स्वाधीन भारत में प्रकाशित हिंदी और भाषायी समाचार पत्रों के प्रकाशकों, संपादकों और संचालकों को स्वाधीनता संग्राम के दौर की पत्रकारिता की विश्वसनीयता, निर्भयता, मिशन और लोकप्रियता तो विरासत में प्राप्त हो गई है, लेकिन उन आदर्शों, संघर्षों और सामाजिक सरोकारों की कसौटी पर वह पूरी तरह खरे उतरे या नहीं, इसकी परीक्षा अभी होनी है। 1947 से 1950 के बीच देश में भारतीय भाषाओं में छोटे-बड़े दर्जनों नए समाचार पत्रों का प्रकाशन हुआ था। यह इस बात का प्रमाण था कि अंग्रेजी भाषा की जगह प्रांतीय भाषाएं प्रमुखता से अंग्रेजी पत्रकारिता का स्थान ले रही हैं। यह एक नई पत्रकारिता का उदय था।
आजादी के बाद पत्रकारिता मिशन और व्यवसाय के सम्मिलित रूप में सामने आई, जो अब धीरे-धीरे विशुद्ध व्यावसायिक बन गई है। इसी दौर में 18 अप्रैल, 1948 को आगरा में अमर उजाला ने आकार ग्रहण किया था। दो श्रमजीवी पत्रकारों- श्री डोरीलाल अग्रवाल और श्री मुरारीलाल माहेश्वरी के संकल्प, संघर्ष और सहभागिता का प्रयास था, जो आज 75 वर्ष बाद एक मजबूत वटवृक्ष बन चुका है। अमर उजाला ने अपने पहले संपादकीय में लोकतंत्र, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता को अपना आधार बनाया था। देश में विभाजन की त्रासदी की डरावनी छाया विद्यमान थी। इन्हीं मूल्यों और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर अमर उजाला की नीति और आचार संहिता तय हुई थी। उस समय प्रकाशन में नई टेक्नोलॉजी और पूंजी दोनों का अभाव था, लेकिन अमर उजाला ने हमेशा अपनी नीतियों में मिशन और व्यवसाय का समन्वय किया है। दो पन्ने वाले एक छोटे अखबार ने आज जो दूरी तय की है, वह दूसरे समाचार पत्र संस्थानों की तुलना में अपनी अलग भूमिका निभा रहा है।
अमर उजाला की भूमिका आज रचनात्मक और प्रयोगात्मक होने के साथ सिद्धांतवाद से भी प्रेरित है। सात दशकों की इस यात्रा में अमर उजाला ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। आज वह ऐसी मजबूत स्थिति में पहुंच गया है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए जूझने की क्षमता और ढृढ़ इच्छाशक्ति भी रखता है। जनता की पीड़ा को स्वर देने और उनके संघर्षों में भागीदार बनने के लिए भी तैयार है। इस दौर में अमर उजाला की परीक्षाएं बार-बार हुई हैं। जैसे आपातकाल की स्थिति के दौरान बड़े साहस के साथ आपातकाल का विरोध करते हुए संपादकीय पृष्ठ को खाली छोड़ देना पूरे प्रकाशन के लिए एक बहुत साहसिक निर्णय था। 25-26 जून, 1975 को आपातकाल की घोषणा के बाद 28 जून को आगरा में जो बैठक श्री डोरीलाल अग्रवाल ने बुलाई थी, मैं भी उसमें उपस्थित था। सभी साथी किसी भी आपात स्थिति के लिए तैयार थे और प्रबंधन कर्मचारियों के निर्णय के साथ था। 1986 में मेरठ संस्करण के बाद अमर उजाला परिवार गंभीर संकट में आ गया था। दोनों संस्थापक-संपादक श्री डोरीलाल अग्रवाल और श्री मुरारीलाल माहेश्वरी वर्ष 1988 में दिवंगत हो गए थे। वर्ष 1989 में संपादक बने श्री अनिल अग्रवाल, जो साप्ताहिक दिशा भारती के भी संपादक थे, अचानक एक कार दुर्घटना के शिकार हो गए थे। यह एक बड़ा वज्रपात था। लेकिन, प्रबंधन ने अमर उजाला के विस्तार की योजना को कुछ विलंबित जरूर किया, लेकिन स्थगित नहीं किया।
अमर उजाला ने अपने प्रसार क्षेत्र के सभी जन आंदोलनों का लगातार समर्थन किया था। 12 अक्तूबर, 1994 को उत्तराखंड आंदोलन के समर्थन के कारण इसे तत्कालीन राज्य सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा था। एक ओर जन आंदोलन की पक्षधरता और दूसरी ओर सरकार की नाराजगी, उसके विरुद्ध यह आंदोलन 1996 तक चलता रहा। क्षेत्रीय अखबार बनकर जो-जो समाचार पत्र आगे बढ़े थे, उनमें अमर उजाला निश्चित रूप से बहुत महत्वपूर्ण अखबार बन गया है। इसकी संपादकीय नीतियां भी किसी सरकार के समर्थन या विरोध में न होकर हमेशा जन समर्थन के लिए किए गए आंदोलनों के साथ होती हैं। इसी तरह अमर उजाला ने अपनी प्रसार संख्या, गुणवत्ता और लोकप्रियता, तीनों स्तर पर रिकॉर्ड तरक्की की है।
