सार्क देशों के साहित्यकार संस्कृतिकर्मी एक मंच पर मिले। अपनी बात कही। दूसरे की सुनी। आपस में दोस्ती का एक ख्याल तो जगा...अब इस ख्याल को जिंदा रखने के लिए किसी साझे चूल्हे की सांस्कृतिक आंच तो बार-बार चाहिए।
अमेरिकी साहित्यकार विलियम फॉकनर ने कभी कहा था-'' रचनाओं में समय बर्फ की तरह जमा रहता है। जब भी हम उसे पढ़ना या सुनना शुरू कर देते हैं वह दोबारा से पाठकों के जीवन में बहना शुरू कर देता है।" हालांकि फॉकनर ने यह बात उपन्यास के संदर्भ में कही थी, लेकिन कविताओं के लिए भी कुछ ऐसा ही महसुस किया उन लोगों ने, जो नई दिल्ली में सार्क लिटरेचर फेस्टिवल में हिस्सा लेने आए थे। साहित्य और संस्कृति के इस तीन दिवसीय 'महाकुंभ' में जब दूसरे देशों के साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों ने कविता सुनाई या फिर अपने समाज के मौजूदा दौर में संस्कृति या कलाकर्म के लिए लगातार कम होती जगहों पर
अपनी बात रखी तो लगा मानो हमारा कोई भी अनुभव भाषातीत नहीं हो सकता, वह सीमातीत भी नहीं होता और न ही हमारा भोगा हुआ अनुभव समयातीत होता है, वह कभी खत्म नहीं होता और बार-बार अपने को दोहराता है।
साधनों की भरमार के बीच अगर दुनिया का भूगोल छोटा हो गया है तो शायद सबकी समस्याएं भी एक सी हैं, निदान भी एक जैसा। लेकिन पड़ोसी जब हाथ मिलाते हैं, गले मिलते हैं तो 'फूल' तो खिलता ही है। कहना गलत नहीं होगा कि सार्क के इस मंच पर फूल भी खिले, दिल भी मिले और बार-बार मिलने का वादा भी हुआ। पाकिस्तान की लोकप्रिय कवियित्री फरहीन चौधरी हों या भूटान से आईं कुनजैंग हों, श्रीलंका से आईं कमला हों, बांग्लादेश से आई झरना रहमान हों या अफगानिस्तान से आए अहमद फरीद सुल्तान हों, सबने एक ही बात कही-'' यह मंच एक साझे चूल्हे की तरह है, जहां आत्ममंथन की रेसिपी पकती है और फिर मिलता है संस्कृतियों का स्वाद।'' कार्यक्रम की शुरुआत सार्क फेस्टिवल ऑफ लिटरेचर के निदेशक प्रो. रेफाकत अली खान के उद्बोधन से हुई।
रेफाकत अली खान ने सार्क के मंच को एक जरूरत बताया। इसके बाद दूसरे देश के बुद्धिजीवियों ने अपनी-अपनी बात कही। सार्क फेस्टिवल ऑफ लिटरेचर का आयोजन 'फाउंडेशन ऑफ सार्क राइटर्स एंड लिटरेचर' (फोसवाल) पिछले 30 सालों से लगातार आयोजित कर रहा है। इस प्रयास के पीछे हैं मशहूर पंजाबी साहित्यकार अजीत कौर। उन्होंने 1987 में फोसवाल की स्थापना की थी। अजीत कौर कहती हैं- "दक्षिण एशिया के ये प्रभावशाली देश सिर्फ एक आसमान ही साझा नहीं करते बल्कि इनकी संस्कृति, विरासत, सभ्यता, जलवायु और वनस्पति भी एक हैं। ऐसे में इन देशों को अपने सुख-दुख, विचार और भावनाएं भी मिलकर ही बांटने चाहिए। कोई भी राष्ट्र सिर्फ राजनीतिक और आर्थिक संबंधों के आधार पर ही परस्पर संबंध नहीं बढ़ाते, बल्कि एक-दूसरे को समझने के लिए उन्हें अपनी कला-साहित्य, संस्कृति और रीति-रिवाजों को भी एक-दूसरे से बांटना जरूरी है। फोसवाल का यही मकसद है।"
लेकिन इस मकसद को पूरा करने के लिए इंडियन काउंसिल कल्चरर रिलेशन के अलावा इंडिया अफगानिस्तान फांउडेशन, इंडिया श्रीलंका फांउडेशन, इंडिया भूटान फांउडेशन, बीपी कोइराला इंडिया नेपाल फांउडेशन और साहित्य अकादेमी ने भी सहयोग किया। इसके अलावा इस आयोजन के लिए फंड इक्ट्ठा करने के लिए मशहूर चित्रकार अर्पणा कौर ने अपनी कई पेंटिंग दीं। मेजबान की भूमिका भी निभाई। वह कहती हैं-"सार्क देशों की संस्कृति एक धागे की तरह है, जुड़ते रहें तो हम लोगों की ताकत बढ़ती रहेगी।"
इस कार्यक्रम में प्रो. आशीस नंदी और प्रो. राजमोहन गांधी (भारत) ने भी अपनी बात रखी। भारत के अलावा अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका और मालदीव के रचनाकारों ने इस मंच को साझा किया था। इस उत्सव के दौरान एनएसडी से जुड़े रंगकर्मियों ने मशहूर लेखक मंटो की कहानी पर एक नाटक भी प्रस्तुत किया और सोहेल भान का शास्त्रीय नृत्य भी लोगों के आकर्षण का
केंद्र रहा।