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गन्ना किसान हों नीति के केंद्र में, ये क्यों जरूरी है बता रहे हैं केसी त्यागी

के सी त्यागी Published by: के. सी. त्यागी Updated Fri, 18 Sep 2020 02:11 AM IST
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sugarcane farmers

वर्ष 1930 के बाद की महामंदी की चर्चाएं इस दौर में उदाहरण के तौर पर स्मरण की जा रही हैं। विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं लगभग चौपट हैं। महामारी और मंदी, दोनों ने समूचे आर्थिक ढांचे को तहस-नहस कर दिया है। भारत समेत तीसरी दुनिया के देश भी नित नए आंकड़ों के मकड़जाल से नहीं निकल पा रहे हैं। भारत में जीडीपी दर के नकारात्मक असर दिखने शुरू हो गए हैं। सभी क्षेत्रों में आई गिरावट भयंकर स्तर की है। करोड़ों बेरोजगारों को अभी हाथ पर हाथ रखे ही बैठना है। छोटे और लघु कुटीर उद्योग, सभी सरकारी प्रयासों के बावजूद न तो उत्पादन बढ़ा पा रहे हैं और न ही रोजगार के अवसर।



कृषि क्षेत्र में रबी की फसल के बंपर उत्पादन ने देश को बड़ी मुसीबत से बचाया है, वर्ना सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये करोड़ों लोगों को मुफ्त और सस्ता राशन उपलब्ध कराना आसान नहीं था। गन्ना, चावल, तिलहन, दलहन की बंपर फसल के आसार दिख रहे हैं। मौसम ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई है। प्रधानमंत्री ने कई अवसरों पर किसानों की आय दोगुनी करने का संकल्प दोहराया है। आधा दर्जन से अधिक योजनाएं अस्तित्व में आ रही हैं, पर नीति निर्धारक समस्या के मूल में जाने से निरंतर संकोच कर रहे हैं। रबी और खरीफ की फसलों के दामों में तीन से पांच फीसदी तक की मामूली वृद्धि ही संभव हो पाई है। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें भी धूल खा रही हैं, जिसमें किसानों को उनकी फसलों की लागत से 50 फीसदी ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देना शामिल है।


नीति आयोग के कार्यबल ने चीनी उद्योग को लेकर वृहत योजना बनाई है, जिसमें चीनी मिल मालिकों को राहत देने के दर्जनों नुस्खे मौजूद हैं, लेकिन गन्ना उत्पादकों के लिए कोई राहत की खबर नहीं है। लगभग पांच करोड़ किसान गन्ना उत्पादन के व्यवसाय से जुड़े हैं। अभी लगभग 50 लाख हेक्टेयर में गन्ने की बुवाई हो रही है। लगभग पांच लाख श्रमिक चीनी मिलों में कार्यरत हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा चीनी का उपभोक्ता देश है और विश्व में ब्राजील के बाद सबसे बड़ा चीनी उत्पादक भी है। भारत में गन्ने का अनुमानित वार्षिक उत्पादन लगभग 35.5 करोड़ टन है, जिससे लगभग तीन करोड़ टन चीनी का उत्पादन होता है। भारत में लगभग 2.6 करोड़ टन चीनी की खपत भी है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और बिहार बड़े चीनी उत्पादक राज्य हैं, जो पूरे देश का लगभग 80 फीसदी गन्ने का उत्पादन करते हैं। उत्तर प्रदेश अकेले 46 फीसदी गन्ने का उत्पादन करने की क्षमता रखता है। देश में अभी करीब 530 चीनी मिल कार्यरत हैं, जिनमें दो तिहाई निजी क्षेत्र में हैं।


