तीन अक्तूबर 1883 को विन्सेंट वान गॉग ने अपने भाई थियो को एक चिट्ठी लिखी थी-"मैं इस यात्रा से बहुत खुश हूं। मैंने जो कुछ देखा उससे उत्साहित हूं। सांझ होती है, तो धरती असाधारण रूप से खूबसूरत लगती है। बोत्जेल के एक एलबम में फ्रांसिसी चित्रकार दौबिनी ने इन प्रभावों को हुबहू उतार दिया है। हूगवीन छोड़ने से पूर्व मैंने कुछ और स्टडीज को पेंट किया, उनमें से एक फार्म हाउस वाली थी। मेरे पास फुरनी के भेजे हुए रंग थे। अपना मन बदलने से पहले ही मैं सुनिश्चित करके काम में लीन हो जाना चाहता हूं, जिसमें मैं खुद को पा सकूं। अब मैं तुम्हें अपना सुनिश्चित पता नहीं दे पाऊंगा, क्योंकि मुझे नहीं पता कि आगामी दिनों में मैं कब कहां होऊंगा...."
और इसके कुछ सालों बाद ही शहर दर शहर घूमते हुए विन्सेंट वान गॉग का पता और ठिकाना दोनों बदल गया था। 29 जुलाई 1990 को 37 वर्ष की कम उम्र में खुद को गोली मारकर वान गॉग ने आत्महत्या कर ली, लेकिन अपने पीछे रचनाओं का एक ऐसा संसार छोड़ गए, जिस संसार में रंगों का तुमुल कोलाहल है, संवेदनाओं का सागर है, रिश्तों की बुनियाद है और जिंदगी के कई तीखे मोड़ भी।
नीदरलैंड में 30 मार्च 1853 को जन्मे विन्सेंट वान गॉग ने 1881 से 1890 के बीच, लगभग 900 चित्र बनाए, 1100 ड्राइंग और स्कैच भी बनाए। इसके अलावा उनके लिखे 800 से ज्यादा पत्र भी हैं, जिनमें उनका जीवन, सरोकार और समय अब भी धड़क रहा है। इन पत्रों से गुजरते हुए ऐसा लगता है मानो हम वान गॉग की पेंटिंग की हर एक रेखा और रंगों के बीच से गुजर रहे हों। चित्रकार बनने की चाह वान गॉग में शुरू से थी। गरीबी और अपमान में मृत्यु को प्राप्त होने वाले महान चित्रकार रैम्ब्रां को बहुत पसंद करते थे वान गॉग।
विन्सेंट का अंत भी करीब-करीब रैम्ब्रां की तरह ही हुआ। दुनिया के कुछ महान लोगों की तरह उसकी पहचान भी मृत्यु के बाद हुई। वान की बनाई ऑयल पेंटिग्स को उनके जीवित रहते कभी भी प्रशंसा नहीं मिली, लेकिन मरने के बाद प्रसिद्धि ने कभी उनका दामन नहीं छोड़ा। उनके चित्र दुनिया के सबसे महंगे चित्रों की सूची में हमेशा शामिल रहे। आज वान गॉग के सेल्फ पोर्ट्रेट की कीमत तीन अरब रुपये से ज्यादा है और दुनिया के सबसे महंगे दस चित्रों में उनके चार चित्र शामिल हैं। वान के चित्रों में ‘स्टारी नाइट’, ‘सनफ्लावर्स’, ‘डॉ. गैचे', ‘सॉरो' की चर्चा कलाप्रेमियों के बीच बार-बार होती है।
कई सौ पेंटिंग्स बनाने वाले वान जीते जी केवल दो पेंटिंग ही बेच पाए थे। संघर्ष की यह कहानी यहीं नहीं रुकती। उनकी कलात्मक यात्रा में कई तीखे मोड़ हैं और कई रचनात्मक पड़ाव भी। कला के प्रति उसकी दीवानगी, जिंदगी में अभाव और लोगों की उपेक्षा पर उनके शिक्षक मेन्डेस ने वान से एक बार कहा था-‘तुम्हें कई बार लगेगा कि तुम हार रहे हो, लेकिन आखिरकार तुम खुद को अभिव्यक्त करोगे और वह अभिव्यक्ति तुम्हारे जीवन को मायने देगी।’ और कहना गलत नहीं होगा कि वान के चित्रों ने उनके जीवन को जो मायने दिए उनके अर्थ उसकी मौत के बाद खुले तो खुलते चले गए और आज उसके रंग दसों दिशाओं में फैलते चले जा रहे हैं। वान को जानना दिलचस्प भी है और प्रेरणादायक भी।
एक अच्छी खबर यह है कि अब एक एनिमेशन फिल्म के जरिए वान हम सबसे रूबरू होने जा रहे हैं। इस फिल्म का नाम है-‘लविंग विन्सेंट’। इसका निर्देशन पॉलिश चित्रकार डोरोटा कोबाइला और ब्रिटिश फिल्मकार हफ वेल्चमैन ने किया है। यह फिल्म 19वीं सदी डच चित्रकार विन्सेंट की जिंदगी और उनकी रहस्मयी मौत की पड़ताल करती है। मगर खास बात यह है कि इस फिल्म की कहानी को बाकी फिल्मों से अलग अंदाज में फिल्माया गया है। इस फिल्म में विन्सेंट की कहानी को 120 पेंटिंग्स के जरिये दिखाया जाएगा। यह पेंटिंग्स उनके लिखे 800 खतों पर आधारित होंगी। इन पेंटिंग्स को बाकायदा 100 चित्रकारों से तैयार करवाया गया है। फिल्म का हर एक शॉट हाथ से बनाई गई इन्हीं पेंटिंग्स पर फिल्माया गया है। इस तरह की यह दुनिया की पहली फीचर लेंथ पेंटेड एनिमेशन फिल्म होगी। फिल्म के इसी साल रिलीज होने की संभावना है। इस फिल्म का इंतजार पूरी दुनिया को है।