आतंकियों के हमले की वजह से उत्तरी कश्मीर के बांदीपुर जिले में स्थित एशिया की सबसे बड़ी ताजा पानी वाली वुलर झील के संरक्षण का काम रुक गया है। घटना के बाद से पुलिस, सेना और नेवी के कमांडो दस्ते तलाशी अभियान चला रहे हैं। झेलम नदी से लगभग 1,578 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह झील कभी 217 वर्ग किलोमीटर में फैली थी, पर भूमाफियाओं के कब्जे और प्रदूषण के चलते अब यह मात्र 125 वर्ग किलोमीटर में सिमटकर रह गई है।
वुलर संस्कृत के 'उल्लोल' शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है, ऊंची लहरों वाली झील। प्राचीन काल में इसे महापद्मसर कहा जाता था। इस झील की लहरें दोपहर तक लगभग शांत रहती हैं, लेकिन दोपहर के बाद उग्र रूप धारण कर लेती हैं। तुलबुल परियोजना के नाम से प्रसिद्ध बुलर बैराज की परिकल्पना 1980 में की गई थी, जिस पर 1984 में काम शुरू हुआ था। पर पाकिस्तान के आपत्ति जताने पर 1987 में इसका काम रोक दिया गया था। पाकिस्तान मानता है कि यदि कभी भारत के साथ उसका सैन्य टकराव होता है, तो भारत अचानक इस बैराज का पानी छोड़कर पाकिस्तान के कई इलाकों को डुबो सकता है।
केंद्र सरकार ने वेस्टलैंड संरक्षण परियोजना के तहत 398 करोड़ की परियोजना मंजूर की थी। इस पर पिछले वर्ष काम शुरू हो गया था। इसके लिए 13वें वित्त आयोग ने भी 120 करोड़ की राशि मंजूर की। इस संरक्षण परियोजना के तहत वुलर को अतिक्रमण मुक्त तो कराया ही जाएगा, इसके जलस्तर को एक निश्चित ऊंचाई तक ले जाया जाएगा। विभिन्न प्रकार की मछलियों एवं पक्षियों के निवास के लिए प्रसिद्ध यह झील पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित की गई है।