मेरे गृहनगर बंगलुरू में सेकंडहैंड किताबों की देश की सबसे अच्छी दुकानें मौजूद हैं। दशकों से ये दुकानें मेरी निजी और पेशेगत जरूरतें पूरी करती आई हैं, जहां से मुझे सोने से पहले पढ़ी जाने वाली सामग्री से लेकर मेरे अनुसंधान से संबंधित दुर्लभ दस्तावेज मिलते रहे हैं।
हाल ही में मैंने ऐसी ही एक दुकान से एक पुरानी किताब हासिल की, जोकि मेरे दोनों ही मकसद को पूरी करती थी। यह किताब है 1950 में प्रकाशित ए. एस आयंगर की ऑल थ्रू द गांधियन इरा। एक पत्रकार के रूप में आयंगर ने चेल्म्सफोर्ड और उनके बाद के सभी वायसराय का इंटरव्यू किया था और राष्ट्रीय आंदोलन के बड़े नेताओं के साथ उनकी प्रायः घनिष्ठता थी। उनकी किताब में उनके साथी पत्रकारों के जीवनवृत्त दिए गए हैं और उसके साथ ही इसमें असहयोग आंदोलन, 1930-40 के दशकों की सांप्रदायिक राजनीति तथा दूसरे विश्व युद्ध का भारत पर प्रभाव पर केंद्रित अध्याय हैं।
ऑल थ्रू द गांधियन इरा के एक अध्याय का शीर्षक है, नेहरू और पटेल। इन दोनों को स्वतंत्रता संग्राम के दौर में काम करते हुए और फिर उन्हें प्रधानमंत्री और उप प्रधानमंत्री के रूप में काम करते हुए देख रहे आयंगर ने टिप्पणी की : 'यह देश का सौभाग्य है कि हमारे पास पंडित नेहरू और सरदार पटेल के रूप में दो ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिनमें ऐसे गुण हैं जोकि एक दूसरे के लिए पूरक जैसे हैं।' इसके बाद वह लिखते हैं, 'मनुष्यत्व और यथार्थ का ऐसा युग्म कहीं और देखने को नहीं मिलता, जैसी पूर्णता जवाहरलाल और वल्लभभाई में है।'
आयंगर ने इन दो राष्ट्र निर्माताओं के काम को व्यक्त करने के लिए 1950 में एक ऐसे रूपक का इस्तेमाल किया, जो कि पहले ही भारत के सबसे लोकप्रिय खेल में प्रयुक्त हो रहा था। उन्होंने टिप्पणी की, 'ये दोनों क्लीन फाइटर हैं। और नेहरू को जहां छक्के जड़ना पसंद है, वहीं पटेल एक शानदार बल्लेबाज हैं, जोकि गेंदबाजों को थकाकर अच्छा स्कोर खड़ा कर देते हैं।' उनका अगला रूपक दुनिया के सबसे महंगे खनिज से जुड़ा है। जैसा कि उन्होंने लिखा, 'ये दोनों हीरे की तरह हैं, उनमें अंतर है तो यह कि जहां सरदार बिना तराशा हुआ हीरा हैं, वहीं नेहरु एक फिनिश्ड प्रोडक्ट हैं, जिसके फलक तराशे हुए हैं और इसलिए वह चमकदार लगते हैं।'
हाल के वर्षों में विचारकों ने व्यक्तित्व के इस अंतर को गहरी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में बदल दिया। नेहरूवादी परोक्ष रूप से जताते हैं कि पटेल गुप्त तरीके से सांप्रदायिक थे; पटेलवादी नेहरू पर विदेश नीति से संबंधित अनेक गलतियां करने के आरोप लगाते हैं। ये पक्षपाती यह भी दावा करते हैं कि ये दोनों वास्तव में एक दूसरे पर अविश्वास करते थे।
गोपालकृष्ण गांधी ने नेहरू-पटेल की जुगलबंदी की गलत व्याख्या को लेकर रेखांकित किया है कि इस मामले में भारत के दो बड़े राजनीतिक दलों की मिलीभगत है। पहले कांग्रेस ने पटेल का परित्याग किया, उसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने गलत तरीके से उन्हें अपनाया। दुर्भाग्य से पटेल की जयंती ठीक उसी दिन होती है, जिस दिन इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी। 1985 से जब तक कांग्रेस सत्ता में रही, उसने पूरे उत्साह के साथ 31 अक्तूबर को इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि के रूप में मनाया और वह जनता को यह बताना भूल गई कि इसी दिन पटेल का जन्म भी हुआ था।
