संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने जो भाषण दिया, उसमें कुछ भी मौलिक नहीं था। सामान्य तौर पर पाकिस्तान भारत की इसी तरह से आलोचना करता आया है, इसमें नई पाकिस्तानी लाईन यह थी कि उसने खुद को आतंकवाद से पीड़ित बताया। यह सही है कि पाकिस्तान को आतंकवादियों से काफी कुछ सहना पड़ा है, लेकिन वे आतंकवादी पाकिस्तान के भीतर ही पैदा होते हैं, जबकि हमें जिन आतंकवादियों का सामना करना पड़ता है, वे पाकिस्तान से आते हैं।
पाकिस्तानी नेतृत्व को इस अंतर को समझने की जरूरत है और यह वह बिंदु है, जिसे अमेरिका ने बार-बार दोहराया है। हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने न्यूयॉर्क में नवाज शरीफ से एक मुलाकात में कहा कि भले ही वह आतंकवादियों से मुकाबला करने में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की सराहना करते हैं, लेकिन पाकिस्तान को सभी आंतकवादियों को उसकी जमीन का सुरक्षित पनाहगाह के रूप में उपयोग करने से रोकने की जरूरत है।
हैरानी की बात नहीं शरीफ ने अपने भाषण में जानबूझकर असुविधाजनक तथ्यों का जिक्र नहीं किया। इसलिए जब उन्होंने घोषणा की कि बुरहान वानी 'कश्मीरी इंतिफादा' (लोकप्रिय और शांतिपूर्ण आजादी का आंदोलन) का प्रतीक था, तो उन्होंने इस तथ्य की उपेक्षा कर दी कि वास्तव में वानी एक गुरिल्ला संगठन का सरगना था, जिसका मुख्यालय पाकिस्तान में है और वह लड़ाके की वर्दी में तस्वीर खिंचवाना पसंद करता था और वैश्विक इस्लामी खलीफा की वकालत करता था।
पाकिस्तान को खुद से यह सवाल पूछने की जरूरत है कि कैसे वह उस व्यक्ति का राजनीतिक और नैतिक समर्थन कर सकता है, जो वास्तव में आतंकवादियों और गुरिल्लाओं की सेना को वित्तीय सहायता, हथियार और प्रशिक्षण देता था, जिसे भारतीय सुरक्षा बलों ने मार गिराया। जिन कश्मीरियों की तरफ से नवाज शरीफ संयुक्त राष्ट्र में बोल रहे थे, उन्हीं कश्मीरियों का उसने खून बहाया था और यातनाएं दी थीं।
कश्मीर पर भारत के नियंत्रण को 'अवैध' बताते हुए भी शरीफ सच से मुंह चुरा रहे थे। जिस व्यवस्था के तहत अंग्रेजों ने भारत से अलग पाकिस्तान का निर्माण किया, उसमें रियासतों को यह छूट थी कि स्वतंत्र रूप से वह भारत या पाकिस्तान किसी में शामिल हो सकते हैं। यदि भारत या पाकिस्तान का हिस्सा बनने के लिए राज्यों के सामने धार्मिक आधार प्रमुख तत्व था, तो जिन्ना ने कैसे 1947 में जूनागढ़ के विलय को स्वीकार कर लिया, जो कि गुजरात का व्यापक रूप से हिंदु बहुल राज्य था? रियासतों पर जिन्ना का रुख कांग्रेस को शर्मिंदा करने के उद्देश्य से था, क्योंकि वह जानते थे कि ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा रही ज्यादातर रियासतें भारत में शामिल होना चाहेंगी।
