आपसे वाबस्ता कुछ बातें जमाने से मन का एक कोना घेरे हुए हैं। सोचा, आज कह डालूं, सो कलम उठा ली है। सबसे पहले तो यही पूछने की चाहत है कि आखिर किस मिट्टी के बने हैं आप? हमारे दौर में तो लोग फाइव मिनट फेम हासिल करके ही खुद को धन्य मानने लगते हैं, और आप हैं कि पिछले करीब सात सौ बरस से हिंदुस्तानियत का पर्याय बने हुए हैं। इस देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्होंने शायद आपका नाम भी नहीं सुना होगा, लेकिन वे सदियों से बेहद अपनेपन के साथ आपके रचे-गढ़े को बरत रहे हैं। आखिर कहां नहीं हैं आप? हमारे मुहावरों में आप हैं। लोकोक्तियों में आप हैं। लोकगीतों में आप हैं।
पहेलियों में आप हैं। शास्त्रीय संगीत में आप हैं। यही नहीं, हमारे कानों में रस घोल रहे कई अहम वाद्ययंत्र भी आप ही की बदौलत आकार हासिल कर सके। अचरज होता है कि आखिर ऐसा कैसे मुमकिन हुआ? वह भी तब, जब आप एक ऐसी भाषा में लिख रहे थे, जो अभी अपनी जमीन तलाश ही कर रही थी। उसे हिंदवी से हिंदी तक का सफर तय करने में अभी सदियां लगनी थीं। आखिर आपने हिंदुस्तानियत का ऐसा रसायन कैसे तैयार किया कि आपके लिखे गीत अब भी जिंदा हैं? टीवी, यू-ट्यूब के इस दौर में चलन भले ही कम हो गया हो, लेकिन बहुत कठिन है डगर पनघट की गुनगुनाने वाले आज भी मिल जाते हैं। दूर-देस ब्याही गई बेटी का दर्द बयान करने वाले गीत जो आप रच गए, उससे आगे अब तक नहीं लिखा जा सका है-काहे को ब्याहे बिदेस अरे, लखिय बाबुल मोरे, काहे को ब्याहे बिदेश/ भैया को दियो महले दुमहले, हमको दियो परदेस...। सावन में ससुराल में सूनापन महसूस कर रही बेटी के दुख को आखिर आपने इतनी शिद्दत से कैसे महसूस कर लिया था, अम्मा मेरे बाबा को भेजो री कि सावन आया/ बेटी बाबा तेरा बूढ़ा री कि सावन आया...।
वसंत के स्वागत में रचा गया आपका गीत तो वाकई अद्भुत है, सकल बन फूल रही सरसों, बन बिन फूल रही सरसों...। कहां तक गिनाऊं, ऐसे गीत अनगिनत हैं। भौचक रह जाना पड़ता है, जब पता चलता है कि कृष्ण भक्ति का छाप तिलक सब छीनी रे, मोसे नैना मिलाई के जैसा सूफियाना कलाम आप ही का कमाल है। कहते हैं, कव्वाली की रवायत भी आपकी ही देन है। इस दौर के बच्चे भले ही कार्टूनों के दीवाने हों, लेकिन अभी 30-35 वर्ष पहले, हमारे बचपन में दोस्तों से पहेलियां पूछना मानसिक मनोरंजन का आम जरिया था। बड़े हुए, तो पता चला कि उनमें से तमाम पहेलियां आप ही की कलम से निकली थीं। संगीत के क्षेत्र में भी आपका दखल इस कदर रहा कि उसका असर आज तक बना हुआ है। आपने कई राग तो रचे ही, इकतारे को तीन तारों के इस्तेमाल से सितार की शक्ल देने में अहम भूमिका निभाई। एक जिंदगी में कई जिंदगियां जीना इसे ही कहते हैं।
आप तो गोरी सोवत सेज पर, मुख पर डारे केस/चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुं देस कहकर चले गए, लेकिन आप के लिखे गीत गाते हुए, आपकी रची पहेलियां बूझते हुए, आपके हाथों गढ़े गए वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल करते हुए करोड़ों हिंदुस्तानी जाने-अनजाने फिर-फिर आप को पुकारते हैं। और इस बहाने हिंदुस्तान के हिंदुस्तान होने के मायने गढ़ते हैं। नादान हैं वे लोग, जो इस हिंदुस्तान को बदलने निकले हैं। जब तक आप लोगों के जेहन में जिंदा हैं, तब तक वे लाख चाहकर भी हिंदुस्तान की तासीर नहीं बदल पाएंगे। आपसे ज्यादा अगर किसी और की हिंदुस्तान के लोगों के जेहन में पैठ है, तो वह हैं, गोस्वामी तुलसीदास। लेकिन तुलसीदास को भी राम का आसरा है। वह राम के प्रति समाज में पहले से ही स्थापित अगाध आस्था के जरिये घर-घर पहुंचते हैं। आपको तो ऐसी कोई सहूलियत नसीब नहीं थी।
आखिर में बस एक बात और। सुना है, वहां जन्नत में जिस मोहल्ले में आप रहते हैं, वहीं हिंदी के हमारे एक और महान पुरखे प्रेमचंद का भी डेरा है। कभी मिलें, तो कहिएगा कि उनका लिखा-कहा सब अकारथ गया। कहने को वह अब भी उपन्यास सम्राट कहलाते हैं, लेकिन उनकी रचनाओं ने जो रोशनी पैदा की, वह कहीं गुम हो गई है। अंधेरा है। बहुत गहरा।