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कमलेश्वर जी की 86वीं जयंती पर विशेष : ऐसे कमलेश्वर को आप जानते हैं !

Sat, 06 Jan 2018 03:29 AM IST
कुमार अतुल
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kamleshwar
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आज (छह जनवरी) कमलेश्वर जी का जन्मद‌िन है। आप कमलेश्वर जी को क‌िस तरह जानते हैं। कितने पाकिस्तान, अम्मा, काली आँधी, एक सड़क सत्तावन गलियां, अंतिम सफर, खोया हुआ आदमी, तीसरा आदमी, पति पत्नी और वह, डाक बंगला, गर्मियों के दिन, कामरेड या क़सबे का आदमी का लेखक के तौर पर या सारिका, गंगा जैसी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक के तौर पर अथवा दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा, दैनिक भास्कर के प्रधान संपादक के रूप में?
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कमलेश्वर हिंदी साहित्य में नई कहानियों के जनक, दलित साहित्य को मान्यता दिलाने, आंधी, मौसम, चंद्रकांता जैसी फिल्मों-टीवी सीरियल के स्टार लेखक, दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक होने से कई पुरस्कृत कार्यक्रमों के प्रोड्यूसर और राजपथ की परेड की शानदार कमेंट्री के लिए भी जाने जाते हैं। लेकिन मैं दूसरे ही कमलेश्वर जी को जानता हूं। जो स्टार लेखक, संपादक होने के साथ ही ताउम्र बेहद मानवीय, बेहद संवेदनशील, बेहद आत्मीय और नई पीढ़ी के लेखक पत्रकारों के लिए संरक्षक और बड़े भाई की भूमिका निभाते रहे।

अपनी पत्रकारिता अनगढ और अप्रशिक्षित ढंग से शुरू हुई थी । पहली बार कमलेश्वर जी ने इसके मायने बताए। उनसे पहली मुलाकात कभी नहीं भूल सकती । मई की दुपहरी। प्रचंड गर्मी से बुरा हाल था । दिल्ली के बदरपुर बार्डर से थोड़ा पहले सूरजकुंड जाने वाले मोड़ पर हम उतरे । कमलेश्वर जी से मिलने का आइडिया भोपाल से आए एक कविमित्र राजीव का था । मैं तो उनके साथ हो लिया ।
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बस से उतरे तो कमलेश्वर जी का घर बहुत दूर नहीं था लेकिन गर्मी ने बुरी गत बना दी थी। डोर बेल बजाई तो कमलेश्वर जी के सहायक ने दरवाजा खोला । अंदर बैठाया । कुछ देर बाद कमलेश्वर जी नमूदार हुए । नाटा कद, थोड़ा भारी शरीर, सांवला रंग, बदन पर लुंगी और कुर्ता की अनौपचारिक पोशाक । भारी भरकम लफ्जों में बोले बैठिए । बैठने से पहले राजीव उनके पांव की ओर लपके। सकुचाते हुए मैंने भी राजीव की नकल की। बैठ गये।

कमलेश्वर जी ने अपनी पत्नी ( गायत्री भाभी) से कुछ शर्बत वगैरह लाने को कहा । बैठने के बाद वाचाल राजीव तूफानी रफ्तार से बोले जा रहे थे । कमलेश्वर जी हां हूं किए जा रहे थे। इस बीच कमलेश्वर जी का ध्यान मेरी ओर गया । पूछा-आप क्या करते हैं । इससे पहले मैं कुछ बोलता, राजीव बोल पड़े। सर- अच्छा लिखते हैं । काम की तलाश में हैं । जिन दो अखबारों में काम कर चुका था वे बारी-बारी से बंद हो चुके थे ।

मुझे वाकई काम की शिद्दत से तलाश थी । लेकिन इतनी बड़ी शख्सियत के सामने संकोच में कुछ कह भी नहीं पाया । कमलेश्वर जी शायद ताड़ गये। उन्होंने कहा कि मेरे लिए काम करेंगे । यह प्रस्ताव अकल्पित था। उस वक्त वह दैनिक भास्कर के प्रधान संपादक थे। नहीं बोलने का तो कोई प्रश्न ही नहीं था। उन्होंने कुछ टॉपिक बताए जिसपर काम करना था। मैंने हामी भरी । फिर वे हम दोनों की ओर मुखातिब हुए ।

पूछा -खाना खाया है? हम उम्मीद नहीं कर रहे थे कि दिल्ली जैसे महानगरीय संस्कृति में रचा-बसा अपरिचित शख्स पहली मुलाकात में खाने को पूछेगा । स्टार लेखक थे। सैकडों कहानियां, दर्जनों लोकप्रिय उपन्यासों के लेखक के अलावा सारिका जैसी पत्रिका के संपादक तो वे रह ही चुके थे । आंधी, मौसम जैसी कई फिल्में और बड़े टीवी सीरियल की पटकथा लेखक का रुतबा भी उनके साथ था। हाल में ही चंद्रकांता जैसा लोकप्रिय सीरियल उनके खाते में था।
 
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जब कमलेश्र जी ने पूछा - किराया है तुम्हारे पास?