साथ ही, जिन मूल्यों और मान्यताओं को लेकर वह चला था, उस पर भी उसने दूसरे समाचार पत्रों की तुलना में एक बड़ी लंबी लकीर खींची है। उसकी संपादकीय गुणवत्ता की बात करें तो शुरू से ही इसके लिए नियमित रूप से लिखने वाले स्तंभकारों में खुशवंत सिंह का स्तंभ ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर, श्री इंद्रजीत का स्तंभ राजनीतिक डायरी, श्री कुलदीप नैयर का स्तंभ पंक्तियों के मध्य, श्री हरिशंकर परसाई का व्यंग्य स्तंभ सुनो भाई साधो पाठकों में बहुत लोकप्रिय हुआ करते थे। वह लोकप्रियता आज भी देश के योग्यतम स्तंभकारों से सुसज्जित है, बल्कि समकालीनता के साथ विशेषज्ञताएं जुड़ी हैं। आज की पत्रकारिता में राजनीति अथवा राज्य व्यवस्था के साथ ईमानदारी, तटस्थता, निष्पक्षता को (जो पत्रकारिता की बुनियाद हैं) बनाए रखना एक साहसिक काम है, जिसे अमर उजाला ने कायम रखा है।
अमर उजाला ने अपनी अमृत यात्रा में वैचारिक आधारभूमि को मजबूत रखा है। दुर्भाग्य से पूरे संस्थान का नवोन्मेष करने के अगुआ श्री अतुल माहेश्वरी के 2011 में निधन से एक बड़ा झटका लगा था, लेकिन फिर सब कुछ संभल गया। लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था में किसानों, छात्रों, शिक्षकों, सरकारी कर्मचारियों सहित हाशिये पर खड़े लोगों की आवाज को जन सरोकारों में एकाकार कर देना अमर उजाला के विचार का हिस्सा है। मुझे याद है 1986 की एक गोष्ठी में जो क्षेत्रीय पत्रकारिता पर केंद्रित थी नवभारत टाइम्स के तत्कालीन संपादक श्री राजेंद्र माथुर ने, जो मध्य प्रदेश के एक मजबूत क्षेत्रीय समाचार पत्र से ही दिल्ली आए थे, अमर उजाला, उसकी नीतियों और उसके साहस की खुलकर प्रशंसा की थी।
सात दशकों की पत्रकारिता के बाद आज जो क्षेत्रीय समाचार पत्रों की स्थिति है, उसमें संचार क्रांति और शासन व्यवस्था का लाभ लेकर कुछ स्वामी यदि यह विकल्प चुनें कि प्रभावशाली भारतीयों के साथ जुड़ जाएं और धीरे-धीरे नई दिल्ली के सत्ता के गलियारों में भी अपना प्रभाव जमाने लगें, तो आश्चर्य नहीं। क्षेत्रीय तंत्र पर अपना प्रभाव जमाने की, राज्यसभा की सदस्यता अथवा पद्म पुरस्कारों की दौड़ में शामिल होने की चाह भी अनहोनी नहीं रही। लेकिन सौभाग्य से, आरंभ से अब तक अमर उजाला उस सूची में कभी शामिल नहीं रहा। शायद इसीलिए इसे क्षेत्रीय पत्रकारिता के आदर्श के रूप में देखा जा रहा है। 75 वर्ष की लंबी यात्रा में अमर उजाला स्थानीय से बढ़कर प्रांतीय और अब कई राज्यों से प्रकाशित होने वाले मजबूत क्षेत्रीय अखबार का स्वरूप धारण कर चुका है। उसके सामने अब शताब्दी वर्ष की चुनौतियां हैं। वही चुनौती, जो अब देश के सामने भी है।
भारतीय समाज लोकतंत्र की अपनी शैशव अवस्था पार कर अपनी वैचारिक और सैद्धांतिक शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है, उस दौर में अमर उजाला को भी नई पहचान, नई सफलता और नई महत्वाकांक्षाओं की ओर बढ़ना है। अपने सामाजिक सरोकारों, नई टेक्नोलॉजी और अपने पाठकों की सतत भागीदारी के अनेक प्रयत्नों से अमर उजाला ने नई उम्मीदें जगाई हैं। मेरी ही नहीं, समूचे पत्रकारिता जगत की यह हार्दिक मंगल कामना है कि इस महत्वाकांक्षी प्रयास में अमर उजाला अपार यशस्वी सफलता प्राप्त करे।
-लेखक- पूर्व कुलपति, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय।