उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में नंदा की चौकी के पास टोंस नदी पर लगभग 16 करोड़ रुपये की लागत से बने नए-नवेले पुल के एक हिस्से का उद्घाटन के महज 16 दिनों के भीतर पहली ही मानसूनी बारिश की भेंट चढ़ जाना, किसी एक निर्माण परियोजना की विफलता भर नहीं, बल्कि यह उस विकास मॉडल पर गंभीर प्रश्नचिह्न है, जिसमें परियोजनाओं के उद्घाटन की जल्दबाजी तो दिखाई देती है, लेकिन उनकी गुणवत्ता, स्थायित्व और जवाबदेही के प्रश्न अक्सर पीछे छूट जाते हैं।
यह घटना इसलिए भी चौंकाने वाली है, क्योंकि जिस मानसून को हर वर्ष आने वाला सामान्य प्राकृतिक चक्र माना जाता है, उसी को इस घटना का सबसे बड़ा कारण बताया जा रहा है। जब देश में सौ-सौ साल पुराने पुल आज भी मजबूती से खड़े हों, तो आखिर इस तर्क को कैसे स्वीकारा जाए? हिमालयी राज्य उत्तराखंड में तेज बारिश, भूस्खलन और नदियों में अचानक जलस्तर बढ़ना आम बात है, इसलिए किसी भी पुल का डिजाइन बनाते समय ही वर्षा, नदी के बहाव, मिट्टी की मजबूती और जल निकासी की व्यवस्था जैसे बुनियादी तकनीकी मानकों का ध्यान रखा जाता है।
उल्लेखनीय है कि सितंबर, 2025 में आई भीषण बाढ़ में बहे पुराने पुल की जगह पर फिर से इस नए पुल को बनाया गया है। इसके बावजूद, अगर पुराने अनुभवों से सीख नहीं ली गई, तो यह निश्चित ही अफसोस की बात है। फिर, यह कोई पहला मामला भी नहीं है। चाहे बिहार में गंगा पर निर्माणाधीन पुल के हिस्से का गिरना हो, उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे और पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के कुछ हिस्सों का पहली बारिश में उखड़ जाना हो, या फिर दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर कुछ ही महीनों में बड़े गड्ढे दिखाई देना, ये सभी संकेत हैं कि देश में निर्माण की गुणवत्ता और निगरानी मानकों का पूरी तरह से पालन नहीं किया जा रहा है।
गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में सड़कों के हालिया ऑडिट में भी खराब सामग्री, गलत इंजीनियरिंग, काली सूची में डाले गए ठेकेदारों को कॉन्ट्रैक्ट मिलने और अपूर्ण परियोजनाओं को भी पूर्ण होने का सर्टिफिकेट दिए जाने जैसे खुलासे हुए हैं। दरअसल, नीति नियंताओं को समझना होगा कि बुनियादी संरचना से जुड़ी परियोजनाओं में उपभोक्ता वस्तुओं की भांति ‘इस्तेमाल करो और फेंको’ वाला रवैया नहीं चलता। असल में, देहरादून के पुल पर बना गड्ढा, हमारे निर्माण तंत्र में मौजूद उस गहरी खाई का प्रतीक है, जिसे केवल सीमेंट और कंक्रीट से नहीं भरा जा सकता। अगर 16 करोड़ रुपये का पुल 16 दिन भी न टिक सका, तो सवाल उठेंगे ही। देहरादून मामले में मुख्यमंत्री ने जांच के आदेश देने की रस्म पूरी कर दी है। अब जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करके उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई भी जरूरी है।