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आग से खेलने का अंजाम

Thu, 21 Mar 2013 11:03 PM IST
शीला रावल/वरिष्ठ पत्रकार
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आर्थिक राजधानी मुंबई में 1993 में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में 2006 में टाडा कोर्ट के फैसले के बाद दाऊद इब्राहिम के गुर्गे छोटा शकील ने मुझे फोन करके कहा था कि वह भी कानून का सामना करने के लिए तैयार है। पर उसकी एक शर्त थी कि मामले से संबंधित सुनवाई 90 दिन के भीतर खत्म हो। इस बात की सूचना मैंने संबंधित जांच एजेंसियों को भी दी थी, लेकिन कुछ हुआ नहीं।
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बम धमाकों के बीस साल बाद आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने भी फैसला सुना दिया है। इसमें कहा गया है कि उन धमाकों के पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का भी हाथ था। दोषियों को बम बनाने और अत्याधुनिक हथियारों का प्रशिक्षण पाकिस्तान में ही मिला था। फैसले में याकूब मेमन की फांसी की सजा बरकरार रखी गई है। देश में आतंक फैलाने वाले और बेगुनाहों की जान लेने वालों के लिए यह एक कड़ा संदेश है।

वैसे पिछले कुछ महीनों से हमारी सरकार ने भी इस तरह के कड़े संदेश देने शुरू कर दिए हैं। पहले अजमल कसाब और फिर अफजल गुरु को चुपचाप फांसी दी गई। इस साल कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और फिर लोकसभा चुनाव का बिगुल बज जाएगा। यह सच है कि हमारे सियासतदान हर फैसले के पीछे राजनीतिक गुणा-भाग लगाते हैं, पर सुखद है कि हमारी न्यायपालिका सक्रिय है। यह अलग बात है कि हमारी कानूनी प्रक्रिया बहुत लंबी है।
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यह फैसला सबसे ज्यादा संजय दत्त को लेकर चर्चा में है, जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय ने आर्म्स ऐक्ट के तहत पांच साल की सजा सुनाई है। इस ऐक्ट के तहत यह न्यूनतम सजा है। संजय दत्त बड़े फिल्म अभिनेता हैं। वह स्वर्गीय सुनील दत्त और नरगिस जैसी बड़ी हस्ती के बेटे हैं। उनकी बहन प्रिया दत्त कांग्रेस सांसद हैं और वह खुद समाजवादी पार्टी के टिकट पर लखनऊ से चुनाव लड़ने की कोशिश कर चुके हैं। यह अलग है कि इसी मामले के चलते उन्हें चुनावी समर में कूदने की अनुमति नहीं मिल पाई थी। यानी यहां रसूख है, भावुकता है और ग्लैमर का तड़का भी है।

संजय दत्त का अतीत खतरों से जुड़ा रहा है और वह आग से खेलते रहे हैं। उन्हें एके-56 रखने का दोषी पाया गया है। जाहिर है, केवल सुरक्षा के लिहाज से कोई भी अपने घर में एके-56 नहीं रखता। चूंकि मुंबई बम विस्फोट मामले में पहले ही टाडा अदालत उन्हें बरी कर चुकी है, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले के बाद अब उन्हें ज्यादा रियायत मिलने की उम्मीद नहीं है। संभव है कि उनकी तरफ से पुनर्विचार याचिका दाखिल की जाए।

अगर एक फीसदी रियायत की गुंजाइश भी मानें, तो परिस्थितियों के चलते उन्हें चार हफ्ते की जगह पांच या छह हफ्ते की मोहलत मिल सकती है। इससे ज्यादा राहत उन्हें शायद ही मिले। डेढ़ साल की सजा वह पहले ही काट चुके हैं। बाकी साढ़े तीन साल उन्हें जेल में बिताने ही होंगे। इस फैसले से एक बार फिर यह साबित हुआ है कि कोई कितना भी रसूखवाला क्यों न हो, अगर उसके खिलाफ ठोस सुबूत हैं, तो उसे कानून के आगे घुटने टेकने ही पड़ते हैं।

लेकिन राजनयिक स्तर पर इस मामले में हम पूरी तरह विफल नजर आए हैं। यह बात सरकार को भी सोचनी चाहिए कि पाकिस्तान को सिर्फ डोजियर सौंपने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। हिंदुस्तान से जब दाऊद भागा था, तब वह एक गैंगस्टर था, डॉन था। बाद में वह एक आतंकवादी बन गया। संयुक्त राष्ट्र ने भी उसे आतंकवादी घोषित किया है। साथ ही, उसने यह भी कहा है कि दुनिया के कई हिस्सों में उसके ड्रग्स और अन्य तरह के काले धंधे हैं। भारत के अमेरिका के साथ अच्छे रिश्ते हैं। अगर हमने गंभीरता से इस दिशा में सोचा होता, तो अमेरिका से भी मदद ले सकते थे।

सवाल सिर्फ दाऊद को पकड़ने का ही नहीं है। भारत में उसका नेटवर्क फैला हुआ है और हम उसे ध्वस्त करने में नाकाम रहे हैं। इस दिशा में मुंबई के कुछ पुलिस अधिकारियों ने अपने कदम बढ़ाए और उन्हें कुछ कामयाबी भी मिली। पर यह उतनी नहीं थी, जिसे संतोषजनक कहा जा सके। हमें यह सोचने की जरूरत है कि अगर अमेरिका लादेन के खिलाफ पाकिस्तान में घुसकर कार्रवाई को अंजाम दे सकता है, तो हम दाऊद को भारत वापस क्यों नहीं ला सकते?

वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी भी कह चुके हैं कि दाऊद ने अपनी कुछ शर्तों के साथ उनसे आत्मसमर्पण की इच्छा जताई थी। पर सच तो यह है कि विभिन्न सरकारों ने उसे वापस लाने को लेकर दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं दिखाई है। सरकार किसी की भी रही हो, सच तो यह है कि दाऊद को भारत नहीं लाया जा सका है। 1993 के मुंबई सीरियल धमाकों से लेकर अब तक देश के विभिन्न हिस्सों में तीन दर्जन से ज्यादा बड़ी आतंकवादी घटनाएं हो चुकी हैं।

जाहिर है, जब तक हमारी सरकार इस दिशा में बेहद कड़ा रुख नहीं अपनाती, हमें बार-बार ऐसे हालात का सामना करना पड़ेगा। लेकिन राहत की बात यह है कि 20 साल पहले उन धमाकों में मारे गए लोगों को आखिरकार न्याय मिला है। साथ ही, डी-कंपनी के भगोड़े और दोषी गुर्गों के लिए भी एक सख्त संदेश है। यह बाकी बम धमाकों में शामिल रहे लोगों के लिए भी कठोर संदेश है। हमें भरोसा करना चाहिए कि एके-56 रखने के मामले में अगर आज संजय दत्त को सजा हुई है, तो आने वाले वक्त में मालेगांव, मक्का मस्जिद और समझौता एक्सप्रेस बम धमाकों में शामिल रहे लोगों को भी ये दिन देखने पड़ सकते हैं।
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