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मंजिलें और भी हैं : मजाक उड़ाने वालों ने भी शुरू की अनार की खेती

Sun, 23 Jun 2019 08:50 PM IST
Gaurav Pandey न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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पद्मश्री किसान गेनाभाई दर्गाभाई पटेल
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मेरा जन्म गुजरात के बनासकांठा जिले के सरकारी गोलिया गांव में हुआ। बचपन से ही मेरे दोनों पांव पोलियो से ग्रस्त हैं। मेरे पिताजी पारंपरिक किसान थे। बचपन में मेरे भाई खेतों में पिताजी का हाथ बंटाते थे। लेकिन मेरे पिताजी को लगता था कि मैं खेती में उनकी मदद नहीं कर सकता, इसलिए वह चाहते थे कि मैं अपनी पढ़ाई पूरी करूं। बहुत कम उम्र में ही मुझे गांव से 30 किलोमीटर दूर एक हॉस्टल में भेज दिया गया, जहां से मैं अपने तिपहिया साइकिल से स्कूल जा सकता था। 

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मैंने 12वीं तक पढ़ाई की। लेकिन माता-पिता अनपढ़ थे, तो उन्हें समझ नहीं आया कि मुझे आगे की पढ़ाई के लिए कहां और कैसे भेजा जाए। नतीजतन मुझे लौटकर गांव आना पड़ा। गांव आने पर मैं अपने पिता और भाई के साथ खेतों पर जाने लगा। फिर मैंने ट्रैक्टर चलाना सीखा। मेरे पिता गेंहू, बाजरा जैसी फसलें उगाया करते थे। उस समय बोरवेल की मदद से सिंचाई करके खेती होती थी, जिसमें पानी की बहुत बर्बादी होती थी। 

चूंकि मुझे भी अब खेती करनी थी, इसलिए मैं ऐसी फसल की खोज में जुट गया, जिसे दिव्यांग होने के बावजूद मैं आसानी उगा सकूं और एक बार बोने के बाद लंबे समय तक उससे उपज मिल सके। इस क्रम में मैंने कई फसलों पर हाथ आजमाया। फिर अन्य विकल्प की तलाश में मैं स्थानीय कृषि अधिकारी से मिला, कृषि विश्वविद्यालयों का दौरा किया और कृषि मेले में भी गया। करीब तीन महीने तक गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान में घूमता रहा। 
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मैंने महाराष्ट्र के किसानों को अनार की खेती करते देखा। महाराष्ट्र का मौसम गुजरात की तरह का ही होता है। अनार में पूरे साल फूल आते हैं और इसे ज्यादा देखभाल की भी जरूरत नहीं होती है। वर्ष 2004 में मैंने महाराष्ट्र से अनार के करीब 18 हजार पौधे लाकर अपने भाइयों की मदद से खेतों में लगाया। गांव के दूसरे किसान कहते थे कि मेरा दिमाग फिर गया।  लेकिन मुझे यकीन था कि मेरी जमीन पर अनार उग सकते हैं। 

मेरे भाई और भतीजों ने मुझ पर भरोसा किया और इस काम में पूरा सहयोग दिया। वर्ष 2007 में अनार में फल आने लगे। लेकिन इन फलों को बेचना बड़ी चुनौती थी, क्योंकि पूरे राज्य में अनार का बाजार नहीं था। मैंने अनार उगाने वाले अन्य किसानों को संगठित किया और ट्रकों में अनार लादकर जयपुर, दिल्ली के बाजारों में उन्हें बेचने की व्यवस्था की। हालांकि यह ज्यादा दिन नहीं चल पाया। हम सीधे उपज खरीदने वाले व्यापारियों की तलाश में थे। लेकिन व्यापारी हमसे तभी फल खरीदते, जब उन्हें यह भरोसा होता कि हमारे पास फल पर्याप्त मात्रा में हैं। 

इसलिए हमने एक योजना के तहत हरेक किसान को अलग-अलग खेतों में बैठने के लिए कहा और व्यापारियों को एक ही खेत कई बार दिखाया। व्यापारियों को लगा कि हमारे पास काफी मात्रा है और इस तरह हमें हमारा पहला ऑर्डर मिला। अपनी लागत के मुकाबले मुझे दस लाख रुपये से अधिक का मुनाफा हुआ। मेरी सफलता देखकर और भी किसान पारंपरिक खेती छोड़कर बागवानी करने लगे। 

मैंने किसानों के लिए वर्कशॉप का भी आयोजन करवाया, जिसमें कई कृषि वैज्ञानिक और जानकार आए थे। अब हमारे जिले से दुबई, श्रीलंका और बांग्लादेश में अनारों का निर्यात होता है। पद्मश्री मिलना मेरे लिए किसी सपने से कम नहीं था। मेरा मानना है कि जिंदगी चुनौतियों के बिना कुछ नहीं है। जहां लोग रुक जाते है, मैं वहीं से शुरुआत करता हूं। मुझे कभी नहीं लगा कि जो काम दूसरे कर सकते हैं, वह मैं नहीं कर सकता।
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-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित

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