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मंजिलें और भी हैं : सफाई कर्मियों को बांट रही हूं सुरक्षा उपकरण

Mon, 08 Jul 2019 01:39 AM IST
Avdhesh Kumar संजना रुनवाल
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सफाईकर्मी - फोटो : social media
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हमारा शहर इन लोगों की वजह से ही स्वच्छ रहता है। जबकि ये लोग अच्छी और स्वस्थ जिंदगी जीने के लिए प्रतिदिन संघर्ष करते हैं। इसलिए मैं चाहती हूं कि कुछ ऐसा कर सकूं, ताकि इन लोगों को एक बेहतर जीवन जीने में सहायता मिले। मैं मुंबई की रहने वाली हूं और बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल में दसवीं कक्षा में पढ़ती हूं। मैं कूड़ा बीनने वालों और सफाई कर्मचारियों को उपकरण बांटती हूं, ताकि अपनी जिम्मेदारी निभाते समय वे सुरक्षित रह सकें। 
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जब मैं नौवीं कक्षा में थी, तब मैंने अपने स्कूल के एक प्रोजेक्ट के तहत दिव्यांग लोगों के प्रोस्थेटिक लिंब (कृत्रिम पैर) ऑपरेशन के लिए अभियान चलाया था। उससे लगभग 84 हजार रुपये इकट्ठा हुए थे, जिससे कई लोग फिर से अपने पैरों पर खड़े हो पाए। कूड़ा बीनने वालों और सफाई कर्मचारियों को सुरक्षित जीवन देने की शुरुआत मैंने ‘क्लीन-अप फाउंडेशन’ के साथ मिलकर मुफ्त में ‘सुरक्षा उपकरण’ बांटने से की। 

यह एनजीओ मेरे भाई ने शुरू किया। हमने एमसीजीएम द्वारा मुंबई में कूड़ा-कचरा बीनने वालों और सफाई कर्मचारियों पर किए गए सर्वेक्षण का अध्ययन किया, तो पाया कि इनमें से लगभग चालीस प्रतिशत लोगों की प्रति व्यक्ति औसत आय पांच सौ रुपये से भी कम है, जबकि सत्तर प्रतिशत लोग निरक्षर हैं। 
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सर्वेक्षण में पाया गया कि करीब चौरानबे प्रतिशत लोग शराब, तंबाकू या ड्रग्स के आदी थे और उनमें से तैंतालीस प्रतिशत नाबालिग थे। उनका बिगड़ता स्वास्थ्य एक बड़ी चिंता है। अध्ययन में यह भी पता चला कि तिरेसठ प्रतिशत आबादी टीबी, डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियों के संपर्क में है। इसके बाद मैंने इनके लिए फाउंडेशन के साथ मिलकर ‘केयर फॉर क्लीनर्स’ नाम से एक अभियान चलाया और उससे जो फंड मिला, उससे रेनकोट और गमबूट्स खरीदकर इन लोगों को मुफ्त में बांटे। 
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मैंने फाउंडेशन के साथ मिलकर बृहन्मुम्बई नगर निगम के कई वार्ड ऑफिस में वाटर प्यूरीफायर लगवाए हैं, जिससे लगभग 12,000 कर्मचारियों को साफ पानी पीने को मिल रहा है। इसके साथ ही महीने में एक बार साफ-स्वच्छ भोजन कराने का आयोजन भी किया जाता है। 

यह भोजन महिला उद्योग गृह की सदस्यों द्वारा तैयार किया जाता है, जहां खाना बनाने से लेकर आपूर्ति करने तक की जिम्मेदारी महिलाएं संभालती हैं। इस मासिक भोजन योजना से इन महिलाओं को उनके परिवारों के लिए आय उत्पन्न करने में मदद मिलती है। इस सबके साथ मैं अपनी पढ़ाई भी करती हूं। अपने दिन के दो घंटे सामाजिक कार्यों के लिए देती हूं, बाकी समय 
पढ़ाई, खेल आदि पर फोकस करती हूं।

मेरी कोशिश है कि पूरे देश में कचरा बीनने वालों की मदद कर पाऊं। वे भी हमारे जैसे इन्सान हैं और हमें उनकी समस्याओं से नजरें नहीं चुरानी चाहिए। अगर वे अपना काम करना बंद कर देंगे, तो हमारे शहर बेकार हो जाएंगे। हर दिन गंदगी के संपर्क में आने की वजह से ये लोग गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। 

इनके पास इतने पैसे नहीं कि वे बड़े अस्पतालों में इलाज करवा सकें। इसलिए फिलहाल मैं समाज के इस उपेक्षित तबके के लिए ‘मेडिकल इंश्योरेंस’ पॉलिसी दिलाने के लिए पैसे इकट्ठा कर रही हूं। मैं अपने काम को व्यापक बनाने की कोशिश में हूं ताकि देश के अन्य हिस्सों में ऐसे अभियान शुरू किए जा सकें।

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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