मैंने लुप्तप्राय कारीगरों की कला बचाने के लिए एक मंच दिया, कलाकृतियों को संजाेने का काम किया, ताकि कलाकार खुश रह सकें और कला संरक्षित हो सके। मैं उत्तर प्रदेश के लखनऊ का
रहने वाला हूं। बचपन से ही डिस्लेक्सिया से ग्रसित होने के कारण जिंदगी काफी उतार चढ़ाव भरी रही। अन्य छात्रों की अपेक्षा स्कूल में कुछ भी सीखने के लिए मुझे काफी मेहनत करनी पड़ती थी। शब्दों को एक साथ जोड़कर पूरा वाक्य पढ़ना बुरे सपने के जैसा था।
सहपाठी मुझे ताने देते थे और पागल कहते थे। इन सबका सामना करते हुए मैं आगे बढ़ ही रहा था कि एक दुर्घटना में मेरे पिता की मृत्यु हो गई। तब मेरी उम्र सिर्फ 12 साल थी। पिता की मौत के बाद मैं बेहद निराश हो गया। सोने के लिए मैं नींद की गोलियां खाने लगा।
स्थिति कुछ ऐसी हो गई कि आत्महत्या के ख्याल आने लगे। फिर मेरा मन बदला और खुद को दोबारा एक मौका देने के बारे में सोचा। इसके बाद मैंने एमबीए किया, और बैंक ऑफ इंडिया में नौकरी मिल गई। वहां से रिजर्व बैंक गया, जहां कुछ दिन काम किया। लेकिन मुझे संतुष्टि नहीं मिल रही थी।
मैं कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे कि लोगों का भला हो सके। मैं देश के शिल्पकारों द्वारा बनाई जाने वाली कलाकृतियों को संजोने पर काम करना चाहता था। मैंने नौकरी छोड़ दी और
शिल्पकारों से संपर्क करना शुरू किया। इसी बीच एक दिन मधुबनी के एक शिल्पकार से संपर्क करना चाहा, तो एक छोटी बच्ची ने फोन उठाया। उसने बताया कि हाल ही में बीमारी से उसके पिता की मृत्यु हो चुकी है।
लड़की ने बताया कि, पिता के जाने के बाद उनकी स्थिति बदतर हो गई है। गांव के प्रधान रात में उसकी मां को लेकर जाते हैं और सुबह वापस छोड़ते हैं। उसके बाद मम्मी सिर्फ रोती रहती हैं। इस बातचीत से मुझे सदमा लगा और बेचैन हो उठा। मैंने उनकी सहायता करने की ठानी और मधुबनी पहुंच गया। मैंने किसी तरह उस बच्ची को खोजा और उसके परिवार को दिल्ली भेजा। इस दौरान मुझे कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
अब उस परिवार की आजीविका चलनी जरूरी थी। इसके लिए मैंने नेकेड कलर्स नाम से पहल शुरू की, जिसका उद्देश्य कारीगरों द्वारा बनाई गई कला और शिल्प को कॉरपोरेट गिफ्टिंग मार्केट से जोड़कर बेचना था। बिजनेस मॉडल ऐसा था कि कुल मुनाफे का एक तिहाई कारीगरों को दिया जाता था, एक-तिहाई का उपयोग कंपनी को बनाए रखने के लिए किया जाता था, और शेष अनाथों को दान कर दिया जाता था। इससे मधुबनी के साथ तंजावुर और गोंड कारीगरों को भी लाभ हुआ।
इस बीच, एक बार मैं सतपुड़ा के जंगलों में पहुंच गया। हालांकि वहां मैं गया तो लोगों को जागरूक करने के लिए था, लेकिन मेरा अपहरण कर लिया गया। बाद में उन्होंने मुझे छोड़ दिया। मैंने वहां स्वास्थ्य, स्वच्छता और शिक्षा जैसी कुछ बुनियादी चीजों पर काम किया। 2015 में वापस दिल्ली आया और लिवमैड मूवमेंट शुरू किया। मेरा पहला प्रोजेक्ट महिलाओं की सुरक्षा पर था। मैंने पिंक व्हिसल प्रोजेक्ट शुरू किया, और एक सीटी डिजाइन की, जिसे कंगन की तरह पहना जा सकता है, और किसी भी खतरे में, एक बटन दबाने पर, यह दो इंच के चाकू में बदल जाती है।
इसके साथ ही मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ एड्स के खिलाफ जागरूकता फैलाने का काम कर रहा हूं। मैं अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को ऐसे जीना चाहता हूं जैसे कि वह अंतिम हो। मैं चाहता हूं कि हर कोई मेरे द्वारा साझा किए गए प्यार के लिए मुझे याद रखे।
-2018 में यूनेस्को अंबेसडर के विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।