आज (छह जनवरी) कमलेश्वर जी का जन्मदिन है। आप कमलेश्वर जी को किस तरह जानते हैं। कितने पाकिस्तान, अम्मा, काली आँधी, एक सड़क सत्तावन गलियां, अंतिम सफर, खोया हुआ आदमी, तीसरा आदमी, पति पत्नी और वह, डाक बंगला, गर्मियों के दिन, कामरेड या क़सबे का आदमी का लेखक के तौर पर या सारिका, गंगा जैसी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक के तौर पर अथवा दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा, दैनिक भास्कर के प्रधान संपादक के रूप में?
कमलेश्वर हिंदी साहित्य में नई कहानियों के जनक, दलित साहित्य को मान्यता दिलाने, आंधी, मौसम, चंद्रकांता जैसी फिल्मों-टीवी सीरियल के स्टार लेखक, दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक होने से कई पुरस्कृत कार्यक्रमों के प्रोड्यूसर और राजपथ की परेड की शानदार कमेंट्री के लिए भी जाने जाते हैं। लेकिन मैं दूसरे ही कमलेश्वर जी को जानता हूं। जो स्टार लेखक, संपादक होने के साथ ही ताउम्र बेहद मानवीय, बेहद संवेदनशील, बेहद आत्मीय और नई पीढ़ी के लेखक पत्रकारों के लिए संरक्षक और बड़े भाई की भूमिका निभाते रहे।
अपनी पत्रकारिता अनगढ और अप्रशिक्षित ढंग से शुरू हुई थी । पहली बार कमलेश्वर जी ने इसके मायने बताए। उनसे पहली मुलाकात कभी नहीं भूल सकती । मई की दुपहरी। प्रचंड गर्मी से बुरा हाल था । दिल्ली के बदरपुर बार्डर से थोड़ा पहले सूरजकुंड जाने वाले मोड़ पर हम उतरे । कमलेश्वर जी से मिलने का आइडिया भोपाल से आए एक कविमित्र राजीव का था । मैं तो उनके साथ हो लिया ।
बस से उतरे तो कमलेश्वर जी का घर बहुत दूर नहीं था लेकिन गर्मी ने बुरी गत बना दी थी। डोर बेल बजाई तो कमलेश्वर जी के सहायक ने दरवाजा खोला । अंदर बैठाया । कुछ देर बाद कमलेश्वर जी नमूदार हुए । नाटा कद, थोड़ा भारी शरीर, सांवला रंग, बदन पर लुंगी और कुर्ता की अनौपचारिक पोशाक । भारी भरकम लफ्जों में बोले बैठिए । बैठने से पहले राजीव उनके पांव की ओर लपके। सकुचाते हुए मैंने भी राजीव की नकल की। बैठ गये।
कमलेश्वर जी ने अपनी पत्नी ( गायत्री भाभी) से कुछ शर्बत वगैरह लाने को कहा । बैठने के बाद वाचाल राजीव तूफानी रफ्तार से बोले जा रहे थे । कमलेश्वर जी हां हूं किए जा रहे थे। इस बीच कमलेश्वर जी का ध्यान मेरी ओर गया । पूछा-आप क्या करते हैं । इससे पहले मैं कुछ बोलता, राजीव बोल पड़े। सर- अच्छा लिखते हैं । काम की तलाश में हैं । जिन दो अखबारों में काम कर चुका था वे बारी-बारी से बंद हो चुके थे ।
मुझे वाकई काम की शिद्दत से तलाश थी । लेकिन इतनी बड़ी शख्सियत के सामने संकोच में कुछ कह भी नहीं पाया । कमलेश्वर जी शायद ताड़ गये। उन्होंने कहा कि मेरे लिए काम करेंगे । यह प्रस्ताव अकल्पित था। उस वक्त वह दैनिक भास्कर के प्रधान संपादक थे। नहीं बोलने का तो कोई प्रश्न ही नहीं था। उन्होंने कुछ टॉपिक बताए जिसपर काम करना था। मैंने हामी भरी । फिर वे हम दोनों की ओर मुखातिब हुए ।
पूछा -खाना खाया है? हम उम्मीद नहीं कर रहे थे कि दिल्ली जैसे महानगरीय संस्कृति में रचा-बसा अपरिचित शख्स पहली मुलाकात में खाने को पूछेगा । स्टार लेखक थे। सैकडों कहानियां, दर्जनों लोकप्रिय उपन्यासों के लेखक के अलावा सारिका जैसी पत्रिका के संपादक तो वे रह ही चुके थे । आंधी, मौसम जैसी कई फिल्में और बड़े टीवी सीरियल की पटकथा लेखक का रुतबा भी उनके साथ था। हाल में ही चंद्रकांता जैसा लोकप्रिय सीरियल उनके खाते में था।