किताबें नहीं पढ़ना, उन्हें जलाने से बड़ा अपराध है। कवियों को पढ़ने या सुनने में विफल रहने के कारण समाज स्वयं को अभिव्यक्ति के निचले स्तर पर ले जाता है।
दूसरे शब्दों में वह अपनी विकासवादी क्षमता को खो बैठता है। भाषा का उपहार ही हमें अन्य जीवों से अलग करता है। कविता मनोरंजन का एक रूप नहीं है और विशिष्ट अर्थों में यह कला का भी एक रूप नहीं है, बल्कि यह हमारा आनुवंशिक लक्ष्य है। यह विकासवादी, भाषायी प्रकाशस्तंभ है।
जिस समय मैं लिखता या पढ़ता नहीं हूं, उस समय लिखने-पढ़ने के बारे में ही सोचता रहता हूं। लेखक के लिए देशभक्ति का एक ही रूप है-भाषा के प्रति उसका रवैया। एक कवि का समाज के प्रति अगर कोई दायित्व है, तो वह है श्रेष्ठ लेखन करना। इसके अलावा उसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। इसमें विफल रहने पर वह विस्मृति में डूब जाता है। दूसरी तरफ समाज का कवियों के प्रति कोई दायित्व नहीं होता है।
समाज के पास कविता पढ़ने के अलावा अन्य विकल्प भी होते हैं, भले ही कविता कितनी ही अच्छी क्यों न हो। किसी भी मनुष्य को अपने बारे में दो या तीन चीजें जरूर जाननी चाहिए-क्या वह कायर है, क्या वह ईमानदार है, क्या वह एक महत्वाकांक्षी आदमी है। पहले इसी आधार पर खुद को परिभाषित करना चाहिए, फिर संस्कृति, जाति और पंथ के संदर्भ में। जिस क्षण आप किसी पर दोष मढ़ते हैं, उसी क्षण आप बदलाव के प्रति अपने संकल्प कमजोर करते हैं। जीवन ऐसा खेल है, जिसके नियम तो कई हैं, पर कोई रेफरी नहीं है।
-नोबेलजयी साहित्यकार