पांडव द्वैत वन में चलते-चलते थककर वटवृक्ष के नीचे विश्राम करने लगे। उन्हें प्यास लगी, तो नकुल पानी लेने एक कुंड पर पहुंचे। उन्होंने पानी लेना चाहा, तो यक्ष की आवाज सुनाई दी, माद्री पुत्र, इस कुंड पर मेरा अधिकार है। मेरे प्रश्नों का उत्तर देकर ही पानी पी सकते हो।
नकुल ने परवाह नहीं की तथा प्यास बुझाने के लिए जैसे ही पानी का घूंट भरा कि वह अचेत होकर गिर पड़े। सहदेव, अर्जुन और भीम, तीनों कुंड पर पानी पीने आए और बेहोश होकर गिर पड़े। उनकी मृत्यु हो गई।
धर्मराज युधिष्ठिर ने यह दृश्य देखा, तो वह यक्ष की शक्ति को समझ गए। उन्होंने यक्ष से कहा, आप प्रश्न करें, मैं उत्तर दूंगा। यक्ष ने पूछा, धर्म का एकमात्र साधन क्या है? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, दक्षता धर्म का एकमात्र साधन है। यक्ष का दूसरा प्रश्न था, यश किस एक ही उपाय से प्राप्त होता है? उत्तर मिला, यश लाभ का एकमात्र उपाय दान है। यक्ष का तीसरा प्रश्न था, स्वर्ग प्राप्ति का एकमात्र साधन क्या है?
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, एक शील ही सुख का मूल है। यक्ष प्रश्न करते रहे और धर्मराज युधिष्ठिर उनके उत्तर देते रहे। यक्ष ने अंतिम प्रश्न किया, इस जगत में आश्चर्यजनक क्या है? युधिष्ठिर ने कहा, प्राणी यह जानते हैं कि मृत्यु सत्य है। बावजूद वे अनंतकाल तक जीवित रहना चाहते हैं। इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है! युधिष्ठिर के तमाम जवाबों से यक्ष संतुष्ट थे। उन्होंने उनके चारों भाइयों को जीवित कर दिया।