हम सभी को बड़े सपने देखना पसंद है और हमें लगता है कि उनमें से कई सपने सच होंगे। स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, अपराध, राजस्व संकलन और निवेश जैसे कई मामलों में हर भारतीय राज्य एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करता है। किस राज्य में कौन-सी परियोजना स्थापित की जाती है, यह तय करने में केंद्र सरकार के प्रभाव को कम करने के लिए पिछले कुछ वर्षों में लगभग हर राज्य ने किसी न किसी रूप में वैश्विक निवेशक सम्मेलन आयोजित की है। उसमें सबसे ज्यादा वाइब्रेंट गुजरात इन्वेस्टर्स मीट रहा है, जो वैश्विक और भारतीय निवेशकों के जमावड़े का एक भव्य अवसर बन गया है।
विभिन्न राज्यों में इन आयोजनों के बाद एक समयावधि के लिए नई परियोजनाओं पर कई हजार करोड़ रुपये के निवेश की घोषणाएं होती हैं। राज्य मशीनरी इन आयोजनों पर किए गए रिकॉर्ड समझौता ज्ञापन (एमओयू) का दावा करती हैं, ताकि राज्य के नागरिकों के बीच सर्वांगीण विकास की उम्मीद पैदा हो। इनमें से कई एमओयू कागजों पर ही रह जाते हैं, क्योंकि स्वयं राज्य सरकार द्वारा कई जरूरी मंजूरी नहीं मिल पाती है। मूल रूप से जितनी घोषणाएं होती हैं, उससे कम ही निवेश हो पाता है। हाल के वर्षों में केंद्र द्वारा घोषित निवेश परियोजनाओं का संभवतः यही अनुभव रहा है।
वास्तव में, सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के आंकड़ों के अनुसार, 2018-19 नए निवेश प्रस्तावों में गिरावट का लगातार चौथा वर्ष था। थोड़ा पीछे देखें, तो नए निवेश प्रस्ताव काफी मजबूत हुए थे, वर्ष 2006-07 से वर्ष 2010-11 के पांच वर्षों के दौरान नए निवेश प्रस्ताव का औसत ढाई सौ खरब रुपये वार्षिक था। पर उसके बाद उसमें तेजी से गिरावट आई, क्योंकि वर्ष 2013-14 में नए निवेश प्रस्ताव घटकर मात्र सौ खरब रुपये तक रह गए।
वर्ष 2014-15 में एक नई और आशाजनक सरकार ने इस गिरावट को रोका। 2014-15 में निवेश प्रस्तावों को स्मार्ट तरीके से 210 खरब रुपये तक बढ़ाया गया। वर्ष 2015-16 में तुलनात्मक रूप से नया निवेश प्रस्ताव दो सौ खरब रुपये का था। पर यह बढ़त थोड़े समय के लिए थी और निवेश के कुल आकार के मामले में पहले की तेजी से कम थी। पहले की तेजी की तरह भारत फिर कभी प्रचुर निवेश नहीं प्राप्त कर सका। वर्ष 2018-19 में यह गिरकर 121 खरब रुपये रह गया, जो 2010 के निवेश प्रस्ताव 257.3 खरब के आंकड़े का मात्र 46 फीसदी है। और, 2019-20 के पहले छह महीनों के दौरान, 78.9 खरब रुपये की परियोजनाएं पहले ही निरस्त कर दी गई हैं। निवेश परियोजनाओं को निरस्त करने की बातें तभी होती हैं, जब स्थिति गंभीर होती है। मूलतः ताजा निवेश की घोषणाएं हो रही हैं, उन्हें संशोधित किया जा रहा है और फिर उन्हें निरस्त किया जा रहा है।
