धर्मशास्त्रों में बीमारों और असहायों की सेवा करने और परिश्रम कर ही धनार्जन करने की बात कही गई है। जो व्यक्ति गलत तरीकों से धन कमाता है अथवा श्रम करने से बचता है, उसका कभी कल्याण नहीं हो सकता है। इसी से जुड़ा एक प्रसंग गुरु गोविंद सिंह का है, जो एक दिन अनुयायियों को धर्म और न्याय की रक्षा के लिए तत्पर रहने और अपना समय सेवा तथा सहायता में लगाने की प्रेरणा दे रहे थे। उनके सद्वचनों को सभी ध्यानपूर्वक सुन रहे थे। उन्हें प्यास लगी, तो वह बोले, कोई पवित्र हाथों से पीने के लिए पानी लेकर आए।
एक शिष्य तुरंत अपने सामने के घर में गया और चांदी के गिलास में निर्मल जल भरकर ले आया। उसने गिलास आगे बढ़ाते हुए कहा, जल ग्रहण कीजिए, गुरुजी महाराज। शिष्य ने शिष्य के हाथ से गिलास ले लिया। वह बोले, पुत्र, तुम्हारे हाथ तो अत्यंत कोमल हैं।
शिष्य ने कहा, गुरुजी, हाथ इसलिए कोमल हैं कि मुझे इनसे काम नहीं करना पड़ता। आपके आशीर्वाद से हमारे परिवार में नौकर-चाकर काम करते हैं। हाथों से तनिक भी श्रम नहीं करना पड़ता। यह सुनकर गुरुजी ने कहा, मैं ऐसे हाथों का जल ग्रहण नहीं कर सकता, जो सेवा, सहायता या श्रम जैसे पवित्र कार्यों से पावन न हुए हों। वही हाथ पवित्र होते हैं, जो सेवा करते हैं। सेवा और श्रम किए बिना शरीर अपवित्र ही रहता है। गुरु गोविंद सिंह के शब्दों ने शिष्य का जीवन बदल डाला। उसने उसी दिन से सेवा-कार्य शुरू कर दिया।