लोकप्रियता और स्टारडम के बाद भी दुर्लभ मानवीयता व संवेदनशीलता उनमें थी। हम विदा लेने को हुए तो उन्होंने भी चमत्कृत किया । अपने सहायक से उन्होंने जिस्ते वाले कागज दिलवाए जिसपर मैं लिख सकूँ । फिर आहिस्ता से बोले-किराया विराया है ना। उनकी संवेदनशीलता हमें अंदर तक भिगो गई ।

उनके निर्देशन में कई बेहतरीन काम किए। भास्कर के फीचर संपादक डा. राजीव अग्निहोत्री हमें स्टार रिपोर्टर कहा करते । असल स्टार तो हमें मौका देने वाले कमलेश्वर जी थे। सीबीआई के अंदरूनी हालात बयां करती स्टोरी बेहद हिट रही थी । भ्रष्टाचार पर श्रृंखला -यह देश किसका है ने धूम मचा दी थी । दलित साहित्य पर श्रृंखला ने न सिर्फ नई पहचान दी बल्कि बड़े भाई जय प्रकाश कर्दम, श्योराज सिंह बेचैन, ओम प्रकाश वाल्मीकि, सत्य प्रकाश, रजनी तिलक जैसे दलित साहित्यकारो से परिचित भी करवाया ।


एक लाख रुपये प्रति एपिसोड लेखन का प्रस्ताव ठुकराया

चंद्रकांता के सेट में भीषण आग लग गई थी । शूटिंग बंद हो गई थी । कमलेश्वर जी ने इसी दौरान कितने पाकिस्तान लिखने की योजना बनाई । बहुत तैयारी के साथ लिखा। एक बार इसी उपन्यास के लिए सामग्री जुटाने के लिए उन्होंने मुझे माया के दफ्तर में भेजा था। लिखना शुरू किया तो चंद्रकांता की डायरेक्टर नीरजा गुलेरी ने दोबारा स्क्रिप्ट लिखने की गुजारिश की। उनके भतीजे एक लाख रुपये प्रति एपिसोड का प्रस्ताव लेकर आए पर कितने पाकिस्तान लिखने में जुटे कमलेश्वर जी ने वह प्रस्ताव ठुकरा दिया ।

वह खुद को भाई साहब कहलवाना पसंद करते थे । उम्र में कितना ही छोटा हो आप ही कहते। कितने पाकिस्तान लिखने के बाद उनका एक पत्र मुझे मिला। मैं लुधियाना में था। पत्र में इस उपन्यास को उन्होंने नई पीढी की थाती बताया था। एक दिन उनके जाने की खबर आई। उदास कर गई। बहुत बूढे नहीं थे। उनसे ज्यादा उम्र के लोग अभी भी जिंदा हैं। लेकिन जो उपलब्धियां उन्होंने हासिल की हैं वह किसी हिंदी लेखक के लिए दुर्लभ है ।
 

बेरोजगार पत्रकारों की जिम्मेदारी कंधों पर ली

कमलेश्वर कई पत्रों के संपादक रहे। अपनी शर्तों पर काम किया। मन के विपरीत हुआ तो नौकरी छोड़ दी। उनके करीबी कहे जाने वाले कई लोग भी उनके साथ वह संस्थान छोड़ गए। ऐसे लोगों की संख्या पंद्रह-बीस से कम नहीं रही होगी। जब तक एक-एक शख्स की नौकरी नहीं लगी या आत्मनिर्भर नहीं हुआ, कमलेश्वर जी ने उस दौरान उससे घर चलाने की व्यवस्था अपने पैसों से की। एक संपादक का अपनी टीम के लिए इतना करना आज के दौर में दुर्लभ है।

 

जब गांधी शांति प्रतिष्ठान की चहारदीवारी से बाहर निकल आए

कमलेश्वर जी सिगरेट पीते थे। एक बार गांधी शांति प्रतिष्ठान में उनका व्याख्यान था। सिगरेट पीने की तलब लगी तो वह बिना बताए गांधी शांति प्रतिष्ठान के भवन से बाहर निकलकर सड़क पर आ गए। कुछ लोगों ने उन्हें कार्यक्रम के बीच में सड़क पर निकलते देखा तो हैरत से इसकी वजह पूछी तो कमलेश्वर जी ने सकुचाते हुए बताया कि गांधी जी के नाम पर बने भवन में उन्हें सिगरेट पीने में संकोच हुआ इसलिए वह बाहर निकल आए।
 

समकालीन साहित्यकारों से थे आत्मीय संबंध

कमलेश्वर जी के समकालीन साहित्यकारों से बेहद घरेलू और आत्मीय संबंध थे। प्रतिष्ठित साहित्यकार रामदरश जी को शलाका पुरस्कार मिला था। मैंने खुद उन्हें रामदरश मिश्र जी के घर जाकर उस कार्यक्रम में शिरकत करते देखा था। बड़ी बेतकल्लुफी से वह रामदरश मिश्र जी के साथ चौकी पर बैठ गए। घंटों उनके घर रहे। समकालीन साहित्यकारों के बारे में चर्चा करते रहे।


दुष्यंत कुमार के बेहद करीबी रहे, बाद में रिश्तेदारी

कमलेश्वर मूलतः कहानीकार, उपन्यासकार थे। लेकिन कविताओं और गजलों के गहरे अध्येता थे। दुष्यंत कुमार की गजलों को न सिर्फ कई बार उन्होंने अपनी संपादित पत्रिकाओं में छापा। अपने लेखन में बहुधा वह दुष्यंत कुमार की गजलों का जिक्र करते थे। यहां तक कि दुष्यंत कुमार की किताबों की भूमिका भी उन्होंने लिखी। बाद में दुष्यंत जी के बेटे से कमलेश्वर जी की इकलौती बेटी का ब्याह भी हुआ जो मौजूदा समय में भोपाल में रहते हैं।
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