कवि एक आम आदमीवादी बहस निपटाकर लौटा था कि झुरझुरी चढ़ी।
यों बहस जब भी होती है, कवि को अभ्यास है कि झुरझुरी का स्तर क्या हो, वह किसे चढ़े और कैसे उतरे। इस नई झुरझुरी ने अनाहूत किस्म का व्यवहार दिखाया था, लिहाजा वह चकित था।
आदमी को कुछ हो तो वह दवाई ढूंढ़ता है, कवि को कुछ हो तो वह क्या ढूंढे? कुछ लोगों का ख्याल है कि परंपरा खोजता होगा। वह निराला, नागार्जुन, पाश वगैरह के नाम पर बने 'बहाने' भुट्टों की तरह सेंककर खा लेता होगा। मुक्तिबोध का नाम फूंककर जल पी लेता होगा। पर ख्याल तो लोगों का होता है। कवि लोगों के ख्याल पर चले तो क्या कविताई हुई?
कवि की झुरझुरी बढ़ी। उसने पोतों से प्रेम नहीं किया, नातियों से नहीं खेला, पड़ोसी को कभी अस्पताल नहीं ले गया, जहां नौकरी थी वहां टिफिन में हिस्सा नहीं बंटाया, शराब सदा दूसरों की पी, चिकन का बिल आने से पहले निकल गया, स्त्री मुक्ति की लंबी हिमायत के बाद मुक्त स्त्री के शिकार की संभावनाओं में सत्य की खोज की। कवि था, कवि की तरह रहा। जीवनांत में रोमांटिक कैंसर की भव्य कल्पना से कभी नीचे नहीं उतरा। ... कि पहले बूढ़ा हो, फिर स्वेटर पहने श्रेष्ठ बिस्तर पर अधलेटा अप्रतिम आभा की प्रतिमूर्ति, वह लिख रहा हो, मर क्या रहा हो, गजब ढंग से अमर हो रहा हो।
झुरझुरी की विकट अनुभूति का परिणाम मलेरिया, डेंगू या चिकनगुनिया में बदल सकता है, यह विचार मात्र ही कवि-विरोधी था। मलेरिया फिर भी गंदे पानी के मच्छर से जुड़ी चीज थी। उसे वह आखरी आम आदमी का प्रतीक कहकर कभी कविता के कच्चे माल में बदल भी सकता था। अपने शुरुआती अफसरी जीवन में उसने पहले रिश्वत का बड़ा अंश डीडीटी, मच्छरदानी और कुनैन को अर्पित किया था। तब जिस नौकरानी का इलाज कराकर उसने स्मृतियां अर्जित की थीं, उन स्मृतियों से उपजी कविताएं आज भी सुपरहिट थीं।
मगर, यह जो नई झुरझुरी थी, उसके कारक मच्छर साफ पानी में पनपते थे। इसकी कोई वैक्सीन भी नहीं थी। इसकी एक ही दवा थी जो विद्या बालन से लेकर बिन्नो की चाची तक एक-सी चलती थीं। या तो मच्छर प्रवीण थे या पानी की निर्मलता ने अपना कैरेक्टर बदल लिया था।
साफ पानी 'एलीट' का प्रतीक है। साफ चरित्र को टीवी की बहसों में धुलते देखा जा सकता है। सफाई एक आतंकित कर देने वाली क्रिया है। सरकार ने काले धन की स्वेच्छया घोषणा वाली तारीख घोषित कर दी है, ताकि सभी निर्मलाकांक्षी उस तारीख तक यथाशक्ति कमाए काले धन को सफेद करवा सकें। निर्मलता की रसीद, जुर्माने की राशि से लाख गुना बड़ी है। मच्छर इस आग्रह को समझ गए हैं। वे साफ पानी में तबियत से तैर रहे हैं और दुर्लभ विषाणुओं की खेप निर्मल आग्रह के साथ निरंतर सप्लाई कर रहे हैं।
