सेवा-परोपकार जैसे सत्कर्म तभी पुण्यदायक होते हैं, जब उनके पीछे कोई कामना नहीं होती। संत इब्राहीम यह संदेश देते हुए लोगों को खुदा की भक्ति में लगने और दुर्गुणों का त्याग करने की प्रेरणा दिया करते थे। उनका नियम था कि प्रतिदिन किसी भूखे को भरपेट खिलाने के बाद ही वह स्वयं खाना खाते थे।
एक दिन उनके घर कोई नहीं आया। इब्राहीम किसी भूखे व्यक्ति की तलाश में घर से निकले। एक वृद्ध व्यक्ति उन्हें दिखा। भोजन कराने का आग्रह कर वह उसे साथ ले आए। घर में इब्राहीम ने उसके हाथ-पैर धुलवाए और उसके सामने भोजन की खाली रख दी। उस भूखे ने खाने के लिए जैसे ही ग्रास उठाया, इब्राहीम ने उसे रोकते हुए कहा, तुम तो अजीब आदमी हो। खाने से पूर्व खुदा को याद ही नहीं किया। वृद्ध ने कहा, मैं तुम्हारे मजहब का नहीं हूं। मैंने मन ही मन अग्नि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर दी है। इब्राहीम को यह अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कहा, खुदा के प्रति आदर न रखने वाले मुझे पसंद नहीं। वह वृद्ध भूखा ही चला गया।
इब्राहीम रात के समय बिस्तर पर लेटे ही थे कि उन्हें लगा कि खुदा कह रहे हैं, अरे पागल इतनी आयु तक जिसकी प्रतिदिन खुराक की मैं व्यवस्था करता रहा हूं, उसे तू एक समय भी आदर से नहीं खिला सका। अतिथि की न जात पूछनी चाहिए, न उसके सत्कार में शर्त रखनी चाहिए। तूने पाप किया है। इब्राहीम ने तुरंत ही आगे ऐसा न करने की शपथ ले ली।