भारत 1947 के बाद दोबारा टूटा नहीं, तो इसलिए नहीं कि उसे ‘टुकड़े-टुकड़े’ करने के प्रयास नहीं हुए हैं। सबसे पुरानी साजिश थी कश्मीर को भारत से अलग करने की। देश के स्वतंत्र होने के कुछ ही समय बाद पाकिस्तान से तथाकथित कबाइली कश्मीर को ‘आजाद’ कराने आए थे। वे श्रीनगर के इतने पास पहुंच गए थे कि कश्मीर घाटी को बचाने के लिए भारतीय सेना को समय पर न भेजा जाता, तो कौन जाने, घाटी का इतिहास कैसा होता।
कश्मीर को बचा क्या लिया कि खालिस्तान बनाने के लिए कुछ लोगों ने हथियार उठाए और आतंक फैलाकर भारत सरकार का विरोध किया। इस सिलसिले में जब स्वर्ण मंदिर के अंदर सेना भेजने की नौबत आई, तो संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले उस लड़ाई में मरने के बाद इतने बड़े नायक बन गए कि पंजाब में आतंकवाद समाप्त करने के लिए पूरा एक दशक लगा। कश्मीर घाटी और पंजाब में अलगाववाद की आगें सुलग ही रही थीं कि जेहादी आतंकवाद ने अपना सिर उठाया। तब तक भारत के टुकड़े करने वालों के हौसले इतने बुलंद हो गए थे कि हाफिज सईद जैसे लोगों ने खुलकर अपने भाषणों में कहना शुरू कर दिया कि भारत के खिलाफ उनका युद्ध तभी समाप्त होगा, जब दिल्ली के लाल किले पर एक बार फिर इस्लाम का झंडा लहराएगा।
पिछले बीस साल में जेहादी आतंकवादियों ने संसद पर हमले किए हैं और मुंबई शहर में दो बार इतने बड़े आतंकी हमले किए हैं कि उनके होने के बाद कुछ समय तक यानी 1993 और 2008 में ऐसा लगने लगा था कि भारत की अखंडता को वास्तव में खतरा है। आज भी कश्मीर घाटी, पंजाब और पूर्वोत्तर के हमारे राज्यों में भारत के दुश्मन देश को तोड़ने का पूरा प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में पिछले सप्ताह सरकार ने कन्हैया कुमार और उनके साथियों पर कानूनी तौर पर राजद्रोह का मुकदमा लगाकर क्या ठीक नहीं किया है? क्या उनके ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाल्लाह, इंशाअल्लाह’ वाले नारे को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए, जो उन्होंने अफजल गुरु को याद करते हुए जेएनयू में लगाए थे? क्या उस व्यक्ति को हीरो बनाना, जिसे संसद को उड़ाने की कोशिश के षड्यंत्र में फांसी हुई है, अपने आप में राजद्रोह नहीं है?
इन सवालों के जवाब स्पष्ट होने चाहिए। लेकिन है नहीं। ऐसा इसलिए कि वह लोकतंत्र ही है, जिसके कारण अभी तक भारत के ‘टुकड़े, टुकड़े’ नहीं हुए हैं। लोकतंत्र हर भारतीय को अपनी बात कहने की आजादी देता है, चाहे वह बात कितनी गलत क्यों न हो। सो जैसे किसी प्रेशर कुकर में भाफ निकलने से वह फटने से बचता है, वैसा ही काम भारत में लोकतंत्र करता है। ऊपर से छात्रों पर वैसे भी राजद्रोह जैसा गंभीर आरोप उनका भविष्य हमेशा के लिए खराब करने का काम करता है। सो अक्सर जिन देशों में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती हैं, वहां छात्रों पर इतने गंभीर आरोप नहीं लगाए जाते हैं।
छात्रों के स्वभाव में विरोध होता है। उनके रगों में अक्सर क्रांति की आग होती है। सो मैं विनम्रता से यह कहना चाहूंगी कि कन्हैया कुमार समेत दूसरे युवाओं पर राजद्रोह का मुकदमा दायर कर केंद्र सरकार ने एक किस्म से देश को कमजोर करने का काम किया है और उनके हाथ मजबूत किए हैं, जो भारत को तोड़ने का प्रयास दशकों से कर रहे हैं। भारत का कद अगर दुनिया की नजरों में पाकिस्तान और चीन जैसे देशों से ऊंचा है, तो उसका कारण एक ही है-हमारा लोकतंत्र, हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं की ताकत। लोकतंत्र को कमजोर करना भारत के लिए नुकसानदेह है।