन कैसे काटने हैं। ऊपर देखते हैं, तो लगता है कि ऊपर वालों की ऐश ही ऐश है। अपने से नीचे वालों को हिकारत की नजर से देखना मजबूरी बन जाता है।
पड़ोसी ने जबसे अपने घर में एसी फिट कराया है, तब से मन दुविधा में है कि पड़ोसी का सामना कैसे करूं? उसके बच्चे मेरे बच्चों को हिकारत से देखते हुए कई बार चिढ़ा भी चुके हैं कि एसी में बैठने के बाद तो बाहर निकलने का मन नहीं करता। अब तक एसी को शरीर के लिए हानिकारक बताकर बच्चों को भ्रमित करता रहा हूं।
बच्चों की समझ में कुछ नहीं आता, सो मुझ पर दवाब बनाते हैं-पड़ोस के अंकल के पास कार भी नहीं है, इनका तो कोई ऑफिस भी नहीं है। बाजार में लेडीज चप्पलों की दुकान चलाते हैं। पापा आप तो ऑफिस जाते हैं। आपके ऑफिस में एसी भी है, फिर आप घर में एसी क्यों नहीं लगवाते ?
मैं अपने आप को उत्तर देने के लिए तैयार करता हूं-बच्चों मैं तुम्हारे स्वास्थ्य से खिलवाड़ नहीं चाहता। सुख-सुविधाओं से जितना बचोगे, उतने ही लाभ में रहोगे। वैसे भी एसी खरीदना इतना मुश्किल नहीं है, हजार रुपये की इएमआई में एसी खरीदा जा सकता है, पर एसी का खर्चा इएमआई से ज्यादा आएगा। बच्चे कुछ भी सुनने के मूड में नहीं हैं। मैं कहता हूं, पड़ोसी बिजली की चोरी करके एसी चलाता है, मैं ऐसा नहीं कर सकता।
अब तो बड़े बेटे के सब्र का बांध ही टूट गया, उसने कहा-पापा, आप नेता क्यों नहीं बन जाते? मैंने पूछा, नेता और एसी का क्या संबंध है ? बेटा झुंझलाया, पापा आप टीवी से चिपके रहते हैं, क्या आप नहीं जानते कि नेताओं के लिए एसी की कोई अहमियत नहीं है। दिल्ली में एक मोहतरमा के बंगले में इकत्तीस एसी लगे थे और हमें एक भी नसीब नहीं है।
मैंने पूछा, इकत्तीस एसी का क्या करती थी वह? बेटा बोला-चाहे कुछ भी करती हो, मगर इकत्तीस एसी थे। अब उनके जवाब में एक नेता जी के बंगले में अड़तालीस एसी लगे हैं। वाशरूम से लेकर घर के स्टोर तक।
मैं खीज गया। आम आदमी का मजाक इससे अधिक भला कैसे उड़ाया जा सकता है! वैसे भी सियासी हमाम में सब एक से ही होते हैं, ऐसे में किसी को एसी की क्या कमी?