हाल ही में मुझे इस बात का एहसास हुआ कि कुछ वर्षों से मैं एक छद्म में जी रहा हूं। मैं अपने चारों ओर के लोगों की हताशा और चिंताओं को ध्यान में नहीं रखता हूं। मैंने महसूस किया कि सभ्य, विडंबनाओं और उदार मन वाले लोगों से भरी मेरी दुनिया बहुत छोटी है, जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी।
यूरोप, अमेरिका के हताशाजनक राजनीतिक घटनाक्रम और पूरी दुनिया में आतंकी घटनाओं ने मुझे यह स्वीकार करने पर मजबूर किया कि उन्नत उदार-मानववादी मूल्य, जिसे मैंने बचपन से ही हल्के में लिया, खत्म हो सकता है। लेकिन मैं उस पीढ़ी का हिस्सा हूं, जो आशावाद में यकीन रखता है और रखे भी क्यों नहीं? हमने अपने बुजुर्गों को तानाशाही शासन और भयंकर नरसंहार वाले यूरोप को सफलतापूर्वक एक उदार लोकतंत्र में बदलते देखा है, जो अब लगभग सीमाहीन दोस्ती में यकीन रखता है।
हमने नारीवाद, समलैंगिक अधिकारों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति देखी है और हम नस्लवाद के खिलाफ कई मोर्चों पर संघर्ष के गवाह रहे हैं। हम पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच वैचारिक और सैन्य संघर्ष की पृष्ठभूमि में बड़े हुए हैं और उस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं, जिन्हें हममें से कई सुखद मानते हैं।
मुझे उम्मीद है कि भावी पीढ़ी हर तरह से नई और अद्भुत कहानियां सुनाएगी। हमें उनके प्रति अपना दिमाग खुला रखना चाहिए, खासकर शैली और शिल्प के मामले में, ताकि हम उन्हें बेहतर तरीके से आगे बढ़ा सकें। अच्छा लेखन और अच्छा अध्ययन सभी बाधाओं को तोड़ देगा। इससे हमें एक महान मानवीय दृष्टि मिल सकती है।