एक समर्थ बेटा मां की बीमारी से इस कदर थक जाए, खीझ जाए या हार जाए कि वह अपनी मां को छत से फेंक दे, तो हमें तमाम प्रगति और उपलब्धियों के बीच अपने होने और अपने समाज को ठीक से समझने की जरूरत है। यह किसी पाषाण युग की घटना नहीं है, बल्कि साइबर युग की है। मां का दर्जा इस जहां में सबसे ऊपर माना जाता है।
रिश्तों की दुहाई की बात हो, तो भी सबसे पहले मां और बेटे के रिश्ते की दुहाई दी जाती है। लेकिन एक कलयुगी बेटे ने इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली वारदात को अंजाम दिया। उसने अपनी ही बुजुर्ग मां को छत से फेंक कर मार डाला। वजह भी उतनी झकझोर देने वाली है, जितना कि यह अपराध। इस कुकर्म के पीछे कारण सामने आया है मां की बीमारी। बीमार मां की देखभाल से बचने के लिए कलयुगी बेटे ने मां को छत से फेंक कर मार डाला।
वैसे यह वारदात कुछ महीने पहले की बताई जा रही है, लेकिन सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद इस वारदात के बारे में अब पता चला है। पहले तो लोग इसे एक एक्सीडेंट समझ रहे थे। उन्हें लगा कि महिला की मौत छत से गिरने से हुई है। लेकिन उक्त महिला की मौत के कुछ दिन बाद पुलिस को एक गुमनाम चिट्ठी मिली और फिर जब सीसीटीवी फुटेज को खंगाला गया, तब सब-कुछ साफ हो गया।
सीसीटीवी फुटेज में साफ दिख रहा था कि जो असहाय मां खुद अपनी चप्पल भी नहीं पहन सकती थी, उसे किस तरह यह कलयुगी बेटा खींचता-घसीटता हुआ पहले सीढ़ियां चढ़ाने की कोशिश कर रहा है। सीसीटीवी में मां की लाचारी साफ-साफ दिख रही है, जिसे चार से पांच सीढ़ियां चढ़ने में 15-20 मिनट का समय लगा। पुलिस को यही बात नागवार गुजरी कि जो महिला चार सीढ़ियां खुद से नहीं चढ़ सकती, वह छत पर क्या करने जाएगी और छत की बाउंड्री पर कैसे चढ़ेगी? इसके बाद मामला साफ था। इस मामले में आरोपी बेटा असिस्टेंट प्रोफेसर संदीप है।
कहा जाता है कि दुनिया में मां और बेटे का रिश्ता सबसे पवित्र रिश्तों में से एक होता है। लेकिन अगर एक बेटा ही इस रिश्ते को कलंकित कर अपनी मां की जान लेने पर उतारू हो जाए, तो फिर उस बेटे के बारे में आप क्या कहेंगे? ऐसा ही हुआ गुजरात के राजकोट में रहने वाली जयश्री बेन नथवाणी के साथ। इस मामले में सीसीटीवी फुटेज न सिर्फ इस बेटे की करतूत दिखाती है, बल्कि समाज को आईना भी दिखाती है कि हम कहां जा रहे हैं? पुलिस पूछताछ में संदीप ने जो बताया वह भी हैरान कर देने वाला था।
उसने बताया कि उसकी मां बीमार रहती थीं और घर में झगड़ा बहुत होता था। मां की देखभाल घर का कोई सदस्य नहीं करना चाहता था। खुद संदीप भी नहीं। नई, बेहतर और तेज जिदंगी की चाह में उसकी मां ही उसकी बेड़ियां बन गई थीं। जिन्हें रास्ते से हटाने के लिए इंसानियत को शर्मसार करने वाली वारदात को अंजाम दिया गया। आखिर ऐसी प्रगति हमें क्यों चाहिए, जहां रिश्तों की कोई कदर ही न हो? इंसानियत को शर्मसार करने वाली इस तरह की घटनाएं समाज में क्यों बढ़ रही हैं, इस पर सोचने की जरूरत है?
- गोरखपुर से अलका श्रीवास्तव