झुरझुरी बढ़ी, ताप चढऩे लगा, कवि को ज्वर की सत्ता दिखाई देने लगी।
कवि ने बहुत ज्वर देखे, बहुत कविताई की, पर इस ज्वर की सत्ता में सबसे भिन्न प्रतिक्रियावादी गंध थी। यह कुछ उन्मत्त-सा ज्वर था जो झुरझुरी के साथ ऊंचा, और ऊंचा उठता था।
कवि ने सुना था, मेडिक्लेम वालों को महंगे और बिना बीमाकार्ड वालों को सस्ते साझे बिस्तरों पर यह एक भाव से तोड़ता था। कवि टूटने को तैयार नहीं था। अगर टूटना भी पड़े, तो प्राइवेट एक्जीक्यूटिव में टूटे। कहते हैं, यह कमर पर वार करता है। आदमी झुककर दोहरा हो जाता है। कवि बंद कमरों में कई बार झुका और रेंगा था, गो कि सार्वजनिक रूप से वह सीधी कमर का प्रवक्ता था। बतौर कवि चिकन खाते हुए या बतौर अफसर कारीगर को गुनिया से नाप लेते देखते हुए उसने कई सीधे परंतु काव्यात्मक आदेश दिए थे,जो अंतत: कविता हो गए। इस ज्वर में, जिसके चिकनगुनिया होने की आशंका थी, कमर का संपूर्ण समर्पण था। आदेश की सीमाएं थीं। कवि, अफसरत्व को एक तरफ रख दे तो भी अंतत: वह कुछ था, जो सिर्फ ज्वर के प्रतिरोध पर अवलंबित था।
कवि को वह विदेशी पूंजी, देशी बनियों और जनविरोधी स्वच्छतावादियों की मिली-जुली साजिश जान पड़ी। स्वच्छ भारत अभियान पर कवि गुस्सा करता रहा था। क्या परिणामत: मच्छरों ने गंदे से हटकर स्वच्छ क्षेत्रों में कॉलोनियां विकसित कर लीं? क्या मच्छर भी कवि के विरुद्ध थे यानी प्रकारांतर से जनता के विरुद्ध निर्मलता के प्लेटफॉर्म पर पनप रहे थे?
ताप और बढ़ा। कवि की आंखें मुंदने लगीं। ज्वर की सत्ता का दमनचक्र आगे बढ़ा। ऐसे मच्छर जो कि नए किस्म के जटिल विषाणुओं को स्वच्छता के बीच पोषित करते हैं, जनविरोधी कार्रवाई की पहली सीढ़ी हैं। यही एक सूत्र वाक्य था जिससे कवि, चिकनगुनिया से लड़ना चाहता था।
शरीर टूटने लगा। पहले अंगुलियों के जोड़, फिर पैरों के जोड़, फिर पीठ और कमर।
भीतर का अफसर चिल्लाया, सिर्फ ेपैरासीटामॉल तो सबको देते हो, मुझे कुछ और दो। बाहर खड़ा सेवक बोला, प्लेटलेट्स भी घट रहे हैं। कहीं डेंगू से चिकनगुनिया तो नहीं भिड़ रहा है?
भीतर का अफसर फिर चिल्लाया, जल्दी ठीक करो, मेरा ठीक होना पूरे तंत्र के लिए जरूरी है।
अबकी बार भीतर का कवि कराहता हुआ जवाबी मुद्रा में आया, 'मेरी तो कमर स्थायी रूप से झुक गई है। जोड़ सबके सब टूटे हुए हैं। मैं तुम्हारे भीतर से निकलकर जाना चाहता हूं ताकि आत्मा के चिकनगुनिया से मुक्ति पा सकूं।'
तब से कवि-अफसर बेहोश है।
कमरे में सिर्फ एसी की आवाज गूंज रही है ।
आइसोलेशन वार्ड के बाहर तख्ती लगी है - 'डोन्ट डिस्टर्ब।'
नीचे किसी ने चिपका दिया है-
'इस दीवार में भी एक खिड़की रहती थी।'