चूंकि नेहरु-गांधी परिवार ने पटेल की प्रशस्ति नहीं की, इसलिए भाजपा ने यह काम किया। यह बहुत अजीब है, क्योंकि पटेल जिंदगी भर एक कांग्रेसी थे। नेहरू और पटेल को कट्टर प्रतिद्वंद्वी की तरह प्रस्तुत करना तो और भी अजीब है। पिछले आम चुनाव के दौरान यह गलत तरीके से प्रचारित किया गया कि नेहरू दिसंबर, 1950 में पटेल की अंत्येष्टि में शामिल नहीं हुए थे।
ए.एस. आयंगर ने इन दोनों शख्सियत के रिश्ते के गहन अध्ययन के आधार पर जो लिखा है, उससे इन दोनों के बीच की कथित प्रतिद्वंद्विता की परतें उघड़ जाती हैं। उन्होंने 1947-50 के उन महत्वपूर्ण वर्षों पर अपना अध्ययन केंद्रित किया है, जब नेहरू और पटेल एक बिखरे और विभाजित देश को जोड़ने के लिए एक साथ काम कर रहे थे। उन्होंने लिखा, 'परस्पर एक दूसरे को सहयोग करने वाले, न कि विरोधाभासी, गुणों के जरिये नेहरू और पटेल न केवल देश के समक्ष आई समस्याओं को सुलझा रहे हैं, बल्कि लगातार बढ़ती जा रही चुनौतियों का भी सामना कर रहे हैं। पंडित नेहरू ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि एक दिन भी ऐसा नहीं बीतता, जब वह सरदार पटेल नहीं मिलते और उनके साथ नीति और प्रशासन से संबंधित मुद्दों पर उनके साथ विचार-विमर्श नहीं करते। इसी तरह से, सरदार पटेल भी प्रधानमंत्री से सलाह किए बिना कोई बड़ा निर्णय नहीं लेते। यह युग्म देश की प्रगति के लिए बहुत उपयोगी है, बेशक राजनेताओं के एक वर्ग को यह नहीं सुहा रहा है।'
ऐसा अब भी है। इसी वजह से इंदिरा गांधी और उनके वंशजों ने पटेल के योगदान को दबा दिया, जबकि नरेंद्र मोदी और भाजपा ने दो ऐसे भारतीयों के बीच पक्षपाती तरीके से विरोध पैदा कर दिया है, जिन्होंने देश के निर्माण के लिए एक साथ मिलकर काम किया था।
आयंगर ने नेहरू को दूरदृष्टा और सैद्धांतिक बताया, तो पटेल को व्यावहारिक और यथार्थवादी। नवजात भारत को दोनों तरह के व्यक्तियों की जरूरत थी, बल्कि तथ्य यह है कि इसी विशेष सैद्धांतिक और यथार्थवादी तरीके से काम करने की जरूरत थी। भारत को जहां नेहरू की जरूरत महिलाओं और अल्पसंख्यकों को यह आश्वस्त करने के लिए थी कि उन्हें समान अधिकार प्राप्त है, और देश को सार्वभौमिक वयस्क मताअधिकार (कम्युनिस्ट, आरएसएस के साथ ही कुछ कांग्रेसजन भी इसका विरोध कर रहे थे) की जरूरत है। वहीं उसे पटेल की जरूरत रियासतों के एकीकरण, प्रशासनिक व्यवस्था को एकजुट और आधुनिक करने और संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में भीमराव अंबेडकर के नामांकन को कांग्रेस पार्टी का समर्थन दिलाने के लिए भी थी।
स्वभाव और व्यक्तित्व में निःसंदेह दोनों एकदम भिन्न थे। मगर उन कठिन वर्षों में महत्वपूर्ण यह था कि कौन-सी चीजें उन्हें जोड़े रखती हैं। नेहरू और पटेल, दोनों में ही अपने देश के प्रति गहरा प्रेम था, देश की एकता को लेकर प्रतिबद्धता थी और उनमें यह समझ थी कि उन पर उनके साझा गुरु महात्मा गांधी की स्मृतियों का कर्ज है, जिसके लिए उन्हें आपस में मिलकर काम करना और कठोर मेहनत करनी है। आयंगर लिखते हैं, दोनों अनथक कार्यकर्ता थे, खुद को न तो शारीरिक और न ही मानसिक आराम के लिए समय देते थे।
आयंगर की तरह मैं भी क्रिकेट का फैन हूं। 1970 के दशक में मुझे तब बहुत तकलीफ हुई थी, जब कुछ मित्र गावस्कर की तारीफ कर रहे थे और विश्वनाथ को कोस रहे थे, कुछ इसका उलटा कर रहे थे। मैं उन दोनों का प्रशंसक रहा हूं। इसी तरह से बाद में मुझे यह भी गवारा नहीं हुआ है कि मैं द्रविड़ और तेंदूलकर में से किसी एक को चुनूं। नेहरू और पटेल की साझेदारी क्रिकेट के मैदान में बनी किसी भी जोड़ी से असीमित रूप से महान थी। उनमें से किसी एक को ऊंचा दिखाने और दूसरे को नीचा दिखाने से हम उन दोनों की स्मृतियों का ही अपमान करेंगे। और इससे भारत की भी अवमानना होगी।