दिन गुजरते गए और हिन्दुस्तान की आजादी का हसीन दिन पंद्रह अगस्त आ पहुंचा। कम्यून में सुबह-सवेरे से ही हलचल मच गई। तमाम कॉमरेड नहा-धोकर, जो भी अच्छे कपड़े थे, पहनकर तैयार हो गए और सवेरे आठ बजे कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर के सामने जमा होने लगे। तिरंगा लहराया गया। चारों तरफ नारों का शोर बुलंद हो रहा था, इंकलाब जिंदाबाद, हिन्दुस्तान की आजादी जिंदाबाद, भारत माता की जय, सल्तनते-बर्तानिया मुर्दाबाद।
सबसे पहले मजाज ने अपना गीत सुनाया, बोल अरी ओ धरती बोल'। सरदार जाफरी ने एक इंकलाबी नज्म पढ़ी। कैफी ने नज्म सुनाई। फिर पार्टी की खूबसूरत नौजवान लड़कियों ने, जिनमें दीना और तरला भी थीं, सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा गाया।
पी.सी.जोशी और सज्जाद जहीर वगैरह ने तकरीरें भी की। फिर सब लोग जुलूस की शक्ल में जमा होने लगे। और मैं एक धान-पान-सी, दुबली-पतली लड़की आंखों में आजाद हिंदुस्तान के वास्ते हसीन ख्वाब लिए कैफी का हाथ पकड़े-पकड़े उस जुलूस के साथ चल पड़ी।
जुलूस ग्वालिया टैंक जाकर रुका। फिर तकरीर, नाच-गाना, नारे और खूब हंगामे हुए। फिर जुलूस खत्म हुआ, मैं तो अपने कमरे में आकर सो गई। बहुत थक गई थी, लेकिन सरदार भाई, जी अंसारी, मिर्जा अशफाक बेग, मेहंदी, मुनीष, सब शहर में घूमते रहे। एक ईरानी होटल में गए जहां ‘जॉर्ज पंचम' की बड़ी तस्वीर थी। सरदार भाई मेज पर चढ़ गए और जॉर्ज पंचम की तस्वीर निकालकर जमीन पर पटक दी।
बेचारा मालिक मना ही करता रह गया, लेकिन इन लोगों के तेवर से डर भी गया था। इस पर जोए अंसारी बिगड़ गए कि सरदार को ऐसा नहीं करना चाहिए था और कुछ बुरा-भला भी कहा। सरदार भाई को गुस्सा आ गया। उन्होंने जोए अंसारी को इतना कसकर तमाचा रसीद किया कि उनका सिर घूम गया। वो डरकर चुप हो गए। उस वक्त तमाम कम्युनिस्ट इसी मूड में थे कि अंग्रेजों की एक-एक निशानी मिटा देंगे।
फिर कयामतखेज फसादात की खबरें आने लगीं, जिन्हें सुनकर मेरा दिल दहल जाता था। पी.सी. जोशी ने तमाम कॉमरेडों को ऑर्डर दिया था कि कोई शेरवानी पहनकर बाहर न जाए, सिर्फ शर्ट और पैंट पहने। इसी तरह से पार्टी कोशिश कर रही थी कि लोग इस फिरकावाराना जुनून को छोड़ दें। इंडियन पीपुल्स थियेटर (इप्टा जो कम्युनिस्ट पार्टी का ही संगठन था) में भी फसादात के खिलाफ ड्रामे शुरू हो गए थे।
मैं इन सब बातों से बेनियाज अपनी ही धुन में खोई रहती थी। मुझे यह एहसास बहुत रहता था कि सुबह की चाय जरा अच्छी तरह से पीना चाहिए। चुनांचे एक दिन मैं अपने कमरे में बैठी, एक टीकोजी काढ़ रही थी (क्योंकि टी सेट में चाय पीने की ख्वाहिश को मैं अभी तक रोक नहीं सकी थी) कि पी.सी. जोशी मेरे कमरे में आए खाकी रंग का नेकर और सफेद रंग की आधी आस्तीनों वाली शर्ट पहने हुए थे।
मैं घबराकर खड़ी हो गई। अभी तक मैंने उन्हें इतने करीब से नहीं देखा था। रंग खुलता हुआ सांवला, नमकीन, नेक चेहरा, लगता था कि मोहब्बत करनेवाले आदमी हैं। मुझे बैठने के लिए कहा। मैं बैठ गई। पूछा : 'तमाम दिन क्या करती रहती हो?' मैंने शर्माकर कहा: 'कुछ नहीं।'
वो मुस्कुराए और बहुत ही नर्म लहजे में कहा, 'कम्युनिस्ट शौहर की बीवी कभी बेकार नहीं रहती। उसको अपने शौहर के साथ पार्टी का काम करना चाहिए। पैसे कमाने चाहिए और बाद में जब बच्चे हों, तो उन्हें अच्छा शहरी बनाना चाहिए, तब ही वह कम्युनिस्ट की मुकम्मल बीवी बन सकती है।'
-राजकमल प्रकाशन से आई शौकत कैफी की किताब याद की रहगुजर का संपादित अंश।