नीति आयोग के कार्यबल का निष्कर्ष है कि गन्ना उत्पादक किसान मुनाफे में हैं। गन्ना किसानों का मुनाफा अन्य कृषि उत्पादों के मुकाबले 60 से 70 फीसदी तक है। इस पेशे में लगे किसानों को गन्ने का लाभकारी मूल्य मिलता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस समय अकेले उत्तर प्रदेश में किसानों का चीनी मिलों पर लगभग 14,200 करोड़ रुपये बकाया हैं, जबकि नीति आयोग ने माना है कि लगभग दो तिहाई गन्ना मूल्य का भुगतान तुरंत कर दिया जाता है। प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री कई अवसरों पर सार्वजनिक रूप से घोषणा कर चुके हैं कि 14 दिन के अंदर गन्ना किसानों का भुगतान किया जाएगा और देर से भुगतान करने पर ब्याज देना होगा।


इसी बीच, केंद्र सरकार द्वारा दो घोषणाएं की गई हैं, जिसमें मिल मालिकों को राहत देते हुए चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य 31 रुपये किलो से बढ़ाकर 33 रुपये किया गया है। नीति आयोग का निष्कर्ष है कि गन्ने का मूल्य चीनी के भाव के आधार पर तय होना चाहिए। नीति आयोग की अधिकांश सिफारिशें रंगराजन फॉर्मूले पर आधारित हैं, जिसमें कहा गया है कि मिल मालिकों द्वारा उत्पादन में आए खर्च के आकलन को आधार बनाकर गन्ने की कीमत तय होनी चाहिए। इसे किसान हितों के विरुद्ध एक षड्यंत्र के रूप में देखा जा रहा है और दर्जनों किसान संगठनों ने विरोध भी शुरू कर दिया है। उनका मानना है कि इससे मूल्य निर्धारण के समय मिल मालिकों का पक्ष हावी रहेगा और समूची मूल्य निर्धारण प्रक्रिया बाजार के हवाले हो जाएगी। इस प्रावधान में रिकवरी रेट के साथ जुड़ी शर्त किसानों को परेशान करने वाली है। अभी तक केंद्र सरकार एफआरपी यानी उचित एवं लाभकारी मूल्य निर्धारित करती रही है। उत्तर प्रदेश समेत कई राज्य सरकारें इसके बाद राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) की घोषणा करती हैं, जो केंद्र सरकार के मूल्य से अधिक होता है। पिछले कई वर्षों से गन्ने के एफआरपी में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। 


हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने गन्ने की कीमत में मात्र 10 रुपये की बढ़ोतरी की घोषणा की है। उत्तर प्रदेश के किसान संगठनों का मानना है कि बिजली, पेट्रोल, डीजल, उर्वरक, आदि के बढ़ते दामों को देखते हुए यह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में पहले से एसएपी के जरिये गन्ने की 315 से 325 रुपये की दर निर्धारित हैं, जबकि किसान संगठनों

का आकलन है कि बढ़ी लागत के हिसाब से यह कम से कम 400 रुपये क्विंटल होना चाहिए। नीति आयोग की सिफारिश लागू होने पर किसान राज्य परामर्श मूल्य से भी हाथ धो बैठेंगे।
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समय-समय पर सरकार चीनी मिलों को राहत पैकेज प्रदान करती रही है। पिछले दिनों 5,538 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की गई। इससे पूर्व भी चीनी मिलों के लिए 8,500 करोड़ रुपये का दूसरा राहत पैकेज दिया गया था, जिसमें 4,400 करोड़ों रुपये एथनॉल क्षमता के विकास हेतु सस्ते कर्ज के रूप में दिया गया। इससे पूर्व केंद्र सरकार द्वारा चीनी के आयात शुल्क को 40 से बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया गया, ताकि चीनी मिलों द्वारा गन्ना उत्पादकों के बकाये की भुगतान क्षमता प्रभावित न हो। विश्व व्यापार संगठन से जुड़े होने के कारण भी किसानों के हित सुरक्षित नहीं रह पाते। 


समय की मांग है कि चीनी उद्योग के समग्र विकास के लिए किसान हितों को प्राथमिकता मिले। खाद्य, बिजली, डीजल, उर्वरक, आदि पर किसानों को राहत दिया जाए, ताकि लागत मूल्य कम हो सके। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, 15 दिन में भुगतान न होने पर ब्याज सहित वसूली हो और किसान संबंधी नीतिगत निर्णय में उनकी भी सक्रिय भूमिका हो।

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