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'मैंने गरीबी में जीना स्वीकार किया, ताकि मेरी आत्मा स्वतंत्र रहे'

Tue, 02 Jan 2018 01:02 PM IST
बीरेंद्र कुमार भट्टाचार्य
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Birendra Kumar Bhattacharyya
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मैं हमेशा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्षधर रहा, यही वजह थी कि मुझे कई बार नौकरी से निकाल दिया जाता था। जब 1967 में तीसरी बार मुझे नौकरी से निकाला गया, तो मैंने तय कर लिया कि अब स्वतंत्र लेखन ही करूंगा।

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हालांकि स्वतंत्र लेखन से जीविका चलाना मुश्किल था, लेकिन सौभाग्य से बेहद मुश्किल क्षणों में भी मेरी पत्नी मेरे साथ खड़ी रही। मैंने जीवन में तमाम जोखिम उठाए, लेकिन लिखना कभी नहीं छोड़ा और न ही जिंदगी में प्रेम का उत्सव मनाना छोड़ा। मैंने अपने उपन्यासों में आजादी से पहले और बाद की क्रूरता, आतंक और विनाश की पृष्ठभूमि में शांति और जीवन की रचनात्मकता के पक्ष में लिखा।

एक स्वतंत्रता सेनानी और राममनोहर लोहिया का अनुयायी होने के कारण मैंने सोच लिया था कि सरकारी नौकरी नहीं करूंगा और स्वतंत्र जीवन जिऊंगा। इसलिए मैंने पत्रकारिता का पेशा अपनाया, क्योंकि मेरा मानना था कि इसमें पूरी स्वतंत्रता होगी। हालांकि मैंने पाया कि दो साहित्यिक पत्रिकाओं की संपादकी के बावजूद मैं बिना नौकरी के हूं। मेरे पास परिवार था, लेकिन जीविका के लिए कोई साधन नहीं था।
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स्वतंत्र लेखन के अपने जोखिम थे। स्वतंत्र लेखन से मैं कभी महीने में तीन सौ रुपये से ज्यादा नहीं कमा पाया, जो पर्याप्त नहीं था। मैंने स्वैच्छिक रूप से गरीबी में जीना स्वीकार किया था, ताकि मेरी आत्मा स्वतंत्र और जीवित रह सके। दिल्ली में रहते हुए अक्सर मैं राजघाट जाता था।  जब भी मैं गांधी जी की समाधि के पास जाकर बैठता था, मुझे एक तरह की शांति और धीरज का एहसास होता था।
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-असमिया के ज्ञानपीठ विजेता उपन्यासकार

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