निवेश विकास और उपभोग का प्रमुख चालक है। इसका तर्क काफी सीधा है-निवेश से रोजगार सृजित होता है, रोजगार से लोगों को आमदनी होती है। पैसा होने पर लोग उसे खर्च करते हैं और इससे उपभोग को बढ़ावा मिलता है और दूसरे लोगों को भी आय कमाने में मदद मिलती है। ये आय कमाने वाले भी पैसा खर्च करते हैं और उपभोग को एक और प्रोत्साहन देते हैं। तो इस तरह से चक्र चलता है। जाहिर है, निवेश बढ़ाए बिना नौकरियां पैदा नहीं की जा सकतीं। लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेश का परिदृश्य बेहद चिंताजनक है।
वैश्विक वित्तीय संकट से पहले सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात में निवेश वर्ष 2007-08 में 35.81 फीसदी के चरम पर था, जो अगले कुछ वर्षों में घटता रहा और केवल 2011-12 में फिर से बढ़कर 34.31 फीसदी हुआ। यह मुख्य रूप से वित्तीय संकट के बाद सरकारी खर्च में वृद्धि के कारण हुआ। इन वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने कई परियोजनाओं पर कर्ज दिया, जो बाद में बुरे कर्ज (एनपीए) में बदल गया। कुछ हद तक मोदी सरकार का आर्थिक मूढ़ता के लिए यूपीए-दो को दोष देना सही है।
लेकिन इस सरकार ने भी कॉरपोरेट भारत की चिंताओं को दूर करने के लिए पर्याप्त काम नहीं किया है, जो अर्थव्यवस्था को चलाता है। नए निवेश के आंकड़े स्पष्ट बताते हैं कि इस समय कॉरपोरेट भारत निवेश करने में रुचि नहीं ले रहा है। उपभोक्ताओं की तरह उन्हें आर्थिक भविष्य पर कम भरोसा है। इस संकोच और मंदी की प्रवृत्ति का परिणाम बेरोजगारी के मोर्चे पर देखा जा सकता है।
नई परियोजनाओं में निवेश को लेकर सरकार की भूमिका भी उत्साहजनक नहीं है। जबकि नए निवेश प्रस्तावों में सार्वजनिक क्षेत्र की हिस्सेदारी निजी क्षेत्र से अधिक रही है, लेकिन वर्ष 2018-19 में सार्वजनिक क्षेत्र के नए निवेश प्रस्तावों का मूल्य इतना कम है कि वह ध्यान देने योग्य नहीं है।
वर्ष 2018-19 में सरकार संचालित परियोजनाओं की घोषणा मात्र 30 खरब रुपये की रही। यह वर्ष 2017-18 के सरकार द्वारा प्रस्तावित 53 खरब रुपये मूल्य की परियोजनाओं की तुलना में काफी कम है।
अगर हम 2015-16 के आंकड़े पर ध्यान दें, तो सार्वजनिक एवं निजी, दोनों क्षेत्रों ने सौ-सौ खरब रुपये के नए निवेश का प्रस्ताव दिया था। उसके बाद सार्वजनिक क्षेत्र का योगदान घटकर 30 खरब रुपये तक गिर गया, जबकि निजी क्षेत्र का योगदान दोगुने से ज्यादा घटकर 2018-19 में 64 खरब रुपये रह गया। इस गिरावट ने इन्फ्रास्ट्रक्चर, रेलवे और यहां तक कि सेवा जैसे कई क्षेत्रों को बुरी तरह प्रभावित किया, जो अर्थव्यवस्था और जीडीपी को प्रभावित करता है। सड़क, रेलवे, शिपिंग और लॉजिस्टिक में नए निवेश प्रस्तावों में गिरावट 2018-19 के कुल नए निवेशों में गिरावट से अधिक है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में कहा है कि अर्थव्यवस्था मंदी के दौर में नहीं है। वह सही हैं, क्योंकि मंदी एक ऐसी स्थिति है, जब जीडीपी लगातार दो तिमाहियों में नकारात्मक रही। पर हम ऐसे किसी सकारात्मक घटनाक्रम से दूर नहीं हैं, जो अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला सके। इस समय सरकार को निवेश परियोजनाओं पर खर्च बढ़ाने की जरूरत है, जो रुका हुआ है या जिसकी रफ्तार सुस्त है। जब तक ऐसा नहीं होता, चीजें सामान्य नहीं होंगी।