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अंतर्ध्वनि : मैं एक कलात्मक कृति होना चाहता हूं, कम से कम अपनी आत्मा में

Mon, 26 Aug 2019 12:19 AM IST
Nilesh Kumar फरनांदो पैसोआ
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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किसी चीज को अभिव्यक्त करने का मतलब है उसके गुण को संरक्षित रखना, उसके आतंक को निकाल देना। मैंने जिंदगी में बहुत कम चाहा, पर उस रंचमात्र से भी मुझे वंचित रखा गया। ...दुखी मन से मैं अपने शांत कमरे में लिखता हूं, अकेला, जैसा कि मैं सदा से रहा, अकेला, जैसा कि मैं सदा रहूंगा। 

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और मुझे आश्चर्य होता है कि क्या मेरी साफ-साफ कामजोर आवाज हजारों आवाजों के सार को साकार नहीं कर सकती, हजारों जिंदगियों की आत्माभिव्यक्ति की लालसा, हजारों आत्माओं का धैर्य, जो मेरी तरह निरर्थक सपने देखने और रोजाना की इस किस्मत में बेपता उम्मीद के हवाले हो गई है...। 

मुझमें कुछ ऐसा है, जो सदा करुणा की याचना करता है और जो अपने-आप पर ऐसे रोता है, जैसे किसी मृत देवता पर, जिसने अपने सारे पूजन-स्थल खो दिए...। किसी भी व्यक्ति के लिए ईमानदारी से यह स्वीकार करने के लिए बौद्धिक साहस की ज़रूरत है कि वह एक मानवीय क्षुद्र तत्व से अधिक नहीं है, कि वह एक ऐसा गर्भपात है, जो होने से बच गया...। 
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मैंने हमेशा चाहा कि लोग मुझे समझें नहीं। लोगों द्वारा समझे जाने का अर्थ स्वयं को वेश्या बनाना है। प्रेम करने का अर्थ है अकेले रहने की थकावट, इसलिए वह अपने आप से एक कायरता, एक विश्वासघात है। मैं जैसा होना चाहता था, बिल्कुल वैसा ही होना चाहता हूं, पर मैं वैसा नहीं हूं।

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...मैं एक कलात्मक कृति होना चाहता हूं, कम से कम अपनी आत्मा में, क्योंकि मैं अपने शरीर में तो ऐसा नहीं हो सकता। प्रत्येक विजय एक अश्लीलता है। विजेता अनिवार्यतः अपनी निराशा के सारे गुण खो बैठता है, जिसने उसे संघर्ष की ओर प्रवृत्त किया और विजय दिलाई।

मैंने तय किया है कि अब मैं कुछ नहीं लिखूंगा, न सोचूंगा, इसके बदले में कुछ कहने का ताप मुझे सुला दे और मैं जो कुछ भी कह सकता था, उसे अपनी आंखें बंद कर थपथपाऊं, चपत लगाऊं, जैसे वह कोई बिल्ली हो।

(पुर्तगाल के महान कवि-लेखक)
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