इसी आधार पर उन्होंने कलात के खान (आधुनिक बलूचिस्तान) के वकील के रूप में उनका प्रतिनिधित्व किया और तर्क दिया कि कलात को स्वतंत्र राज्य होने का पूर्ण अधिकार था, विडंबना यह थी पंडित नेहरू और कांग्रेस ने इसे मानने से इन्कार कर दिया और तर्क दिया कि रियासतों की स्वायत्तता केवल वैधानिक कल्पना थी, वे ब्रिटिश साम्राज्य की जागीर थे। जब जिन्ना ने सरदार पटेल को रियासतों को भारतीय संघ में एकीकरण करवाने में सफल होते देखा, तो उन्होंने अपना पैंतरा बदला और पाकिस्तानी सेना को बलूचिस्तान पर कब्जे के लिए भेज दिया।
शरीफ ने कश्मीरियों के आत्म-निर्णय के वायदे पर जोर दिया और सुरक्षा परिषद के कुछ प्रस्तावों का हवाला दिया, जिनमें इसका 'वायदा' किया गया था। लेकिन यहां भी उन्होंने आधा सच ही कहा। 1948 का सिर्फ एक प्रस्ताव प्रभावी है, जिसमें कहा गया था कि पहले संघर्ष विराम हो, उसके बाद जम्मू-कश्मीर से पाकिस्तान के सभी नियमित और अनियमित बलों की वापसी हो और उसके बाद ही वहां जनमत संग्रह हो सकता है। पाकिस्तान ने सुरक्षा बलों की वापसी की पहली शर्त को ही पूरा नहीं किया, इसी कारण जम्मू-कश्मीर में जनमत सर्वेक्षण नहीं हो सका। पाकिस्तान इतिहास की अनदेखी करके कश्मीर का राग अलाप रहा है, जबकि पुल के नीचे से काफी पानी बह चुका है।
संयुक्त राष्ट्र ने इस मुद्दे के समाधान की काफी कोशिश की, जैसा कि रूस ने ताशकंद में और अंग्रेजों और ने अमेरिकियों ने भी 1950 और 1960 के दशक में किया, लेकिन वे सभी अब कहते हैं कि इस मुद्दे के समाधान का एकमात्र उपाय भारत और पाकिस्तान के बीच सीधी बातचीत है। वास्तव में पाकिस्तान ने भी 1972 के शिमला समझौते में द्विपक्षीय वार्ता के जरिये इस मुद्दे को सुलझाने की प्रतिबद्धता जताई थी। इसलिए हैरानी की बात नहीं कि जब शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र से इसमें दखल देने की मांग की, तो संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने भी उन्हें यही कहा कि भारत के साथ संवाद ही इसका एकमात्र उपाय है। शरीफ और पाकिस्तान का उद्देश्य इस मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करना है। इसी कारण उन्होंने इस मुद्दे को दक्षिण एशिया में सामरिक स्थिरता से जोड़ दिया, जिससे परमाणु युद्ध का भय तक पैदा हो गया है।
लेकिन जो लोग शरीफ के कामकाज पर नजर रखते हैं, उनका कहना है कि उन्होंने जो भाषण दिया, वह दिल से नहीं था। वह बस पहले से तैयार भाषण को पढ़ रहे थे और यह उनके हाव-भाव से प्रकट हो रहा था। उनके भाषण को रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय में सावधानीपूर्वक तैयार किया गया था, जो पिछले तीन वर्षों से सफलतापूर्वक शरीफ के पंखों को कतर रहा है। सबसे पहले ताहिर उल कादरी और इमरान खान के तहरीक-ए इंसाफ द्वारा आंदोलन किया गया, फिर पनामा पेपर्स के खुलासे से शरीफ को भारी झटका लगा।
शरीफ जब सत्ता में आए, तो मुशर्रफ के साथ उनके अनुभवों को देखते हुए लोगों को लगा कि वह सेना पर नियंत्रण रखेंगे और पाकिस्तान के आर्थिक एजेंडे को आगे बढ़ाएंगे। प्रधानमंत्री मोदी उनके साथ इस एजेंडे पर काम करने के इच्छुक थे, लेकिन शीघ्र ही यह एहसास हो गया कि शरीफ चुके हुए व्यक्ति हैं। आज जब वह 2018 के आम चुनाव की तरफ बढ़ रहे हैं, शरीफ का कद बहुत छोटा हो गया है।