फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

रोजगार के खाते में विकास का हिस्सा

Thu, 03 May 2012 12:00 PM IST
Vinit Narain
विज्ञापन
विज्ञापन
आज यदि यूपीए सरकार की सबसे चर्चित उपलब्धि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी (मनरेगा) योजना अनिश्चय और विवादों के घेरे में जा फंसी है, तो इसके लिए केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारें, दोनों जिम्मेदार हैं। सचाई तो यह है कि मनरेगा कानून और इससे जुड़ी योजनाओं की व्यापक संभावनाओं को समग्र रूप से प्राप्त करने का प्रयास किया ही नहीं गया है। यदि मनरेगा कानून में निहित संभावनाओं का सर्वोत्तम उपयोग किया जाए, तो यह योजना टिकाऊ कृषि व ग्रामीण विकास की नींव रखने का काम कर सकती है।
विज्ञापन


यदि आज हमारे गांव संकट में हैं और लोग वहां से पलायन करने को मजबूर हैं, तो इसका एक बड़ा कारण यह है कि गांवों में वर्षों से हरियाली, वृक्ष, चरागाह और पशुधन कम होते गए हैं। हमारी कृषि का मुख्य आधार छोटे किसान हैं और उनके लिए खेती-किसानी के सस्ते तौर-तरीके बहुत जरूरी हैं। यदि मनरेगा के अंतर्गत चरागाह व हरियाली बढ़ाने, परंपरागत जल स्रोतों की मरम्मत, लघु सिंचाई, जल व नमी संरक्षण आदि के कार्य भली-भांति गांव में हो जाएं, तो इससे किसानों को सस्ती तकनीक अपनाने में मदद मिलती है। यदि हरियाली बढ़ती है, तो पशुपालन के साथ कंपोस्ट खाद बनाने की संभावना भी बढ़ती है। यदि नमी व जल संरक्षण की व्यवस्था है, तो सिंचाई का खर्च भी कम आता है। मनरेगा में मिट्टी और जल संरक्षण का काफी कार्य भी हो सकता है, चेक डैम बनाने का भी व कंपोस्ट खाद के गड्ढे बनाने का भी।

हालांकि यह शिकायत कुछ लोगों ने की है कि मनरेगा के कारण कुछ किसानों को मजदूर नहीं मिले, इस कारण खेती का खर्च बढ़ा, पर यदि एक व्यापक दृष्टिकोण से देखें, तो मनरेगा का बढ़िया क्रियान्वयन हमें टिकाऊ ग्रामीण और कृषि विकास की ओर ले जा सकता है।
विज्ञापन


पर वास्तव में अधिकांश स्थानों पर ऐसा कुछ हो नहीं सका है। क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार व अक्षमता, पर्याप्त तैयारी और जानकारी के अभाव का कुछ ऐसा असर रहा कि मनरेगा योजना भी पहले से चल रही रोजगार परियोजनाओं में बहुत आगे नहीं जा सकी, और जो उम्मीदें लोगों में जगी थीं, वे पूरी नहीं हो सकीं। जब बहुत मेहनत करने पर आधी मजदूरी मिले और 100 की जगह 40 दिन का रोजगार मिले, तो उत्साह, उम्मीदें, उमंग सब सिमटने लगते हैं।

समस्या केवल क्रियान्वयन के स्तर पर नहीं रही है। ऐसे कई संकेत मिले हैं कि केंद्र व अनेक राज्य सरकारें इस योजना का विस्तार एक सीमा तक ही करना चाहती थीं। यही कारण है कि केंद्रीय बजट में इस योजना के लिए रखी जाने वाली धन-राशि को एक सीमा के आगे नहीं बढ़ाया गया। जबकि यदि सरकार मनरेगा पर पूरे उत्साह और खुलेपन से कार्य करती, तो इस बजट को तेजी से बढ़ना चाहिए था।

यूपीए सरकार का यह सीमित दृष्टिकोण बहुत आश्चर्यजनक भी नहीं है। इस सरकार के बहुत शीर्ष नेताओं ने यहां तक बयान दिए हैं कि उनकी नजर में देश का सही विकास तब होगा, जब 85 प्रतिशत लोग शहरों में रहेंगे। यदि गांवों व ग्रामीण विकास के प्रति नजरिया इतना संकीर्ण व विसंगतिपूर्ण होगा, तो मनरेगा जैसे कानून के लिए उत्साह कहां से आएगा?

एक ओर उच्च सरकारी स्तर पर ही इस ग्रामीण विकास की सबसे चर्चित स्कीम को न्याय नहीं मिला। रही-सही कसर भ्रष्टाचारियों ने पूरी कर दी। अतः अधिकांश स्थानों पर बेहद व्यापक संभावनाओं से भरी इस स्कीम का बहुत आधा-अधूरा रूप ही नजर आता है। कहीं-कहीं तो बहुत विकृत रूप नजर आता है, क्योंकि जिस ढंग से कार्य किया गया है, उससे टिकाऊ ग्रामीण विकास की नींव तो क्या पड़ती, उसे कुछ नुकसान अवश्य हो सकता है।

सरकार चाहे तो स्थिति अब भी सुधर सकती है। इस कानून व इससे जुड़ी स्कीम की सोच कुछ छिटपुट कार्यों के रूप में न कर इसे टिकाऊ ग्रामीण विकास की नींव तैयार करने के रूप में देखना चाहिए। ग्राम-सभा व पंचायत से शुरू होकर जिले तक सभी गांवों के टिकाऊ विकास की विकेंद्रित योजनाएं बननी चाहिए। इन योजनाओं का एक मुख्य आधार यह होना चाहिए कि आजीविका की रक्षा व पर्यावरण की रक्षा में आपसी समन्वय हो।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें